म्युचुअल फंड

Multi-Asset FoF: निवेश करें या नहीं? एक्टिव vs पैसिव में कहां है ज्यादा फायदा, कितना है रिस्क

Multi-Asset FoF कैटेगरी में अब कुल 18 फंड हाउस शामिल हो गए हैं, जिनके पास कुल मिलाकर 14,797 करोड़ रुपये का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) है

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संजय कुमार सिंह   
कार्तिक जेरोम   
Last Updated- April 24, 2026 | 4:21 PM IST

Multi-asset fund-of-funds: कोटक म्युचुअल फंड ने हाल ही में मल्टी-एसेट एक्टिव फंड-ऑफ-फंड्स (FoF) लॉन्च किया है। इस कैटेगरी में अब कुल 18 फंड हाउस शामिल हो गए हैं, जिनके पास कुल मिलाकर 14,797 करोड़ रुपये का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) है।

मल्टी-एसेट FoF क्या होता है?

मल्टी-एसेट FoF सीधे शेयर या बॉन्ड में निवेश नहीं करता। इसके बजाय यह दूसरे फंड्स में निवेश करता है, जिन्हें “अंडरलाइनिंग फंड्स” कहा जाता है। ये फंड्स आमतौर पर उसी फंड हाउस के होते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है। इसके पोर्टफोलियो में कई तरह के फंड शामिल हो सकते हैं, जैसे इक्विटी फंड, डेट (फिक्स्ड इनकम) फंड, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) और कमोडिटी ईटीएफ (commodity ETFs)।

FoFs कैसे काम करता है?

FoF का फंड मैनेजर यह तय करता है कि पैसे को किन-किन एसेट क्लास (जैसे शेयर, बॉन्ड आदि) में कितना निवेश करना है। इसके बाद उन चुने गए फंड्स के मैनेजर अपने-अपने फंड के अंदर निवेश के फैसले लेते हैं।

फंड्सइंडिया के सीनियर मैनेजर (रिसर्च) जिरल मेहता कहते हैं, “FoF का फंड मैनेजर पूरे एसेट एलोकेशन का निर्णय लेता है, जबकि अलग-अलग स्कीम मैनेजर अपने फंड्स के भीतर निवेश संभालते हैं।”

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मल्टी एसेट फंड और मल्टी-एसेट FoF में अतर

इसके विपरीत, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड सीधे सिक्योरिटीज में निवेश करता है, जैसे शेयर, बॉन्ड और कमोडिटी ETFs। मेहता के अनुसार, “इन फंड्स को कम से कम तीन अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश करना जरूरी होता है, और हर एसेट क्लास में कम से कम 10 फीसदी निवेश होना चाहिए।”

इन एसेट क्लास में आम तौर पर शामिल होते हैं:

  • इक्विटी (शेयर)
  • डेट (बॉन्ड/फिक्स्ड इनकम)
  • अन्य जैसे गोल्ड या रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs)

मेहता आगे बताते हैं कि मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड में फंड मैनेजर न सिर्फ यह तय करता है कि किस एसेट क्लास में कितना निवेश होगा, बल्कि हर एसेट क्लास के अंदर कौन-सी सिक्योरिटीज चुनी जाएंगी, इसका भी एक्टिव रूप से मैनेजमेंट करता है।

मल्टी एसेट FoFs के फायदे

मल्टी-एसेट FoF में एक ही फंड के जरिए निवेशकों को अलग-अलग एसेट क्लास में एक्सपोजर मिल जाता है, वह भी अंडरलाइनिंग फंड्स के माध्यम से। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी (simplicity) है। मेहता के अनुसार, “जो निवेशक बिना झंझट के एक ही जगह निवेश करना चाहते हैं, उन्हें एक तैयार पोर्टफोलियो मिल जाता है।”

इसमें एक प्रोफेशनल फंड मैनेजर इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसे एसेट क्लास में निवेश का निर्णय लेता है और समय-समय पर पोर्टफोलियो को रीबैलेंस भी करता है। निवेशकों को बस निवेश करना और उसके प्रदर्शन पर नजर रखना होता है।

FoF टैक्स के लिहाज से भी फायदेमंद होते हैं। नुवामा वेल्थ के प्रेसिडेंट और हेड राहुल जैन के अनुसार, “एसेट क्लास के बीच होने वाले आंतरिक बदलावों पर निवेशक को कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना पड़ता।”

