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Gold ETF में बड़ा बदलाव! अब असली सोने की जगह ‘पेपर गोल्ड’ का खेल, निवेशकों के लिए चेतावनी?

Gold ETF में बदलाव से अब निवेश पूरी तरह फिजिकल गोल्ड पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि इसमें फ्यूचर्स का भी मिश्रण होगा।

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सुनयना चड्ढा   
Last Updated- April 06, 2026 | 12:23 PM IST

Gold ETF: भारत में सोने में निवेश करने का एक आसान तरीका माने जाने वाले गोल्ड ETF अब बदलने जा रहे हैं। अब तक ये फंड निवेशकों का पैसा सीधे फिजिकल सोने (बुलियन) में लगाते थे, लेकिन अब नियमों में बदलाव के बाद इनका ढांचा थोड़ा अलग हो सकता है।

दरअसल, मार्केट रेगुलेटर भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने जून 2024 के मास्टर सर्कुलर में गोल्ड ETF को एक नई सुविधा दी है। इसके तहत फंड हाउस अब अपने पोर्टफोलियो का एक हिस्सा गोल्ड डेरिवेटिव्स यानी गोल्ड फ्यूचर्स जैसे वित्तीय कॉन्ट्रैक्ट्स में भी निवेश कर सकते हैं।

क्या बदल रहा है?

पहले गोल्ड ETF का लगभग पूरा पैसा फिजिकल सोने में लगाया जाता था, जिससे निवेशकों को भरोसा रहता था कि उनका निवेश सीधे सोने की कीमत से जुड़ा है।

अब नए नियमों के बाद ये फंड फिजिकल गोल्ड के साथ-साथ डेरिवेटिव्स का भी इस्तेमाल कर सकेंगे। यानी गोल्ड ETF पूरी तरह “सोने से बैक्ड” नहीं रह जाएगा, बल्कि इसमें फिजिकल गोल्ड और पेपर गोल्ड का मिश्रण होगा।

95% नियम वही रहेगा

हालांकि, एक जरूरी बात यह है कि गोल्ड ETF को अब भी अपने कुल निवेश का कम से कम 95% हिस्सा गोल्ड या गोल्ड से जुड़े इंस्ट्रूमेंट्स में ही रखना होगा। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसमें फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स को भी शामिल किया जा सकेगा।

पहला कदम किसने उठाया?

इस बदलाव को लागू करने में सबसे आगे HDFC Mutual Fund रहा है। कंपनी 22 अप्रैल 2026 से अपने गोल्ड ETF में यह नया स्ट्रक्चर लागू करने जा रही है।

निवेशकों के लिए क्या मतलब है?

  • ETF की कीमत अब भी सोने के दाम से जुड़ी रहेगी, लेकिन ट्रैकिंग का तरीका बदल सकता है
  • डेरिवेटिव्स के इस्तेमाल से फंड मैनेजर को ज्यादा लचीलापन मिलेगा
  • हालांकि, इसमें थोड़ा बहुत अतिरिक्त जोखिम और जटिलता भी जुड़ सकती है

गोल्ड फ्यूचर्स क्या हैं और क्यों अहम हैं?

सोने में निवेश करने वालों के लिए एक बड़ा बदलाव धीरे-धीरे सामने आ रहा है। अब तक ज्यादातर लोग मानते थे कि गोल्ड ETF यानी फंड सीधे असली सोना खरीदकर रखते हैं। लेकिन अब तस्वीर थोड़ी बदल रही है।

Value Research के मुताबिक, फिजिकल गोल्ड का मतलब है कि फंड सच में सोने की ईंटें (बार) खरीदता है और उसी के आधार पर आपका निवेश बढ़ता या घटता है। यानी आपका पैसा सीधे सोने की कीमत से जुड़ा होता है।

