म्युचुअल फंड

लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड में गिरावट: बढ़ती यील्ड्स से झटका, अब बेचें या होल्ड करें?

लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड वे डेट फंड होते हैं जिनकी मैकाले ड्यूरेशन (Macaulay Duration) 7 साल से ज्यादा होती है

Published by
संजय कुमार सिंह   
कार्तिक जेरोम   
Last Updated- April 09, 2026 | 3:51 PM IST

लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड पिछले एक साल में डेट म्युचुअल फंड कैटेगरी में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले रहे हैं। इस 13,048 करोड़ रुपये की कैटेगरी ने औसतन 2.7 फीसदी का नेगेटिव रिटर्न दिया है।

लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड कैसे काम करते हैं?

लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड वे डेट फंड होते हैं जिनकी मैकाले ड्यूरेशन (Macaulay Duration) 7 साल से ज्यादा होती है। मैकाले ड्यूरेशन एक माप है जिसे बाजार नियामक SEBI डेट म्युचुअल फंड्स को कैटेगराइज करने के लिए इस्तेमाल करता है। यह बताता है कि किसी फंड के पोर्टफोलियो को ब्याज दर (interest rate) में बदलाव के हिसाब से प्रभावित होने में औसतन कितना समय लगता है।

सीधे-सीधे कहें, तो जितनी ज्यादा मैकाले ड्यूरेशन होगी, उतना ज्यादा फंड ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशील होगा। इसका मतलब है कि ये फंड ब्याज दर में बदलाव होने पर बहुत ज्यादा ऊपर-नीचे (volatile) हो सकते हैं।

मिरे असेट शेयरखान के इन्वेस्टमेंट सॉल्यूशन और डिस्ट्रीब्यूशन के हेड गौतम कालिया कहते हैं, “जब ब्याज दरें घटती हैं, तो अंडरलेइंग बॉन्ड्स (underlying bonds) की कीमतें बढ़ती हैं और इससे कैपिटल गेन होता है।” उन्होंने यह भी बताया कि इसका उल्टा तब होता है जब ब्याज दरें बढ़ती हैं।

वह आगे कहते हैं, “ये फंड्स ज्यादा रिटर्न की संभावना दे सकते हैं, लेकिन इनके साथ ज्यादा जोखिम भी जुड़े होते हैं।”

Also Read: Kotak MF ने उतारा मल्टी एसेट फंड, ₹500 की SIP में इक्विटी से लेकर गोल्ड तक निवेश का मौका

बढ़ती यील्ड्स से नेगेटिव रिटर्न

10-वर्षीय सरकारी प्रतिभूति (G-sec) की यील्ड मई 2025 में 6.25 फीसदी से बढ़कर अप्रैल 2026 में लगभग 7.1 फीसदी हो गई। यह बढ़ोतरी अमेरिका द्वारा टैरिफ की घोषणा के बाद शुरू हुई। अगस्त 2025 में, भारतीय टैरिफ को बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया, जिससे बाजार की धारणा कमजोर हुई और बॉन्ड यील्ड्स बढ़कर लगभग 6.6 फीसदी तक पहुंच गईं।

मीरा मनी के हेड ऑफ इन्वेस्टमेंट रिसर्च और फाउंडिंग मेंबर मोहित बसंत बागड़ी कहते हैं, “इसके बाद वैश्विक केंद्रीय बैंकों (global central banks) की ब्याज दर नीति का रुख भी काफी बदल गया, क्योंकि उन्होंने दरों में कटौती को रोक दिया या आगे कटौती की उम्मीदों को कम कर दिया।”

अंतिम बड़ा झटका मार्च 2026 में आया, जब अमेरिका–ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें 65–70 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर से ऊपर पहुंच गईं।

बागड़ी कहते हैं, “भारत में 10-वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड, जो लगभग 6.6–6.7 फीसदी के आसपास थी, तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई-चेन बाधाओं के कारण बढ़ती महंगाई की आशंका से बढ़कर लगभग 7.1 फीसदी तक पहुंच गई।”

उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादा यील्ड्स (higher yields) के कारण लॉन्ग-ड्यूरेशन बॉन्ड फंड्स में मार्क-टू-मार्केट नुकसान हुआ, यानी उनके मूल्य में गिरावट दर्ज की गई।

क्या रिटर्न में सुधार होगा?