इसके विपरीत, अलग-अलग फंड्स में रीबैलेंसिंग करने पर हर बार रिडेम्प्शन (निवेश निकालने) को टैक्स योग्य घटना माना जाता है। जैन के अनुसार, “लंबी अवधि के निवेशकों के लिए टैक्स की बचत से मिलने वाला कंपाउंडिंग रिटर्न एक वास्तविक फायदा बन सकता है।”

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मल्टी एसेट FoFs के नुकसान

इन स्कीम्स में फंड मैनेजर यह तय करता है कि किस एसेट क्लास में कितना निवेश होगा, और यह एलोकेशन हर निवेशक की जरूरत के अनुसार सही हो, यह जरूरी नहीं है। हो सकता है कि किसी निवेशक को एक अलग तरह का पोर्टफोलियो मिक्स पसंद हो।

मल्टी-एसेट FoFs पर टैक्स भी एक कमी मानी जाती है। अगर निवेश 24 महीने से कम समय के लिए है, तो उस पर निवेशक के इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। 24 महीने के बाद बिना इंडेक्सेशन के 12.5% टैक्स लगता है।

डेजर्व के को-फाउंडर वैभव पोरवाल के अनुसार, “यह टैक्स व्यवस्था उस इक्विटी टैक्सेशन की तुलना में कम अनुकूल है, जो निवेशक को सीधे इक्विटी फंड रखने पर मिलती है।”

मल्टी-एसेट FoFs के भीतर दो प्रकार होते हैं:

  • एक्टिव (Active)
  • पैसिव (Passive)

मल्टी-एसेट एक्टिव FoFs

मल्टी-एसेट एक्टिव FoF में, अंडरलाइनिंग स्कीम्स (जिसमें फंड निवेश करता है) आम तौर पर एक्टिवली मैनेज्ड फंड्स होते हैं, केवल कमोडिटी ETFs को छोड़कर। इन स्कीम्स में निवेश करने वाले निवेशक न केवल FoF मैनेजर पर भरोसा करते हैं कि वह सही एसेट एलोकेशन (किस एसेट में कितना निवेश होगा) का निर्णय ले, बल्कि यह भी जरूरी होता है कि अंडरलाइनिंग फंड्स के मैनेजर सही सिक्योरिटीज (शेयर/बॉन्ड आदि) का चयन करें।

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मल्टी-एसेट एक्टिव FoFs के फायदे

FoF मैनेजर अलग-अलग एसेट क्लास और मार्केट कैपिटलाइजेशन सेगमेंट्स में एक्टिव रूप से एलोकेशन के फैसले लेता है। फिक्स्ड इनकम हिस्से में भी मैनेजर यह तय करता है कि ब्याज दर और क्रेडिट के मामले में किस तरह की पोजिशन रखी जाए।

इसके बाद अंडरलाइनिंग फंड्स अपने-अपने स्तर पर भी एक्टिव निवेश निर्णय लेते हैं। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन के अनुसार, “एक एक्टिव मैनेजर किसी कम आकर्षक सेक्टर में निवेश को कम कर सकता है और किसी ज्यादा आकर्षक दिखने वाले सेक्टर में निवेश को बढ़ा सकता है।

यह लचीलापन खास तौर पर तब बहुत उपयोगी हो जाता है जब बाजार में तेज उतार-चढ़ाव या अस्थिरता होती है। पोरवाल के अनुसार, “ऐसे समय में एक्टिव मैनेजर बेहतर क्वालिटी वाले डेट की ओर शिफ्ट कर सकते हैं, किसी स्टॉक में एक्सपोजर कम कर सकते हैं, या सेक्टर्स के बीच निवेश को बदल सकते हैं ताकि पूंजी (capital) की सुरक्षा हो सके।”

इस तरह के प्रोएक्टिव फंड मैनेजमेंट फैसले अतिरिक्त रिटर्न (alpha) पैदा करने में मदद कर सकते हैं।

मल्टी-एसेट एक्टिव FoFs के नुकसान

इन एक्टिव FoFs के व्यापक और अलग-अलग प्रकार के निवेश उद्देश्यों के कारण कुछ जोखिम और अनिश्चितताएं भी पैदा होती हैं। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के डायरेक्टर-मैनेजर रिसर्च कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, “निवेशक को यह स्पष्ट रूप से पता नहीं होता कि फंड इक्विटी के भीतर किस तरह का एक्सपोजर लेगा, या वह किन मार्केट कैपिटलाइजेशन (लार्ज, मिड या स्मॉल कैप) सेगमेंट्स में निवेश करेगा। फंड कभी-कभी थीमैटिक फंड्स में भी जा सकता है। ये सभी फैसले फंड मैनेजर द्वारा लिए जाते हैं और इन पर निवेशक का कोई नियंत्रण नहीं होता।”

