Mutual Funds: दिल्ली के राजेश गुप्ता (काल्पनिक नाम) पिछले छह साल से म्युचुअल फंड में निवेश कर रहे थे। हर महीने की तरह इस बार भी उन्होंने अपने मोबाइल में निवेश ऐप खोला। लेकिन इस बार स्क्रीन पर हरे रंग की जगह लाल रंग ज्यादा दिखाई दे रहा था। बाजार गिर चुका था और उनके इक्विटी फंड का मूल्य भी कम हो गया था।
राजेश के मन में पहला सवाल आया, “क्या मुझे इक्विटी से पैसा निकालकर डेट फंड में डाल देना चाहिए?” यह सवाल सिर्फ राजेश का नहीं है। बाजार में गिरावट आते ही लाखों निवेशकों के मन में यही चिंता उठती है। लेकिन निवेश विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे समय में घबराहट में फैसला लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है।
द वेल्थ कंपनी म्युचुअल फंड के डिप्टी सीईओ प्रसन्ना पाठक का कहना है कि बाजार में तेज गिरावट अक्सर निवेशकों को इमोशनल बना देती है। उनके अनुसार निवेशकों को तुरंत फैसला लेने के बजाय पहले अपने निवेश के मूल उद्देश्य, समय सीमा और एसेट एलोकेशन को दोबारा देखना चाहिए। वे कहते हैं कि शेयर बाजार में गिरावट कोई असामान्य घटना नहीं है। इतिहास बताता है कि बाजार के चक्र में गिरावट और तेजी दोनों आते रहते हैं। कई बार बाजार की यही गिरावट समझदारी से निवेश करने वालों के लिए अच्छा मौका बन जाती है।
निवेश विशेषज्ञों की राय साफ है, हर बार बाजार गिरने पर इक्विटी से डेट फंड में जाना सही रणनीति नहीं है। जिराफ के को-फाउंडर सौरव घोष का कहना है कि बाजार गिरने पर अचानक निवेश का बंटवारा बदलना अक्सर नुकसान पहुंचा सकता है। उनके अनुसार इक्विटी और डेट दोनों का पोर्टफोलियो में अलग-अलग काम होता है। जिस पैसे की जरूरत कम या मध्यम समय में पड़ सकती है, उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्पों जैसे डेट फंड या अच्छी क्वालिटी वाले बॉन्ड में रखना बेहतर होता है। वहीं लंबे समय में संपत्ति बनाने के लिए इक्विटी को बेहतर विकल्प माना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक बाजार में उतार-चढ़ाव के समय सबसे अहम चीज एसेट एलोकेशन होती है। इसका मतलब है कि निवेश को अलग-अलग साधनों में बांटकर रखना। अगर पोर्टफोलियो में इक्विटी और डेट का सही संतुलन हो, तो बाजार की गिरावट का असर कम हो जाता है। म्युचुअल फंड विशेषज्ञ एके निगम का कहना है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान पोर्टफोलियो का रीबैलेंसिंग करना एक बेहतर तरीका हो सकता है। इससे निवेशक कुछ मुनाफा सुरक्षित कर सकता है और जोखिम भी कम कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एसआईपी निवेशकों को बाजार की गिरावट से डरने की जरूरत नहीं है। गिरावट के समय एसआईपी के जरिए निवेश करने पर कम कीमत पर ज्यादा यूनिट मिलती हैं। इसे रुपये लागत औसत (rupee cost averaging) का लाभ कहा जाता है। प्रसन्ना पाठक के अनुसार, निवेश की शुरुआती अवधि में बाजार का उतार-चढ़ाव वास्तव में निवेशकों के लिए लाभकारी हो सकता है, क्योंकि इससे लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
लैडरअप एसेट मैनेजर्स के को-फाउंडर राघवेंद्र नाथ के मुताबिक बाजार गिरने पर सबसे आम गलती घबराकर निवेश बेच देना है। जब निवेशक डर के कारण गिरावट में अपने निवेश बेच देते हैं, तो अस्थायी नुकसान स्थायी नुकसान में बदल जाता है। इसके बाद कई लोग नकदी लिए बैठे रहते हैं और बाजार की वापसी का फायदा नहीं उठा पाते। वे यह भी कहते हैं कि लगातार नकारात्मक खबरें देखना भी निवेशकों को गलत फैसले लेने के लिए प्रेरित कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इक्विटी में निवेश का सबसे बड़ा आधार समय अवधि होती है। अगर निवेश का लक्ष्य 5 से 10 साल या उससे अधिक दूर है, तो बाजार का मौजूदा उतार-चढ़ाव ज्यादा मायने नहीं रखता। लेकिन अगर पैसे की जरूरत अगले 1 या 2 साल में है, तो उस राशि को पहले से ही अपेक्षाकृत सुरक्षित साधनों में रखना बेहतर माना जाता है।
विशेषज्ञों की राय में बाजार की गिरावट से घबराने के बजाय अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। हर गिरावट में इक्विटी छोड़कर डेट फंड में जाना सही रणनीति नहीं है। सही तरीका यह है कि निवेशक अपने लक्ष्य, समय सीमा और जोखिम क्षमता के अनुसार पोर्टफोलियो बनाएं, समय-समय पर उसका संतुलन ठीक करें और लंबी अवधि की योजना पर टिके रहें। क्योंकि निवेश की दुनिया में अक्सर सबसे बड़ा लाभ उसी को मिलता है जो धैर्य बनाए रखता है।