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रॉयल्टी दर में बदलाव से ONGC और Oil India पर दबाव, कमाई के अनुमान घटे

तेल कंपनियां कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस निकालने पर सरकार को रॉयल्टी देती हैं

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देवांशु दत्ता   
Last Updated- June 14, 2026 | 10:15 PM IST

तेल एवं गैस रॉयल्टी घटाने के बाद उसकी दर दोबारा बढ़ाए जाने से ऑयल इंडिया (ओआईएल) और तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के एबिटा और ईपीएस (प्रति शेयर कमाई) पर असर पड़ सकता है। तेल कंपनियां कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस निकालने पर सरकार को रॉयल्टी देती हैं।

मई में, रॉयल्टी को तर्कसंगत बनाने के बाद सरकार ने कुछ फायदों को आंशिक रूप से वापस ले लिया था। ऑनशोर नॉमिनेशन ब्लॉक और नई खोज लाइसेंसिंग नीति (एनईएलपी) से पहले के ब्लॉक के लिए रॉयल्टी दरें 16.67 प्रतिशत  एक्स रॉयल्टी से बदलकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई थीं। लेकिन इस महीने की शुरुआत में सरकार ने दरों को फिर से 20 प्रतिशत (रॉयल्टी सहित) या 16.67 प्रतिशत बिना रॉयल्टी कर दिया।

रॉयल्टी की गणना के लिए तदर्थ कटौती कम करने का एक नतीजा राज्य सरकारों को होने वाला राजस्व नुकसान होता। इस कारण भी इस फैसले को वापस लिया हो सकता है ताकि लॉबीइंग न हो। अपस्ट्रीम कंपनियों को कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए निर्धारित ब्लॉक पर 20 प्रतिशत और दूसरे ब्लॉक पर 15 प्रतिशत की मानक एड-वैलोरम कटौती का फायदा मिलता रहेगा।

ऑयल इंडिया पर ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि इसका उत्पादन जमीन पर (ऑनशोर) होता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में कच्चे तेल की बिक्री पर प्रभावी रॉयल्टी रेट 10 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 13 डॉलर प्रति बैरल हो जाएगी, जिससे ऑयल इंडिया का एबिटा का 4-5 प्रतिशत और ईपीएस 5-6 प्रतिशत घट जाएगा।

इस बीच, हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति (एचईएलपी) के तहत बनाई गई नई कैटेगरी के फील्ड अभी भी हैं। इनके लिए 2019 के बाद बोली लगाई गई और उन्हें आवंटित किया गया था। जिन फील्ड से पांच साल के अंदर उत्पादन शुरू हो सकता है, उन्हें पहले सात साल तक कोई रॉयल्टी नहीं देनी। इसके बाद, आठवें साल से गहरे पानी और बेहद गहरे पानी वाले फील्ड के लिए (बेसिन की कैटेगरी के आधार पर) क्रमशः 3.5-4.5 प्रतिशत या 1-2 प्रतिशत रॉयल्टी देनी होती है। इससे तेजी से अन्वेषण और निवेश को बढ़ावा मिलता है।

इस फैसले को वापस लेने का ओएनजीसी पर कम असर पड़ेगा, क्योंकि उसके कच्चे तेल का 30 प्रतिशत उत्पादन जमीन पर (ऑनशोर) होता है और वह नए कुओं से मिलने वाली गैस (एनडब्ल्यूजी) के ज्यादा इस्तेमाल पर ध्यान दे रही है। ओएनजीसी के लिए कच्चे तेल की बिक्री पर लगने वाली प्रभावी रॉयल्टी 7.7 डॉलर बैरल से बढ़कर 8.6 डॉलर बैरल हो जाएगी। इससे ओएनजीसी के स्टैंडअलोन एबिटा पर 1 फीसदी और ईपीएस पर 1.4 फीसदी का असर पड़ेगा।

सरकार ने रिफाइनिंग पर विंडफॉल टैक्स भी लगाया है। लेकिन इसका असर अपस्ट्रीम पर नहीं पड़ता है। ज्यादातर विश्लेषकों को नहीं लगता कि क्रूड पर दोबारा विंडफॉल टैक्स लगाया जाएगा। मौजूदा मूल्यांकन पर ऑयल इंडिया भी आकर्षक नहीं लग रही है, क्योंकि यह चौथी तिमाही के अनुमान पूरे नहीं कर पाई।

भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच विश्लेषकों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक तरफ, भारत के अपस्ट्रीम ऊर्जा क्षेत्र को सालाना 10 अरब डॉलर का निवेश मिल रहा है, साथ ही प्राकृतिक गैस की नई खोजें हो रही हैं और रॉयल्टी में कमी आई है। विंडफॉल टैक्स न होना एक सकारात्मक बात है और इससे मूल्यांकन बढ़ना चाहिए।

ऑयल इंडिया के पक्ष में तर्क यह है कि जल्द ही इसके उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद है, लेकिन ओएनजीसी का रिजर्व रिप्लेसमेंट रेश्यो बेहतर है, उसे प्राकृतिक गैस की बिक्री से ज्यादा कीमत मिलती है और वह अपने रिजर्व की तेजी से बिक्री करती है।

First Published : June 14, 2026 | 10:15 PM IST