खास तौर से रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे वैश्विक अवरोध को प्रतिबिंबित करते हुए संवत 2078 के आखिर में रुपया 21 अक्टूबर, 2022 को 9.95 फीसदी की गिरावट के साथ रिकॉर्ड 82.69 पर बंद हुआ। अक्टूबर 2021 से मार्च 2022 के बीच रुपये की चाल दोतरफा रही, लेकिन औसत रूप से इसमें गिरावट ही देखने को मिली।
पिछले साल अक्टूबर के मध्य से लेकर नवंबर के मध्य तक रुपये की ट्रेडिंग हल्की-फुल्की बढ़त के साथ हुई। इसके बाद वाले महीनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली, डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और भूराजनीतिक तनाव में हो रही बढ़ोतरी के बीच रुपया फिसला और 7 मार्च 2022 को 76.924 के निचले स्तर को छू लिया।
आगामी अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के साथ रुपये ने अपने नुकसान की थोड़ी भरपाई कर ली और 31 मार्च, 2022 को 75.81 रुपये पर था। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी की दूसरी लहर में काफी उतारचढ़ाव देखा गया। हालांकि मार्च 2022 के दूसरे हिस्से में यह थोड़ा नरम हुआ।
वित्त वर्ष 23 में अप्रैल-सितंबर के बीच डॉलर के मुकाबले इसकी ट्रेडिंग गिरावट के साथ हुई। आरबीआई के दखल से उतारचढ़ाव पर लगाम लगी और रुपये की सही चाल सुनिश्चित हुई। विदेशी विनिमय बाजार (हाजिर व फॉरवर्ड) में सक्रिय रहने वाले आरबीआई ने कहा कि विदेशी विनिमय बाजार में अत्यधिक उतारचढ़ाव पर लगाम कसना हमारा मकसद है। वह किसी खास स्तर को लेकर काम नहीं करता।
आरबीआई ने पूंजी प्रवाह में बढ़ोतरी व कुल मिलाकर आर्थिक व वित्तीय स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए 6 जुलाई को कई कदमों का ऐलान किया। वित्त वर्ष 23 में (27 सितंबर तक) डॉलर अहम मुद्राओं के बास्केट के मुकाबले 16.1 फीसदी चढ़ा। हालांकि डॉलर के मुकाबले रुपया 6.8 फीसदी टूटा, जो विकसित व उभरती अर्थव्यवस्थाओं वालों के मुकाबले बेहतरी बताता है।
भारतीय मुद्रा के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन की वजह मजबूत आर्थिक फंडामेंटल आदि थी – भारत में महंगाई अहम ट्रेडिंग पार्टनर के भारांकित औसत के मुकाबले कम है। आरबीआई ने सितंबर 2022 की मौद्रिक नीति रिपोर्ट में ये बातें कही है।निवेश में गिरावट के बावजूद भारत का 528.36 अरब डॉलर (14 अक्टूबर 2022) का विदेशी मुद्रा भंडार काफी मजबूत है, जो बाहरी झटकों से बचाव करता है। अक्टूबर में रुपये में कमजोरी जारी रही और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी से यह 82 के पार निकल गया।
बॉन्ड प्रतिफल में सख्ती
बेंचमार्क बॉन्ड (10 वर्षीय) का प्रतिफल संवत 2078 में 120 आधार अंक चढ़कर 21 अक्टूबर को 7.51 फीसदी पर पहुंच गया, जिसका कारण महंगाई पर लगाम व ब्याज दरों में बढ़ोतरी को लेकर मौद्रिक नीति में बदलाव था। मई 2022 में आरबीआई ने अनायास रीपो दर में 190 आधार अंक का इजाफा कर 5.90 फीसदी पर पहुंचा दिया। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई तय सीमा से ऊपर बनी रही।
वित्त वर्ष 22 की दूसरी छमाही के दौरान 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति का प्रतिफल 63 आधार अंक सख्त हो गया, जो वैश्विक व देसी कारकों को प्रतिबिंबित करता है। वित्त वर्ष 22 की तीसरी तिमाही में यह 24 आधार अंक चढ़ा, जिसकी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें, देसी महंगाई और अमेरिका समेत अहम अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल में बढ़ोतरी रही।
वित्त वर्ष 22 की चौथी तिमाही में बेंचमार्क प्रतिफल 39 आधार अंक और मजबूत हुआ, जिसकी वजह राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों का सांकेतिक उधारी कैलेंडर उम्मीद से ज्यादा रही, साथ ही आम बजट में केंद्र की तरफ से बाजार से ली जाने वाली उधारी से ज्यादा का संकेत रही।
नए वित्त वर्ष में सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल ने पहली छमाही (वित्त वर्ष 23) के दौरान दोतरफा चाल दिखाया। जेनेरिक 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल वित्त वर्ष 23 की पहली छमाही के दौरान 64 आधार अंक चढ़ा।
वित्त वर्ष 23 की दूसरी तिमाही (27 सितंबर तक) में बेंचमार्क प्रतिफल 20 आधार अंक नरम हुआ, जिसकी वजह कच्चे तेल में नरमी, जुलाई में जून के मुकाबले सीपीआई महंगाई कम रहना और अगस्त-सितंबर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का शुद्ध खरीदार बनना रहा। साथ ही वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में भारतीय बॉन्ड के शामिल होने की उम्मीद का भी इसमें योगदान रहा।
अक्टूबर में 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति का प्रतिफल एक बार फिर 7.4 फीसदी से ऊपर निकल गया, जिसकी वजह देसी महंगाई में इजाफा, दरों में बढ़ोतरी और वैश्विक बॉन्ड का प्रतिफल ज्यादा रहना था।