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सिर्फ क्रेडिट स्कोर ही नहीं, अब आपकी ‘फाइनेंशियल बिहेवियर’ भी दिलाएंगी लोन; समझिए क्या है ‘डेटा इकोनॉमी’

अब लोन के लिए केवल सैलरी और क्रेडिट स्कोर काफी नहीं। लेंडर्स आपकी बिल पेमेंट, सक्रिय बैंकिंग और खर्च करने की आदतों से आपकी साख परख रहे हैं

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अमित कुमार   
Last Updated- April 14, 2026 | 7:10 PM IST

अब लोन मिलना सिर्फ सैलरी स्लिप या क्रेडिट स्कोर पर निर्भर नहीं रहा। लेंडर्स अब आपकी रोज की छोटी छोटी ‘फाइनेंशियल बिहेवियर’ पर भी नजर रखते हैं, जैसे आप बिल समय पर भरते हैं या नहीं, बैंक अकाउंट कितना एक्टिव रहता है और कौन कौन से सब्सक्रिप्शन चल रहे हैं। ये सारी चीजें रियल टाइम में आपके क्रेडिट का फैसला तय करती हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ये बदलाव डेटा इकोनॉमी का हिस्सा है, जिसका मकसद सही लोगों को आसानी से लोन देना है।

कागजी कार्रवाई से ‘फाइनेंशियल कैरेक्टर’ तक

पहले लोन देने वाले मुख्य रूप से इनकम प्रूफ, बैंक स्टेटमेंट और क्रेडिट ब्यूरो स्कोर पर भरोसा करते थे। ये चीजें अब भी मायने रखती हैं, लेकिन अकेले काफी नहीं हैं। भारतलोन के बिजनेस हेड शक्ति शेखावत कहते हैं, “ज्यादातर लोग सोचते हैं कि लेंडर्स ‘नो’ कहने का बहाना ढूंढते हैं, लेकिन डेटा इकोनॉमी असल में सही लोगों को ‘यस’ कहने के लिए बनी है।”

अब फोकस सिर्फ इनकम पर नहीं, बल्कि पैसे को मैनेज करने के पूरे पैटर्न पर है, जिसे शेखावत ‘फाइनेंशियल कैरेक्टर’ कहते हैं। इसमें शामिल हैं:

  • यूटिलिटी बिल्स और लोन की समय पर किस्तें भरना
  • बैंक अकाउंट में लगातार एक्टिविटी
  • ऑटो-डेबिट या सब्सक्रिप्शन फेल होने की घटनाएं
  • कॉनटेक्ट डिटेल्स या बैंकिंग बिहेवियर में अचानक बदलाव

शेखावत के अनुसार, रुका हुआ फाइनेंशियल बिहेवियर वाले लोग कभी-कभी हाई इनकम वाले लेकिन अनियमित पैटर्न वाले लोगों से भी 20 प्रतिशत ज्यादा भरोसेमंद साबित होते हैं।

यानी अच्छी सैलरी होने के बावजूद अगर खर्च या किस्तें भरने में गड़बड़ी हो तो लोन मंजूर नहीं हो सकता। वहीं, कम इनकम वाले लेकिन अनुशासित लोग आसानी से पास हो सकते हैं।

वेरिफाइड रीयल-टाइम डेटा का दौर

बदलाव सिर्फ डेटा की मात्रा में ही नहीं, बल्कि अब उसके सही और भरोसेमंद होने में भी आया है। Rupee112 के बिजनेस हेड कुलदीप यदुवंशी बताते हैं, “असली बात ये नहीं कि लेंडर्स के पास ज्यादा डेटा है, बल्कि अब वो डेटा वेरिफाइड है।”

बॉरोअर (उधार लेने वाला) की सहमति से भारत का अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क लेंडर्स को सीधे बैंक, GST सिस्टम और दूसरे रेगुलेटेड सोर्स से डेटा लेने की सुविधा देता है। इससे चेक होते हैं:

  • बैंक ट्रांजेक्शन के लाइव पैटर्न
  • कैश फ्लो
  • बिजनेस ओनर्स के GST फाइलिंग
  • असल कर्ज और इनकम की डिटेल्स