हालांकि एक्टिव फंड्स अतिरिक्त रिटर्न (alpha) पैदा कर सकते हैं, लेकिन वे अपने बेंचमार्क से कम प्रदर्शन (underperform) भी कर सकते हैं। बेलापुरकर के अनुसार, “अगर कोई अंडरलाइनिंग फंड खराब प्रदर्शन करता है, तो निवेशक के पास यह नियंत्रण नहीं होता कि उस पोजिशन को कितने समय तक बनाए रखा जाएगा।”

एक और जोखिम खर्च (expense ratio) के स्ट्रक्चर से जुड़ा होता है। मल्टी-एसेट FoF में खुद का भी एक्सपेंस रेशियो होता है, और साथ ही इसमें शामिल अंडरलाइनिंग एक्टिव फंड्स की लागत भी जुड़ती है, जो आमतौर पर पैसिव फंड्स की तुलना में ज्यादा महंगी होती है। बेलापुरकर कहते हैं, “ये फंड्स काफी महंगे हो सकते हैं, खासकर तब जब मल्टी-एसेट FoF का आकार (AUM) छोटा हो।”

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मल्टी-एसेट पैसिव FoFs

मल्टी-एसेट पैसिव FoF केवल पैसिव फंड्स में निवेश करता है, जैसे इंडेक्स फंड्स या ETFs। ये स्कीम्स एक्टिवली मैनेज्ड फंड्स में निवेश नहीं करतीं।

ये फंड्स आमतौर पर पहले से तय (pre-decided) एसेट एलोकेशन फ्रेमवर्क का पालन करते हैं। कुछ मल्टी-एसेट पैसिव FoFs नियम-आधारित (rules-based) और लगभग स्थिर (static) एलोकेशन मॉडल अपनाते हैं। इनमें एसेट मिक्स एक सीमित दायरे के भीतर रहता है और फंड मैनेजर समय-समय पर रीबैलेंसिंग करता है। वहीं कुछ अन्य स्कीम्स में फंड मैनेजर को एसेट एलोकेशन को लेकर काफी स्वतंत्रता भी होती है।

नियम-आधारित संरचना और मैनेजर की स्वतंत्रता का अनुपात हर स्कीम में अलग-अलग होता है। पोरवाल के अनुसार, “निवेश से पहले यह जांचना सबसे महत्वपूर्ण बात है।”

मल्टी-एसेट पैसिव FoFs के फायदे

पैसिव फंड्स ज्यादा अनुमानित परिणाम देते हैं। इन स्कीम्स में फंड मैनेजर के चयन से जुड़ा जोखिम नहीं होता। स्टॉक सेलेक्शन में किसी तरह का फंड मैनेजर का पक्षपात (bias) नहीं आता और न ही किसी एक या कुछ शेयरों पर किए गए बड़े दांव से अचानक नुकसान होने की आशंका रहती है।

एक एक्टिव मल्टी-एसेट FoF में निवेशक इस बात पर निर्भर होता है कि FoF मैनेजर सही एसेट एलोकेशन का निर्णय ले और ऐसे एक्टिव फंड मैनेजर्स को चुने जो अच्छा प्रदर्शन करें। जबकि पैसिव FoF में अतिरिक्त रिटर्न या कम प्रदर्शन का मुख्य स्रोत केवल एसेट एलोकेशन ही होता है।

लागत भी पैसिव मल्टी-एसेट FoFs का एक बड़ा फायदा है। पोरवाल के अनुसार, “एक पैसिव FoF पर कुल खर्च की अधिकतम सीमा 1 फीसदी होती है। इसके अलावा इसमें शामिल अंडरलाइनिंग स्कीम्स इंडेक्स फंड्स और ETFs होते हैं, जिनकी फीस भी कम होती है।”

वे आगे कहते हैं कि 15 से 20 साल की लंबी अवधि में यह लागत का अंतर कंपाउंडिंग के जरिए अंतिम निवेश राशि (corpus) में बड़ा फर्क पैदा कर सकता है।

