प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
अब लोन मिलना सिर्फ सैलरी स्लिप या क्रेडिट स्कोर पर निर्भर नहीं रहा। लेंडर्स अब आपकी रोज की छोटी छोटी ‘फाइनेंशियल बिहेवियर’ पर भी नजर रखते हैं, जैसे आप बिल समय पर भरते हैं या नहीं, बैंक अकाउंट कितना एक्टिव रहता है और कौन कौन से सब्सक्रिप्शन चल रहे हैं। ये सारी चीजें रियल टाइम में आपके क्रेडिट का फैसला तय करती हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये बदलाव डेटा इकोनॉमी का हिस्सा है, जिसका मकसद सही लोगों को आसानी से लोन देना है।
पहले लोन देने वाले मुख्य रूप से इनकम प्रूफ, बैंक स्टेटमेंट और क्रेडिट ब्यूरो स्कोर पर भरोसा करते थे। ये चीजें अब भी मायने रखती हैं, लेकिन अकेले काफी नहीं हैं। भारतलोन के बिजनेस हेड शक्ति शेखावत कहते हैं, “ज्यादातर लोग सोचते हैं कि लेंडर्स ‘नो’ कहने का बहाना ढूंढते हैं, लेकिन डेटा इकोनॉमी असल में सही लोगों को ‘यस’ कहने के लिए बनी है।”
अब फोकस सिर्फ इनकम पर नहीं, बल्कि पैसे को मैनेज करने के पूरे पैटर्न पर है, जिसे शेखावत ‘फाइनेंशियल कैरेक्टर’ कहते हैं। इसमें शामिल हैं:
शेखावत के अनुसार, रुका हुआ फाइनेंशियल बिहेवियर वाले लोग कभी-कभी हाई इनकम वाले लेकिन अनियमित पैटर्न वाले लोगों से भी 20 प्रतिशत ज्यादा भरोसेमंद साबित होते हैं।
यानी अच्छी सैलरी होने के बावजूद अगर खर्च या किस्तें भरने में गड़बड़ी हो तो लोन मंजूर नहीं हो सकता। वहीं, कम इनकम वाले लेकिन अनुशासित लोग आसानी से पास हो सकते हैं।
बदलाव सिर्फ डेटा की मात्रा में ही नहीं, बल्कि अब उसके सही और भरोसेमंद होने में भी आया है। Rupee112 के बिजनेस हेड कुलदीप यदुवंशी बताते हैं, “असली बात ये नहीं कि लेंडर्स के पास ज्यादा डेटा है, बल्कि अब वो डेटा वेरिफाइड है।”
बॉरोअर (उधार लेने वाला) की सहमति से भारत का अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क लेंडर्स को सीधे बैंक, GST सिस्टम और दूसरे रेगुलेटेड सोर्स से डेटा लेने की सुविधा देता है। इससे चेक होते हैं:
यदुवंशी कहते हैं कि लाइव GST फाइलिंग या बैंक मेटाडेटा देखने से मानवीय गलती और फ्रॉड का खतरा करीब 40 प्रतिशत तक कम हो जाता है। इससे लोन का फैसला मिनटों में हो जाता है और ज्यादा सटीक भी।
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पहले लोन देने के लिए क्रेडिट रिपोर्ट या पुराने बैंक स्टेटमेंट जैसे पुराने डेटा पर भरोसा किया जाता था। अब सिस्टम ज्यादा डायनामिक और लाइव हो गया है। यदुवंशी कहते हैं, “पहली बार हम पुराने रिकॉर्ड के बजाय मौजूदा समय की लाइव जानकारी के आधार पर लोन दे रहे हैं।” इससे पैसों से जुड़े बदलावों को तुरंत समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए:
नतीजा ये है कि क्रेडिट सिस्टम ज्यादा रिस्पॉन्सिव हो गया है, लेकिन ये बॉरोअर के बिहेवियर को लगातार मॉनिटर भी करता है।
इस नए डेटा इकोसिस्टम से आम लोगों को फायदा और कुछ चुनौतियां दोनों हैं।
पॉजिटिव पहलू:
लेकिन कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है:
दरअसल यह पूरा डेटा आधारित मॉडल भारतीय फाइनेंस में लंबे समय से चली आ रही भरोसे की समस्या को सुलझाने की कोशिश है। पहले लाखों लोग, खासकर जो नए थे या जिनके पास पक्के डॉक्यूमेंट या क्रेडिट हिस्ट्री नहीं थी, सिस्टम से बाहर रह जाते थे। अब लेंडर्स लोगों की फाइनेंशियल बिहेवियर के आधार पर इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
शेखावत के मुताबिक, इसका मकसद उन करोड़ों भारतीयों तक पहुंचना है जो ईमानदार और अनुशासित हैं, लेकिन अभी उनकी पारंपरिक क्रेडिट हिस्ट्री नहीं बनी है। हालांकि यह अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बस अब इसका तरीका बदल गया है।
लेंडर्स अब लोगों के व्यवहार को ज्यादा गहराई से समझ पा रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि उनके डेटा को किस तरह देखा और समझा जा रहा है। ऐसे में इस एल्गोरिदम आधारित सिस्टम में अपनी फाइनेंशियल बिहेवियर को समझना आगे चलकर अच्छे क्रेडिट स्कोर जितना ही जरूरी हो सकता है।