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5 ट्रिलियन डॉलर का सोना: अमीरी का अहसास, लेकिन भारत में क्यों नहीं बढ़ रही असली वेल्थ?

घरेलू संपत्ति में सोने की हिस्सेदारी अब नॉन-प्रॉपर्टी एसेट्स का करीब 65% हो गई है, जो यह संकेत देती है कि निवेश का बड़ा हिस्सा प्रोडक्टिव एसेट्स से हटकर सोने में जा रहा है

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अंशु   
Last Updated- March 23, 2026 | 6:20 PM IST

भारत के घरों में जमा सोने की कीमत अब करीब 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है, जो देश की जीडीपी के लगभग 125% के बराबर है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह तेज बढ़ोतरी मुख्य रूप से सोने की कीमतों में हालिया उछाल की वजह से हुई है, जिसने कागजों पर भारतीय परिवारों की संपत्ति को काफी बढ़ा दिया है। लेकिन हकीकत में यह बढ़ती “दिखने वाली दौलत” आर्थिक मजबूती में तब्दील नहीं हो रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू संपत्ति में सोने की हिस्सेदारी अब नॉन-प्रॉपर्टी एसेट्स का करीब 65% हो गई है, जो यह संकेत देती है कि निवेश का बड़ा हिस्सा प्रोडक्टिव एसेट्स से हटकर सोने में जा रहा है।

अमीरी का अहसास, पर खर्च जस का तस

आमतौर पर, सोने की कीमत बढ़ने पर घरों की कुल संपत्ति बढ़ती है और इससे खपत (consumption) में भी तेजी आनी चाहिए। लेकिन भारत में यह असर साफ तौर पर दिखाई नहीं देता।

इसकी बड़ी वजह यह है कि देश में सोने का बड़ा हिस्सा कम आय वाले परिवारों के पास है। 2021 की कीमतों के अनुसार, जिन परिवारों की आय 5 लाख रुपये से कम थी, उनके पास घरेलू सोने का करीब 70% हिस्सा था। ऐसे परिवार आमतौर पर सोने की कीमत बढ़ने के बावजूद अपने खर्च या बचत के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं करते।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कम आय वाले परिवारों के पास इतनी वित्तीय सुरक्षा नहीं होती कि वे अपनी बचत और खर्च के तरीके में बड़ा बदलाव कर सकें, इसलिए सोने की बढ़ती कीमत का असर उनके रोजमर्रा के खर्च पर सीमित ही रहता है।

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सोना: निवेश नहीं, ‘स्टोर ऑफ वैल्यू’

भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि एक पारंपरिक “स्टोर ऑफ वैल्यू” और आभूषण (jewelry) के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि यह अर्थव्यवस्था में उत्पादक तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाता।

सोने के बदले लोन (गोल्ड लोन) इसका एकमात्र बड़ा उपयोग है, लेकिन यह कुल कर्ज का सिर्फ लगभग 5 फीसदी ही है। यानी इतना बड़ा एसेट होने के बावजूद यह अर्थव्यवस्था को सीमित ही सहारा दे रहा है।

अर्थव्यवस्था के लिए भी खराब

रिपोर्ट एक अहम चेतावनी भी देती है। सोने में बढ़ता निवेश दरअसल यह दिखाता है कि लोग अपनी वित्तीय बचत–जैसे बैंक डिपॉजिट– को निकालकर फिजिकल एसेट में लगा रहे हैं।

इस ट्रेंड का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बैंकिंग सिस्टम में जमा की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, बाजार में लिक्विडिटी कम हो सकती है और यहां तक कि विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव आ सकता है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले 16 वर्षों में सोने और कीमती पत्थरों का आयात विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) से करीब 2.5 गुना ज्यादा रहा है यानी देश में आने वाले निवेश से कहीं ज्यादा पैसा सोने के आयात में जा रहा है।

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क्यों नहीं बढ़ रही असली वेल्थ?

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोने की बढ़ती कीमतें कागजों पर तो दौलत बढ़ाती हैं, लेकिन असली आर्थिक ताकत नहीं बनातीं।

सोना न तो नियमित आय देता है, न ही रोजगार पैदा करता है और न ही उत्पादक निवेश को बढ़ावा देता है। महंगाई और आर्थिक विकास में भी इसका योगदान सीमित ही रहता है। यही वजह है कि भारत के पास सोने के रूप में भारी संपत्ति होने के बावजूद, यह संपत्ति अर्थव्यवस्था को उसी गति से आगे नहीं बढ़ा पा रही।

दरअसल, सोने के प्रति भारत का लगाव उसकी पारंपरिक वित्तीय सोच को दिखाता है। लेकिन 5 ट्रिलियन डॉलर की यह ‘चमक’ तब तक अधूरी रहेगी, जब तक यह पैसा इक्विटी, उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे उत्पादक क्षेत्रों की ओर नहीं मुड़ता।


(डिस्कलेमर: बिजनेस स्टैंडर्ड प्राइवेट लिमिटेड में कोटक समूह के नियंत्रण वाली इकाइयों की बहुलांश हिस्सेदारी है)

First Published : March 23, 2026 | 6:20 PM IST