म्युचुअल फंड

आपकी SIP कैसे रुपये को कर रही है कमजोर? Jefferies ने बताई इसकी कड़वी सच्चाई

पहली नजर में यह बात अजीब लग सकती है। आखिर SIP में निवेश करने वाला आम निवेशक रुपये को कैसे प्रभावित कर सकता है? मगर Jefferies की एक हालिया रिपोर्ट इसी ओर इशारा करती है

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अंशु   
Last Updated- May 21, 2026 | 9:41 PM IST

How Your SIP May Be Weakening the Rupee: कुछ साल पहले तक शेयर बाजार में निवेश करना चुनिंदा लोगों तक सीमित माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। हर महीने करोड़ों लोग SIP के जरिए म्युचुअल फंड में ताबड़तोड़ पैसा लगा रहे हैं। यह बदलाव देश में बढ़ती फाइनेंशियल लिटरेसी, मजबूत होती अर्थव्यवस्था और निवेश की नई सोच को दिखाता है। लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और नए निचले स्तर छू रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या घरेलू निवेशकों का बढ़ता SIP निवेश भी कहीं न कहीं रुपये पर दबाव बढ़ा रहा है?

पहली नजर में यह बात अजीब लग सकती है। आखिर SIP में निवेश करने वाला आम निवेशक रुपये को कैसे प्रभावित कर सकता है? मगर Jefferies की एक हालिया रिपोर्ट इसी ओर इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू निवेशकों से SIP के जरिए लगातार आ रहा पैसा विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार से आसानी से निकलने का मौका दे रहा है, खासकर तब जब बाजार महंगा नजर आ रहा हो।

Jefferies का कहना है कि रुपये की मौजूदा कमजोरी के पीछे सिर्फ चालू खाता घाटा (CAD) जिम्मेदार नहीं है। असली दबाव कैपिटल फ्लो में आई कमी से बना है। यानी विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार से पैसा निकाल रहे हैं और यही रुपये पर भारी पड़ रहा है।

CAD नहीं, कैपिटल फ्लो घटने से रुपये पर दबाव

जैफरीज के विश्लेषकों ने कहा, “रुपये पर दबाव की असली वजह चालू खाता घाटा (CAD) नहीं, बल्कि कैपिटल फ्लो का रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच जाना है।”

उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2024 से 2026 के दौरान भारत का CAD औसतन जीडीपी का सिर्फ 0.8% रहा है, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। उनका अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में भी यह जीडीपी के करीब 2% तक सीमित रहेगा, जबकि इसमें कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल रहने और सोने के आयात में गिरावट आने का अनुमान शामिल किया गया है।

पिछले दो साल में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 78 अरब डॉलर निकाले हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि घरेलू निवेशकों का पैसा लगातार SIP और म्युचुअल फंड के जरिए बाजार में आता रहा। इससे विदेशी निवेशकों को अपने शेयर आसानी से बेचकर बाहर निकलने का मौका मिल गया, खासकर तब जब भारतीय बाजार काफी महंगा नजर आने लगा।

कैसे SIP रुपये को कर रही कमजोर?

जैफरीज के मुताबिक, SIP, EPFO और NPS के जरिए इक्विटी बाजार में घरेलू बचत का लगातार बढ़ता निवेश विदेशी निवेशकों के लिए एक आसान “एग्जिट रूट” बन गया है। ब्रोकरेज का मानना है कि भारतीय शेयर बाजार इस समय काफी महंगा हो चुका है, इसलिए वैश्विक निवेशक यहां से पैसा निकाल रहे हैं।

अप्रैल 2024 से अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजार से शुद्ध रूप से 44 अरब डॉलर की बिकवाली की है। वहीं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में भी बड़ी गिरावट आई है, क्योंकि विदेशी प्रमोटरों और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों ने अपनी हिस्सेदारी बेचनी तेज कर दी है। इसके चलते वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान शुद्ध FDI घटकर करीब 5 अरब डॉलर रह गया।

इसके चलते भारत का कैपिटल अकाउंट सरप्लस FY25-26 में घटकर जीडीपी के सिर्फ करीब 0.5% पर आ गया है, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। पिछले 10 वर्षों में यह औसतन 2.6% रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि SIP के जरिए म्युचुअल फंड में लगातार आ रहा पैसा, इक्विटी निवेश पर टैक्स फायदे, और EPFO व NPS का शेयर बाजार में बढ़ता निवेश विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली को संभाल रहा है। हालांकि, इसके बावजूद पिछले दो वर्षों से भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) घाटे में रहा है और आने वाले समय में भी इसके नकारात्मक बने रहने की आशंका जताई गई है।

