म्युचुअल फंड

पश्चिम एशिया के संकट का असर: मार्च में थमी NFOs की रफ्तार

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने लगभग दो दर्जन योजनाओं को मंजूरी दे रखी है। मगर मार्च में अब तक केवल 9 नई इक्विटी योजनाएं (एनएफओ) ही आई हैं

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अभिषेक कुमार   
Last Updated- March 25, 2026 | 10:09 PM IST

अमेरिका-ईरान संघर्ष की आंच म्युचुअल फंडों तक भी पहुंच गई है। बिगड़े हालात ने म्युचुअल फंड कंपनियों को नई योजनाएं बाजार में उतारना टाल दिया है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने लगभग दो दर्जन योजनाओं को मंजूरी दे रखी है। मगर मार्च में अब तक केवल 9 नई इक्विटी योजनाएं (एनएफओ) ही आई हैं।

पिछले दो सप्ताहों में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के साथ ही नई योजनाओं के आने की रफ्तार खास तौर पर कम हो गई । सेबी की वेबसाइट पर फाइलिंग में भी हाल के सप्ताहों में भारी गिरावट देखी गई है। फंड कंपनियों ने 15 मार्च के बाद सिर्फ तीन योजनाओं के लिए दस्तावेज सौंपे हैं जबकि पहले दो सप्ताहों में 19 योजनाओं के लिए दस्तावेज दिए गए थे।

आम तौर पर मार्च में नई योजनाओं की रफ्तार कम रहती है क्योंकि यह समय वित्त वर्ष की समाप्ति का होता है। लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ने और शेयर बाजार में मंदी के चलते नए फंडों (एनएफओ) के लिए यह समय माकूल नहीं रह गया है।

म्चुयुअल फंड उद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा,‘मार्च आम तौर पर नकदी के लिहाज से तंगी का होता है। इस दौरान आम तौर पर ज्यादा एनएफओ नहीं आते। इस साल पश्चिम एशिया में बिगड़े हालात से स्थिति और जटिल हो गई है। कम एनएफओ का मतलब यह है कि फंड कंपनियां हालात सामान्य होने का इंतजार कर रही हैं क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, मुद्रास्फीति और ब्याज दरों को लेकर चिंताओं के कारण निवेशक सतर्क हैं।’

अमेरिका-ईरान संघर्ष अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। इस वजह से भारतीय शेयर बाजारों पर दबाव और बढ़ गया है, जो पिछले 18 महीने से पहले ही भारी बिकवाली का शिकार रहे हैं। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने निवेशकों के विश्वास को कमजोर किया है, जिससे व्यापक स्तर पर बिकवाली शुरू हो गई है। मार्च में निफ्टी-50 अब तक लगभग 9 प्रतिशत गिर चुका है। इस गिरावट का असर म्युचुअल फंड निवेशकों पर भी पड़ा है। इस कारण उन निवेशकों में बेचैनी है जिन्होंने हाल के वर्षों में शेयर बाजार में निवेश किया है और पहली बार अस्थिरता के लंबे दौर का सामना कर रहे हैं।

एक अन्य म्युचुअल फंड कंपनी के अधिकारी के अनुसार ऐसे हालात में वितरक भी नई योजनाओं को बेचने से हिचकिचाते हैं। उन्होंने कहा,‘वितरक निवेशकों में थोड़ी घबराहट देख रहे हैं क्योंकि स्थिति किस दिशा में आगे बढ़ेगी, इसे लेकर स्पष्टता नहीं है। हालांकि, निवेशकों ने गिरावट का फायदा उठाते हुए कुछ पैसा लगाया है मगर नई फंड योजनाएं लाने का यह सबसे अच्छा समय नहीं है। कुछ स्थिरता आने तक इंतजार करना बेहतर है।’

नई निवेश योजनाओं में गिरावट का सीधा असर बाजार के शुद्ध निवेश पर पड़ता है क्योंकि नई योजनाएं एकमुश्त निवेश का मुख्य स्रोत होती हैं। पूर्व म्युचुअल फंड सीईओ और वर्तमान में सेंस ऐंड सिम्प्लिसिटी के संस्थापक एवं सीईओ सुनील सुब्रमण्यम ने कहा कि मार्च में नई योजनाओं की संख्या में गिरावट के अन्य कारण भी हो सकते हैं।

उन्होंने कहा,‘अनिश्चितता के दौर में निवेशकों का भरोसा कम होने से नई निवेश योजनाओं में मंदी आना सामान्य बात है। इसके अलावा, मार्च महीने में बैंक और राष्ट्रीय वितरक जैसे बड़े वितरण चैनल अपने सालाना लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बीमा योजनाओं की बिक्री पर अधिक ध्यान देते हैं। इस वजह से मार्च के दौरान फंडों की नई निवेश योजनाओं के आने की रफ्तार घट जाती है।’ बाजार में गिरावट का असर सिर्फ एनएफओ तक ही सीमित नहीं है। पिछले कुछ सप्ताह आईपीओ के लिए भी उथल-पुथल भरे रहे हैं।

इसी महीने के शुरू में फोनपे ने घोषणा की थी कि उसने अपना आईपीओ अस्थायी रूप से टाल दिया है। पहले कंपनी मार्च के अंत में अपना आईपीओ लाने वाली थी। गिफ्ट-आईएफएससी के पहले आईपीओ एक्सईडी को भी खाड़ी संकट के कारण अपनी योजना में फेरबदल करना पड़ा है।

First Published : March 25, 2026 | 10:03 PM IST