यदि संघर्ष लंबे समय तक चलता है या और तेज हो जाता है, तो ऊर्जा (energy) की कीमतें और भी ज्यादा बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ेगा और इसके परिणामस्वरूप बॉन्ड यील्ड्स भी ऊपर जा सकती हैं। भले ही, भू-राजनीतिक तनाव कम हो जाए, लेकिन बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों से पैदा हुई महंगाई को कम होने में समय लग सकता है।

कालिया कहते हैं, “इसलिए निकट भविष्य में बॉन्ड यील्ड्स पर ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है।”

Also Read: Tata Small Cap Fund: लंपसप निवेश फिर से शुरू; 7 साल में ₹1 लाख के बना चुका है ₹3.66 लाख

सट्टे का जोखिम

निवेशक अक्सर इन फंड्स में थोड़े समय के लिए निवेश इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि ब्याज दरें कम होंगी। मनीएडस्कूल के फाउंडर अर्नव पंड्या कहते हैं, “मुख्य जोखिम यह है कि ब्याज दरें उम्मीद के अनुसार नहीं बदल सकतीं।” अगर ऐसा होता है, तो जो निवेशक अपनी निवेश अवधि को बढ़ा नहीं सकते, उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

क्या मौजूदा निवेशकों को बाहर निकलना चाहिए?

10-वर्षीय सरकारी प्रतिभूती यील्ड के 7 फीसदी से ऊपर जाने के साथ ही, काफी हद तक नुकसान पहले ही हो चुका है। पंड्या कहते हैं, “जो मौजूदा निवेशक अब तक कोई कदम नहीं उठा पाए हैं, वे इन फंड्स को होल्ड करने पर विचार कर सकते हैं। यह समझते हुए कि जिन अधिक रिटर्न की उन्हें उम्मीद थी, वे अब हासिल होने में ज्यादा समय ले सकते हैं।”

ब्याज दर बढ़ने के साथ-साथ पोर्टफोलियो में होने वाली वृद्धि भी बेहतर होती है। कॉर्पोरेट ट्रेनर (डेट) और लेखक जॉयदीप सेन कहते हैं, “निवेशित रहने से निवेशकों को पहले की तुलना में ज्यादा वृद्धि का लाभ मिलता है, क्योंकि ब्याज दर का स्तर बढ़ गया है।”

क्या नए निवेशकों को अभी निवेश करना चाहिए?

नए निवेशकों के लिए बेहतर होगा कि वे अभी कुछ और समय इंतजार करें। 7 फीसदी से ऊपर यील्ड होने के साथ, बाजार पहले ही कई नेगेटिव फैक्टर्स को कीमतों में शामिल कर चुका है। लेकिन अभी भी इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं है कि खाड़ी देशों में हुए नुकसान का असर कितना गंभीर होगा। यह कारक भविष्य में महंगाई (inflation) और ब्याज दरों (interest rates) को प्रभावित कर सकता है।

पंड्या कहते हैं, “जब तक इन मुद्दों पर स्पष्टता नहीं आती, नए निवेशकों को इससे दूर रहना चाहिए।” वैकल्पिक रूप से, वे धीरे-धीरे निवेश शुरू कर सकते हैं।

Also Read: Flexi Cap Funds पर निवेशक लट्टू, FY26 में झोंके ₹79,159 करोड़; AUM 22% बढ़ा

एक्सपोजर और निवेश अवधि

थोड़ा जोखिम (moderate) और कम जोखिम (conservative) लेने वाले निवेशक अपने फिक्स्ड-इनकम पोर्टफोलियो का लगभग 10 फीसदी पैसा इन फंड्स में लगा सकते हैं।

सेन ने कहा, “ज्यादा जोखिम लेने वाले निवेशक अपने फिक्स्ड-इनकम हिस्से का लगभग 30 फीसदी तक निवेश कर सकते हैं।” सेन आगे बताते हैं कि निवेश की अवधि लगभग उतनी ही होनी चाहिए जितनी फंड के पोर्टफोलियो की मैच्योरिटी होती है।

पंड्या कहते हैं, “यह समय अवधि निवेशकों के लिए ब्याज दरों के गिरने वाले चक्र (falling rate cycle) को पार करने की संभावना बढ़ा देती है।

First Published : April 9, 2026 | 3:51 PM IST