जैफरीज के मुताबिक, इस समय सबसे बड़ी चिंता भारत के कैपिटल अकाउंट की कमजोरी है।

ट्रेड डील और GCCs से कुछ राहत की उम्मीद

जैफरीज के मुताबिक, व्यापार समझौते और भारत में बढ़ते ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) कुछ हद तक राहत देने का काम कर सकते हैं। वित्त वर्ष 2026 में भारत का शुद्ध सेवा निर्यात (Net Services Exports) सालाना आधार पर 14% बढ़कर 217 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह देश के कुल व्यापार घाटे का करीब 65% हिस्सा कवर करता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर चिंताओं के बावजूद भारत में GCCs की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है, जिससे संकेत मिलता है कि इस सेक्टर की रफ्तार अभी बनी हुई है।

हालांकि, दूसरी ओर भारत की मध्य पूर्व (Middle East) पर ज्यादा निर्भरता चिंता बढ़ा सकती है। भारत के कुल निर्यात का करीब 17% हिस्सा और कुल रेमिटेंस का 38% हिस्सा मध्य पूर्व से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में तनाव या आर्थिक कमजोरी बढ़ती है, तो भारत के चालू खाता संतुलन (Current Account) पर दबाव बढ़ सकता है।

रुपया अंडरवैल्यू, लेकिन सुधार की संभावना

रिपोर्ट के मुताबिक, रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) यह संकेत देता है कि फिलहाल रुपया अपनी वास्तविक कीमत से कमजोर स्तर पर कारोबार कर रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि RBI के पास लगभग 597 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। इसमें से करीब 100 अरब डॉलर के फॉरवर्ड दायित्वों को समायोजित करने के बाद भी यह भारत के करीब 9 महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि यह औसत स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन फिर भी इसे मजबूत माना जा सकता है।

जैफरीज के अनुसार, भारत का REER फिलहाल अनुमानित 91 के स्तर पर है, जो 12 साल का सबसे निचला स्तर है। इतिहास बताता है कि ऐसे स्तरों से रुपया अक्सर दोबारा मजबूत हुआ है।

ब्रोकरेज का अनुमान है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े हालात जल्द सामान्य होते हैं, तो अगले 12 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया 93-95 के स्तर तक पहुंच सकता है।

इतिहास जगा रहा उम्मीद की किरण

जैफरीज का कहना है कि रुपये में तेज गिरावट के पिछले दौर यह संकेत देते हैं कि यहां से सुधार की संभावना भी बन सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले ऐसे चार बड़े दौरों का अध्ययन किया गया, जब 12 महीनों में रुपया 10% से ज्यादा कमजोर हुआ था। इनमें से तीन मामलों में अगले 12 महीनों के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में जोरदार वापसी देखने को मिली थी। हालांकि, शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) का रुख मिला-जुला रहा। चार में से दो मामलों में Net FDI बढ़ा, जबकि बाकी दो में इसमें गिरावट आई।

जैफरीज का मानना है कि अगर AI वैश्विक निवेश का सबसे बड़ा थीम बना नहीं रहता और इसकी रफ्तार धीमी पड़ती है, तो विदेशी निवेश दोबारा भारत की ओर लौट सकता है। लेकिन रिपोर्ट यह भी कहती है कि इतिहास में कमजोर रुपये से भारत के निर्यात को कोई खास फायदा नहीं मिला है।

सरकार क्या कर सकती है?

ब्रोकरेज के मुताबिक, रुपये पर दबाव कम करने के लिए सरकार के पास कई विकल्प मौजूद हैं। फिलहाल सरकार लोगों को विदेशी मुद्रा खर्च कम करने के लिए सलाह देने जैसे कदम उठा रही है। इसमें वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देना और विदेश यात्राएं कम करने की अपील जैसे उपाय शामिल हैं। लेकिन अगर दबाव बढ़ता है, तो सरकार और सख्त कदम भी उठा सकती है। उदाहरण के तौर पर:

  • विदेश में निवेश और खर्च के लिए LRS (Liberalised Remittance Scheme) की सीमा घटाई जा सकती है
  • कुछ आयातों पर मात्रा आधारित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं
  • कस्टम ड्यूटी बढ़ाई जा सकती है
  • पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई जा सकती हैं, ताकि तेल की मांग और आयात कम हो

इसके अलावा सरकार विदेशी कैपिटल फ्लो बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठा सकती है। जैसे:

  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए डेट और इक्विटी निवेश पर टैक्स कम करना
  • एनआरआई जमा (NRI Deposits) बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं लाना
  • कंपनियों के लिए विदेशी कर्ज (ECB) लेने के नियम आसान करना

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में सरकार ने NRI जमा बढ़ाने के लिए ऐसे कदम उठाए थे। हालांकि इस बार यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि रुपये और डॉलर की ब्याज दरों के बीच अंतर अब काफी कम है।

First Published : May 21, 2026 | 9:41 PM IST