Small Cap Funds: पिछले एक महीने में स्मॉल कैप म्युचुअल फंड्स ने शानदार रिटर्न देकर निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह इस अवधि की इकलौती ऐसी कैटेगरी रही, जिसने 10% से ज्यादा के डबल डिजिट रिटर्न दिए और मिड कैप व लार्ज कैप फंड्स को भी साफ तौर पर पीछे छोड़ दिया। ऐसे में निवेशकों के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि क्या यह तेजी आगे भी बनी रहेगी या फिर यह सिर्फ शॉर्ट-टर्म उछाल है? मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तेजी असल में हालिया गिरावट के बाद आई एक तेज रिकवरी है, न कि किसी लंबे समय तक चलने वाले बुल रन की शुरुआत। उनका यह भी कहना है कि इस सेगमेंट में लगातार आ रहे SIP निवेश ने इस बेहतर प्रदर्शन को सहारा दिया है, जिससे स्मॉल कैप फंड्स को अतिरिक्त मजबूती मिली है।
स्मॉल-कैप फंड्स ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले होते है। बुल मार्केट में ये फंड्स तेजी से ऊपर जाते हैं, वहीं गिरावट के समय ये बाजार के मुकाबले ज्यादा तेजी से नीचे भी आ सकते हैं। बीपीएन फिनकैप के डायरेक्टर ए के निगम कहते हैं, “एक महीने में 10% की रैली निश्चित रूप से तेज है, लेकिन इसे अभी स्थायी रैली का सबूत नहीं माना जा सकता। स्मॉल-कैप शेयर हाई-बीटा होते हैं– ये सबसे तेजी से गिरते हैं और उतनी ही तेजी से उछाल भी दिखाते हैं। पिछले 18 महीनों में हमने ऐसे 8-12% के तीन उछाल देखे हैं, जो बाद में टिक नहीं पाए।”
मार्केट एक्सपर्ट्स अजित गोस्वामी ने कहा, “मैं इस मामले में बाजार को लेकर साफ और ईमानदार रहना चाहता हूं। जो हमने हाल में देखा है, वह एक तेज और वाजिब राहत भरी तेजी है, न कि किसी नए बुल मार्केट की शुरुआत। करीब 12 महीनों की लगातार बिकवाली के बाद स्मॉल कैप शेयर बुरी तरह ओवरसोल्ड हो गए थे, इसलिए यह उछाल स्वाभाविक था। लेकिन तर्कसंगत होना और लंबे समय तक टिकना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।”
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मजबूत SIP निवेश से आई लिक्विडिटी, हालिया 20% गिरावट के बाद वैल्यूएशन का सस्ता होना, और चौथी तिमाही में डिफेंस, कैपिटल गुड्स और EMS सेक्टर में मिले ऑर्डर्स– इन सबने मिलकर इस तेजी को बढ़ावा दिया। यानी यह तेजी फंड फ्लो और सेक्टर-स्पेसिफिक घटनाओं का मिक्स है।
सीधे शब्दों में कहें तो, बाजार ने वही किया जो ज्यादा घरेलू लिक्विडिटी होने पर अक्सर होता है। पैसा गिर चुके स्मॉल-कैप शेयरों में चला गया। गोस्वामी बताते हैं, SIP का पैसा हर महीने करीब 26,000 करोड़ रुपये आता रहता है, चाहे बाजार का माहौल कमजोर ही क्यों न हो। धीरे-धीरे यही पैसा बिकवाली पर भारी पड़ता है।
वह आगे कहते हैं, “ओवरसोल्ड स्थिति से सुधरता सेंटिमेंट भी इस तेजी में सहायक रहा। साथ ही, डिफेंस, कैपिटल गुड्स और रेलवे जैसे सेक्टर्स में मजबूत ऑर्डर बुक ने इस उछाल को कुछ हद तक भरोसेमंद बनाया। लेकिन अभी इसे पूरी तरह फंडामेंटल्स पर आधारित रैली नहीं कहा जा सकता। फिलहाल लिक्विडिटी ने इस तेजी की शुरुआत की है, लेकिन इसे आगे बनाए रखने के लिए कंपनियों की कमाई का मजबूत रहना जरूरी होगा।”
इस तेजी के लंबे समय तक टिके रहने के लिए केवल मोमेंटम पर्याप्त नहीं है, बल्कि कंपनियों की कमाई में ठोस सुधार और बाजार में व्यापक भागीदारी भी जरूरी है। निगम का कहना हैं, “फिलहाल इस तेजी को उतार-चढ़ाव भरे कंसोलिडेशन के बीच एक टैक्टिकल उछाल के तौर पर ही देखना चाहिए। वास्तविक और टिकाऊ रैली के लिए आवश्यक है कि स्मॉल-कैप कंपनियों की अर्निंग्स लगातार 2–3 तिमाहियों तक सालाना आधार पर 18–20% से अधिक की दर से बढ़ें।”
निगम की इस राय से सहमति जताते हुए गोस्वामी कहते हैं कि जब तक लोकप्रिय कैपेक्स शेयरों से आगे बढ़कर पूरे स्मॉल-कैप सेगमेंट में कम से कम दो तिमाहियों तक मजबूत अर्निंग्स अपग्रेड नहीं दिखते, तब तक इसे ट्रेंड में बदलाव नहीं, बल्कि एक टैक्टिकल मूव ही माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक, असली भरोसा एक महीने के प्राइस चार्ट से नहीं, बल्कि मजबूत बैलेंस शीट और मुनाफे में निरंतर वृद्धि से बनता है।