मल्टी-एसेट पैसिव FoFs के नुकसान

एक पैसिव फंड किसी इंडेक्स में निवेश करता है, और उस इंडेक्स में अच्छे और कमजोर दोनों तरह के स्टॉक्स शामिल होते हैं। फंड मैनेजर के पास यह स्वतंत्रता नहीं होती कि वह बाजार के आउटलुक के आधार पर किसी सेक्टर या स्टॉक का वेट (कम या ज्यादा) बदल सके। एक पैसिव मैनेजर किसी सेक्टर में एक्सपोजर सिर्फ इसलिए कम नहीं कर सकता क्योंकि वह महंगा लग रहा है या उसका आउटलुक नेगेटिव है।

यह तरीका उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो मानते हैं कि बाजार कुशल (efficient) होते हैं। पोरवाल के अनुसार, “यह उन निवेशकों के लिए है जो मानते हैं कि लॉन्ग टर्म रिटर्न का सबसे बड़ा कारण एसेट एलोकेशन होता है, और फीस के बाद लगातार बेहतर रिटर्न (alpha) सिर्फ स्टॉक चयन से हासिल करना मुश्किल होता है।”

यह विकल्प उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो कम लागत वाला और स्पष्ट नियमों पर आधारित निवेश तरीका पसंद करते हैं, न कि फंड मैनेजर के व्यक्तिगत फैसलों पर निर्भर रहना चाहते हैं। साथ ही, निवेश की शुरुआत करने वाले नए निवेशक भी मल्टी-एसेट पैसिव FoF को एक सरल और व्यवस्थित विकल्प के रूप में चुन सकते हैं।

नए निवेशक भी मल्टी-एसेट पैसिव FoF विकल्प पर विचार कर सकते हैं। विशाल धवन के अनुसार, “यह उन निवेशकों के लिए कम बेहतर विकल्प हो सकता है जो ज्यादा रिटर्न या अल्फा (alpha) जनरेट करने की उम्मीद रखते हैं।”

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मल्टी-एसेट ओम्नी FoF विकल्प

ओम्नी FoF एक ही मल्टी-एसेट स्ट्रक्चर के भीतर एक्टिव और पैसिव दोनों रणनीतियों को मिलाकर निवेश करता है। इसमें फंड मैनेजर वहां पैसिव निवेश (जैसे इंडेक्स फंड या ETF) चुन सकता है, जहां यह ज्यादा बेहतर हो, और जहां एक्टिव मैनेजमेंट से बेहतर फायदा मिल सकता है, वहां एक्टिव फंड्स में निवेश कर सकता है।

धवन के अनुसार, “इससे फंड मैनेजर को यह लचीलापन मिलता है कि वह अंडरलाइनिंग लेवल पर एक्टिव और पैसिव दोनों तरह के फंड्स का इस्तेमाल कर सके।”

निवेश से पहले इन बातों का रखें ध्यान

फंड चुनने की प्रक्रिया की शुरुआत केवल रिटर्न की तुलना से न करें। सबसे पहले यह तय करें कि आप किस तरह का एसेट मिक्स चाहते हैं। ज्यादा जोखिम लेने वाले निवेशक (Aggressive investors) आमतौर पर कम जोखिम लेने वाले निवेशकों (conservative investors) की तुलना में ज्यादा इक्विटी एक्सपोजर रखना चाहते हैं।

FoF मैनेजर के एसेट एलोकेशन फ्रेमवर्क को अच्छी तरह समझें। यह देखें कि एसेट एलोकेशन की सीमा कितनी व्यापक है और मैनेजर अपनी उपलब्ध स्वतंत्रता का कितना आक्रामक तरीके से उपयोग करता है।

यह भी जांचें कि FoF मैनेजर केवल अपने ही फंड हाउस (in-house) की स्कीम्स में निवेश कर सकता है या अन्य फंड हाउस की स्कीम्स में भी निवेश की अनुमति है। जैन के अनुसार, “ऐसी स्थिति में निवेशक को देश का सबसे अच्छा इक्विटी या डेट फंड नहीं मिल पाता, बल्कि सिर्फ उसी फंड हाउस के भीतर उपलब्ध बेहतरीन विकल्प ही मिलते हैं।”

धवन का कहना है कि ऐसा फ्रेमवर्क, जिसमें इन-हाउस और बाहरी दोनों तरह की स्कीम्स में निवेश की अनुमति हो, मैनेजर को ज्यादा विकल्प और लचीलापन देता है।

First Published : April 24, 2026 | 4:21 PM IST