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आजकल म्युचुअल फंड निवेशकों के बीच Flexi Cap और Large & Mid Cap फंड्स काफी पॉपुलर हो रहे हैं। कई लोग यह सोचकर दोनों कैटेगरी में पैसा लगाते हैं कि इससे उनका पोर्टफोलियो ज्यादा सुरक्षित और डाइवर्सिफाइड हो जाएगा। लेकिन असल तस्वीर थोड़ी अलग है। पहली नजर में ये दोनों कैटेगरी अलग लगती हैं, क्योंकि इनके नियम और निवेश का तरीका अलग है। लेकिन जब इनके पोर्टफोलियो को ध्यान से देखा जाता है, तो पता चलता है कि कई बार दोनों फंड्स एक जैसे ही स्टॉक्स में निवेश कर रहे होते हैं। ऐसे में निवेशक को यह समझना जरूरी है कि क्या वह सच में डाइवर्सिफिकेशन ले रहा है या सिर्फ एक ही चीज में दो बार निवेश कर रहा है।
हाल के वैल्यू रिसर्च के आंकड़े बताते हैं कि कई मामलों में Flexi Cap और Large & Mid Cap फंड्स के बीच काफी समानता देखने को मिलती है। करीब 31 फंड पेयर्स के विश्लेषण में पाया गया कि सिर्फ एक ही फंड ऐसा था, जिसमें ओवरलैप 20 प्रतिशत से कम था, जबकि 16 फंड्स में यह ओवरलैप 40 प्रतिशत से ज्यादा था। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आप एक ही AMC के Flexi Cap और Large & Mid Cap फंड में निवेश कर रहे हैं, तो संभावना है कि आप एक ही स्टॉक्स में दो बार पैसा लगा रहे हों, जिससे डाइवर्सिफिकेशन का फायदा कम हो सकता है।
Anand Rathi Wealth Limited के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनीष श्रीवास्तव के मुताबिक, Flexi Cap फंड्स में फंड मैनेजर को यह आजादी होती है कि वह बाजार के हालात के हिसाब से लार्ज, मिड या स्मॉल कैप में निवेश बदल सकता है। वहीं Large & Mid Cap फंड्स के लिए नियम तय हैं, जिनके तहत उन्हें कम से कम 35 प्रतिशत लार्ज कैप और 35 प्रतिशत मिड कैप में निवेश करना ही होता है। पुराने आंकड़ों को देखें तो Flexi Cap फंड्स आमतौर पर लार्ज कैप की तरफ ज्यादा झुके रहते हैं, जहां करीब 60 प्रतिशत पैसा लार्ज कैप में और करीब 15 से 20 प्रतिशत मिड कैप में लगाया जाता है।
इसी वजह से दोनों कैटेगरी को साथ रखने से जरूरी नहीं कि पोर्टफोलियो में ओवरलैप बढ़े। अगर निवेशक अपने पोर्टफोलियो को सही तरीके से मॉनिटर करे और मार्केट कैप एक्सपोजर और स्टॉक्स के ओवरलैप पर नजर रखे, तो दोनों फंड मिलकर एक बेहतर और संतुलित एलोकेशन दे सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, HDFC Flexi Cap फंड और HDFC Large & Mid Cap फंड के बीच करीब 20 प्रतिशत का ओवरलैप देखा गया है, जिसमें करीब 14 स्टॉक्स कॉमन हैं। इस तरह का सीमित ओवरलैप डाइवर्सिफिकेशन पर ज्यादा असर नहीं डालता, खासकर तब जब पोर्टफोलियो में स्मॉल कैप या मल्टी कैप जैसे अन्य फंड्स भी शामिल हों। इसलिए सही संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि निवेशक अपने पोर्टफोलियो में अलग-अलग कैटेगरी के फंड्स को शामिल करे और समय-समय पर उनकी समीक्षा करता रहे।