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फिलहाल निफ्टी स्मॉलकैप 250 लगभग 24x के 1-वर्ष फॉरवर्ड P/E पर हैं, जबकि इसका 10 साल का औसत करीब 20x है। यानी अब यह सेगमेंट “सस्ता” नहीं रह गया है। निगम कहते हैं, “हालिया 10% की तेजी के बाद इसमें सेफ्टी का मार्जिन भी कम हो गया है। स्मॉल-कैप में निवेश तभी आकर्षक माना जा सकता है जब आपका नजरिया 5 साल या उससे ज्यादा का हो और आप क्वालिटी स्टॉक्स चुनें– जिनकी बैलेंस शीट मजबूत हो, कैश फ्लो अच्छा हो और कर्ज कम हो।”
इंडेक्स के स्तर पर देखने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती, क्योंकि इसमें बड़ा अंतर छिपा हुआ है। करीब 30% स्टॉक्स अभी भी अक्टूबर 2021 के स्तर से नीचे ट्रेड कर रहे हैं, जबकि कुछ मोमेंटम वाले स्टॉक्स 50-100x P/E जैसे हाई वैल्यूएशन पर हैं। ऐसे में अब इंडेक्स से ज्यादा स्टॉक चुनने की समझ (स्टॉक सेलेक्शन) अहम हो गई है।
गोस्वामी कहते है, “हम अब ‘स्पष्ट रूप से सस्ता’ स्तर से निकलकर ‘लगभग उचित वैल्यूएशन’ के दायरे में आ चुके हैं, और आगे निवेश की रणनीति तय करने में यह बदलाव बेहद अहम है। करीब 22–24x फॉरवर्ड अर्निंग्स पर इंडेक्स ऐतिहासिक नजरिए से ठीक-ठाक लगता है, लेकिन असली चिंता इसकी सतह के नीचे चल रही हलचल को लेकर है।”
वह बताते हैं कि स्मॉल-कैप सेगमेंट का वह हिस्सा जहां कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत है, रिटर्न ऑन इक्विटी अच्छा है और कमाई की स्पष्ट ग्रोथ दिखती है– वह अब भी आकर्षक नजर आता है और वहां वैल्यूएशन ठीक हो सकते हैं। दूसरी ओर, ज्यादा कर्ज वाली और कमजोर क्वालिटी की कंपनियां, जो सिर्फ मोमेंटम के दम पर बढ़ीं, उनमें जोखिम बना हुआ है।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि भले ही पूरे इंडेक्स का वैल्यूएशन संतुलित दिखे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर स्टॉक अपने मौजूदा दाम को सही ठहराता है। निवेश से पहले अच्छी तरह रिसर्च करना बेहद जरूरी है।
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जब भी बाजार में तेज उछाल आता है, यह सवाल बार-बार उठता है। क्या तेजी पर सवार होकर आगे निवेश करना चाहिए या इंतजार करना ज्यादा बेहतर विकल्प है? एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आप एक महीने में 10% की तेजी के बाद निवेश करने की सोच रहे हैं, तो असल में आप सही सवाल नहीं पूछ रहे। सही सवाल यह है कि क्या आप भारत की स्मॉल-कैप ग्रोथ कहानी में 3 से 5 साल का नजरिया रखते हैं?
गोस्वामी कहते हैं, “अगर आपका नजरिया लंबी अवधि का है, तो फिर बाजार के शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में सबसे बेहतर तरीका है कि आप सिस्टमैटिक तरीके से निवेश करें। SIP इसी वजह से प्रभावी होती है, क्योंकि यह सही समय पकड़ने के दबाव को कम कर देती है।”
उन्होंने आगे कहा कि जहां तक एकमुश्त निवेश की बात है, खासकर मौजूदा समय में हाई-मोमेंटम शेयरों में, इससे बचना ही समझदारी है। यह निवेश से ज्यादा उम्मीदों पर आधारित सट्टेबाजी हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि आप अनुशासन बनाए रखें, धीरे-धीरे निवेश करें और फंड्स व स्टॉक्स की क्वालिटी पर पूरा ध्यान दें।
रिटेल निवेशकों के लिए निगम की सलाह है कि हालिया 10% की तेजी के बाद जल्दबाजी में एकमुश्त (लंपसम) निवेश से बचें। बेहतर होगा कि वे अपनी SIP जारी रखें या 6-9 महीनों के दौरान धीरे-धीरे निवेश करने के लिए STP का सहारा लें। स्मॉल-कैप सेगमेंट में 15-20% तक की गिरावट कभी भी तेजी से आ सकती है। ऐसे में भले ही लंबे समय तक बाजार में बने रहना फायदेमंद हो, लेकिन इस कैटेगरी में सही समय और अनुशासित तरीके से निवेश करना कहीं ज्यादा अहम हो जाता है।
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निवेशकों को सेक्टर थीम्स के पीछे भागने के बजाय कमाई की स्थिरता पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, कुछ सेक्टर ऐसे हैं जो वाकई आकर्षक लगते हैं।
दोनों एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये सिर्फ मोमेंटम पर चलने वाले ट्रेड नहीं हैं, बल्कि ऐसे मजबूत बिजनेस हैं जिनकी ऑर्डर बुक मजबूत है और मुनाफे में लगातार सुधार दिख रहा है। इसलिए उनका फोकस इन्हीं सेक्टर्स पर रहेगा। दूसरी ओर, ज्यादा कर्ज वाली स्मॉल-कैप कंपनियों, कमजोर प्राइसिंग पावर वाली कमोडिटी कंपनियों और उन शेयरों से दूरी बनाना बेहतर है, जो अपने असली बिजनेस प्रदर्शन से कहीं आगे निकल चुके हैं।