यदुवंशी कहते हैं कि लाइव GST फाइलिंग या बैंक मेटाडेटा देखने से मानवीय गलती और फ्रॉड का खतरा करीब 40 प्रतिशत तक कम हो जाता है। इससे लोन का फैसला मिनटों में हो जाता है और ज्यादा सटीक भी।

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लाइव फाइनेंशियल सिग्नल्स पर फैसला

पहले लोन देने के लिए क्रेडिट रिपोर्ट या पुराने बैंक स्टेटमेंट जैसे पुराने डेटा पर भरोसा किया जाता था। अब सिस्टम ज्यादा डायनामिक और लाइव हो गया है। यदुवंशी कहते हैं, “पहली बार हम पुराने रिकॉर्ड के बजाय मौजूदा समय की लाइव जानकारी के आधार पर लोन दे रहे हैं।” इससे पैसों से जुड़े बदलावों को तुरंत समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए:

  • इनकम या बिजनेस टर्नओवर में हालिया बढ़ोतरी को जल्दी पहचाना जा सकता है
  • अनियमित कैश फ्लो या बढ़ते कर्ज के बोझ पर सतर्कता बरती जा सकती है
  • भारत में आम मौसमी इनकम पैटर्न को बेहतर समझा जा सकता है

नतीजा ये है कि क्रेडिट सिस्टम ज्यादा रिस्पॉन्सिव हो गया है, लेकिन ये बॉरोअर के बिहेवियर को लगातार मॉनिटर भी करता है।

बॉरोअर्स के लिए इसका मतलब

इस नए डेटा इकोसिस्टम से आम लोगों को फायदा और कुछ चुनौतियां दोनों हैं।

पॉजिटिव पहलू:

  • क्रेडिट तक ज्यादा पहुंच: जिनके पास औपचारिक क्रेडिट हिस्ट्री नहीं है, वे भी बिहेवियरल डेटा के आधार पर योग्य हो सकते हैं
  • तेज अप्रूवल: रीयल-टाइम वेरिफिकेशन से प्रोसेसिंग टाइम बहुत कम हो गया है
  • निष्पक्ष मूल्यांकन: फैसले अब सब्जेक्टिव जजमेंट या अधूरे दस्तावेजों पर कम निर्भर करते हैं

लेकिन कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है:

  • कंसिस्टेंसी अब और ज्यादा मायने रखती है: अनियमित फाइनेंशियल बिहेवियर सीधे लोन एलिजिबिलिटी पर असर डाल सकता है
  • डिजिटल फुटप्रिंट जरूरी: रोज की छोटी फाइनेंशियल एक्टिविटी लेंडर्स के लिए सिग्नल बन जाती है
  • पारदर्शिता अभी सीमित: बॉरोअर्स को अक्सर पता नहीं होता कि कौन-सी आदतें उनके डिसीजन को प्रभावित कर रही हैं

ट्रस्ट की खाई को पाटना

दरअसल यह पूरा डेटा आधारित मॉडल भारतीय फाइनेंस में लंबे समय से चली आ रही भरोसे की समस्या को सुलझाने की कोशिश है। पहले लाखों लोग, खासकर जो नए थे या जिनके पास पक्के डॉक्यूमेंट या क्रेडिट हिस्ट्री नहीं थी, सिस्टम से बाहर रह जाते थे। अब लेंडर्स लोगों की फाइनेंशियल बिहेवियर के आधार पर इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

शेखावत के मुताबिक, इसका मकसद उन करोड़ों भारतीयों तक पहुंचना है जो ईमानदार और अनुशासित हैं, लेकिन अभी उनकी पारंपरिक क्रेडिट हिस्ट्री नहीं बनी है। हालांकि यह अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बस अब इसका तरीका बदल गया है।

लेंडर्स अब लोगों के व्यवहार को ज्यादा गहराई से समझ पा रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि उनके डेटा को किस तरह देखा और समझा जा रहा है। ऐसे में इस एल्गोरिदम आधारित सिस्टम में अपनी फाइनेंशियल बिहेवियर को समझना आगे चलकर अच्छे क्रेडिट स्कोर जितना ही जरूरी हो सकता है।

First Published : April 14, 2026 | 7:10 PM IST