मनीष श्रीवास्तव के अनुसार, अगर Flexi Cap और Large & Mid Cap दोनों फंड एक ही AMC के हैं, तो पोर्टफोलियो में एक तरह का कंसंट्रेशन बढ़ सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक AMC आमतौर पर अपने सभी फंड्स में एक जैसी निवेश रणनीति अपनाता है, जैसे वैल्यू या ग्रोथ स्टाइल, जिससे स्टॉक्स का चयन और फैसले भी मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसका असर यह होता है कि दोनों फंड्स का प्रदर्शन भी काफी हद तक एक जैसा रहने लगता है।
इसके अलावा, एक ही AMC में ज्यादा निवेश करने से ‘AMC कंसंट्रेशन रिस्क’ भी बढ़ जाता है। अगर किसी कारण से उस AMC पर कोई नियामकीय या ऑपरेशनल असर पड़ता है, तो आपके सभी निवेश प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए बेहतर यही माना जाता है कि निवेश को अलग-अलग AMC में फैलाया जाए। एक्सपर्ट्स के अनुसार, किसी एक AMC में कुल पोर्टफोलियो का 25 से 30 प्रतिशत से ज्यादा निवेश नहीं रखना चाहिए।
Motilal Oswal AMC के प्रोडक्ट्स हेड प्रशांत जोशी के अनुसार, व्यवहारिक तौर पर देखें तो ज्यादातर Flexi Cap फंड्स भी काफी हद तक लार्ज कैप या Large & Mid Cap फंड्स जैसे ही दिखते हैं, खासकर जब उनके मार्केट कैप एलोकेशन को देखा जाता है।
हालांकि बाजार के हालात के हिसाब से दोनों का प्रदर्शन अलग हो सकता है। जब बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है और निवेशक सुरक्षित विकल्प तलाशते हैं, तब लार्ज कैप स्टॉक्स बेहतर प्रदर्शन करते हैं। वहीं जब बाजार स्थिर रहता है या तेजी के दौर में होता है, तब Flexi Cap फंड्स को फायदा मिल सकता है, क्योंकि इनमें फंड मैनेजर को अलग-अलग कैटेगरी में निवेश बदलने की आजादी होती है और वे मौके के हिसाब से रणनीति बदल सकते हैं।
वैल्यू रिसर्च के डेटा के मुताबिक 2021 से 2024 तक Large & Mid Cap फंड्स ने बेहतर प्रदर्शन किया, क्योंकि उस समय मिड कैप स्टॉक्स में तेजी थी। लेकिन 2025 में ट्रेंड बदला और Flexi Cap फंड्स आगे निकल गए, क्योंकि लार्ज कैप स्टॉक्स ज्यादा मजबूत रहे।
प्रशांत जोशी के अनुसार, अगर रिस्क और रिटर्न दोनों को साथ में देखा जाए, तो Large & Mid Cap फंड्स इस मामले में बेहतर संतुलन दिखाते हैं। आमतौर पर जोखिम को आंकड़ों के आधार पर मापा जाता है, जिसमें लार्ज कैप स्टॉक्स का उतार-चढ़ाव यानी वोलैटिलिटी कम होती है। इसके मुकाबले Large & Mid Cap फंड्स में मिड कैप एक्सपोजर ज्यादा होने के कारण उतार-चढ़ाव थोड़ा अधिक हो सकता है।
लेकिन रिटर्न के नजरिए से देखें तो यही मिड कैप एक्सपोजर इन फंड्स को बढ़त दिलाता है। यानी थोड़ा ज्यादा जोखिम लेने पर निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना होती है। इस तरह देखा जाए तो Large & Mid Cap फंड्स का ज्यादा रिटर्न, उनके अतिरिक्त जोखिम को काफी हद तक संतुलित कर देता है।
प्रशांत जोशी के अनुसार, Large & Mid Cap फंड्स को सिर्फ इसलिए ज्यादा जोखिम वाला नहीं माना जा सकता क्योंकि इनमें मिड कैप का एक्सपोजर ज्यादा होता है। दरअसल, मिड कैप कंपनियों का ग्रुप करीब 150 मजबूत कंपनियों का होता है, जिन्हें बाजार में काफी पसंद किया जाता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मिड कैप कंपनियों में कमाई बढ़ने की संभावना लार्ज कैप के मुकाबले ज्यादा होती है, जहां ग्रोथ अक्सर सीमित हो जाती है।
इसके अलावा, मिड कैप स्टॉक्स लगभग हर तरह के इक्विटी और हाइब्रिड फंड्स में शामिल होते हैं, क्योंकि ये पोर्टफोलियो में अतिरिक्त रिटर्न यानी अल्फा देने में मदद करते हैं। यहां तक कि स्मॉल कैप फंड्स भी अपने पोर्टफोलियो को थोड़ा स्थिर रखने के लिए मिड कैप में निवेश करते हैं। यही कारण है कि मिड कैप को सिर्फ जोखिम के नजरिए से नहीं, बल्कि ग्रोथ और बैलेंस के नजरिए से भी देखा जाता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आप Flexi Cap और Large & Mid Cap दोनों कैटेगरी में निवेश करना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। सबसे पहले, दोनों फंड अलग-अलग AMC से चुनना बेहतर माना जाता है, ताकि एक ही तरह की निवेश रणनीति का असर कम हो। इसके अलावा, समय-समय पर पोर्टफोलियो का ओवरलैप चेक करते रहना चाहिए, ताकि यह समझ में आए कि कहीं एक ही स्टॉक्स में बार-बार निवेश तो नहीं हो रहा। साथ ही, साल में कम से कम एक बार अपने पूरे पोर्टफोलियो की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा सकें।
मनीष श्रीवास्तव के अनुसार, एक संतुलित पोर्टफोलियो के लिए मार्केट कैप के हिसाब से सही एलोकेशन भी जरूरी है। उनके मुताबिक, कुल निवेश का करीब 50 से 55 प्रतिशत हिस्सा लार्ज कैप में होना चाहिए, 20 से 25 प्रतिशत मिड कैप में और बाकी हिस्सा स्मॉल कैप में रखा जा सकता है, ताकि जोखिम और रिटर्न के बीच सही संतुलन बना रहे।
वहीं Motilal Oswal AMC के प्रोडक्ट्स हेड प्रशांत जोशी का कहना है कि Large & Mid Cap फंड्स में पहले से ही कम से कम 35 प्रतिशत लार्ज कैप का एक्सपोजर होता है, जो ज्यादातर निवेशकों के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। उनके मुताबिक, जिन निवेशकों का जोखिम लेने का स्तर मध्यम से ज्यादा है, उन्हें अलग से लार्ज कैप में ज्यादा निवेश करने की जरूरत नहीं होती। हालांकि, जो निवेशक ज्यादा सुरक्षित रहना चाहते हैं, वे अपने पोर्टफोलियो में करीब 15 प्रतिशत अतिरिक्त लार्ज कैप फंड जोड़ सकते हैं, ताकि कुल लार्ज कैप एक्सपोजर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि तीन साल या उससे ज्यादा समय के निवेश के लिए 50 प्रतिशत से ज्यादा लार्ज कैप में निवेश करना जरूरी नहीं होता, क्योंकि इससे ग्रोथ के मौके कम हो सकते हैं।
मनीष श्रीवास्तव के अनुसार, अगर आपके पोर्टफोलियो में दोनों फंड एक ही AMC के हैं और उनमें ओवरलैप 25 प्रतिशत से ज्यादा हो रहा है, तो ऐसे में एक फंड को बदलने पर विचार किया जा सकता है। इससे पोर्टफोलियो में बेहतर डाइवर्सिफिकेशन लाया जा सकता है और एक ही तरह के स्टॉक्स में ज्यादा एक्सपोजर से बचा जा सकता है।
साथ ही, Flexi Cap फंड्स को यहां थोड़ा फायदा मिलता है, क्योंकि इनमें फंड मैनेजर के पास बाजार के हिसाब से निवेश बदलने की पूरी आजादी होती है। यही लचीलापन उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर मौके पकड़ने का अवसर देता है।