वहीं, गोल्ड फ्यूचर्स एक अलग तरीका है। इसमें फंड असली सोना नहीं खरीदता, बल्कि एक कॉन्ट्रैक्ट लेता है। यह कॉन्ट्रैक्ट तय करता है कि भविष्य में किसी खास तारीख पर एक निश्चित कीमत पर सोना खरीदा या बेचा जाएगा। आसान शब्दों में कहें तो यह सोने की कीमत पर दांव लगाने जैसा है, बिना सोना हाथ में लिए।

हालांकि रिटर्न के चार्ट में दोनों (फिजिकल गोल्ड और फ्यूचर्स) कई बार एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन इनके काम करने का तरीका बिल्कुल अलग है – और यही फर्क अहम बन जाता है।

रेगुलेटर क्यों दे रहे हैं इजाजत?

इस बदलाव के पीछे मकसद है गोल्ड ETF को और ज्यादा लचीला और तेज बनाना।

फ्यूचर्स का इस्तेमाल करने से फंड मैनेजर को कई फायदे मिलते हैं:

  • अचानक ज्यादा निवेश आने या निकलने पर फंड को संभालना आसान हो जाता है
  • सोना खरीदने, रखने और सुरक्षित रखने की लागत कम हो जाती है
  • बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान कीमत को ट्रैक करना ज्यादा सटीक और तेज हो जाता है

तेजी से बदलते बाजार में एक साथ बड़ी मात्रा में असली सोना खरीदना या बेचना आसान नहीं होता। ऐसे में फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट एक स्मार्ट और फुर्तीला विकल्प बनकर सामने आते हैं।

निवेशकों के लिए क्या मायने?

इस बदलाव का मतलब यह नहीं है कि आपका रिटर्न तुरंत बदल जाएगा, लेकिन यह जरूर समझना जरूरी है कि अब कुछ गोल्ड ETF सीधे सोना रखने के बजाय “पेपर गोल्ड” यानी फ्यूचर्स के जरिए भी काम कर सकते हैं।

इसलिए आगे निवेश करते समय सिर्फ रिटर्न नहीं, बल्कि यह भी देखना जरूरी होगा कि फंड असली सोने में निवेश कर रहा है या फ्यूचर्स के जरिए

निवेशकों के लिए क्या बदल रहा है?

सोने में निवेश करने वालों के लिए गोल्ड ETF अब भी एक आसान और भरोसेमंद विकल्प बने रहेंगे, लेकिन इसके ढांचे में हल्का बदलाव आ रहा है जिसे समझना जरूरी है।

पहला बदलाव यह है कि अब आपका पूरा पैसा सिर्फ फिजिकल गोल्ड में ही नहीं लगा होगा। फंड का एक छोटा हिस्सा फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स जैसे वित्तीय साधनों में भी निवेश किया जा सकता है, जो असली सोने की जगह कागजी सौदे होते हैं।

दूसरी बात, इससे रिटर्न में थोड़ा फर्क आ सकता है। आम तौर पर ETF सोने की कीमत के साथ चलते हैं, लेकिन अब इनमें डेरिवेटिव्स शामिल होने से बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव के समय इनका प्रदर्शन स्पॉट गोल्ड से थोड़ा अलग हो सकता है।

तीसरी और अहम बात, इसमें कुछ नए तरह के जोखिम भी जुड़ते हैं। जैसे काउंटरपार्टी रिस्क, कॉन्ट्रैक्ट रोलओवर की लागत और कीमत में असमानता। हालांकि फंड मैनेजर इन जोखिमों को संभालने की कोशिश करते हैं, फिर भी ये सीधे सोना खरीदने से अलग तरह की स्थिति बनाते हैं।

गोल्ड ETF में बदलाव: अब फिजिकल गोल्ड के साथ फ्यूचर्स का भी इस्तेमाल

गोल्ड ETF में निवेश करने वालों के लिए एक अहम बदलाव सामने आ रहा है। अब ये फंड सिर्फ फिजिकल गोल्ड तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि कुछ हिस्सा गोल्ड फ्यूचर्स जैसे डेरिवेटिव्स में भी निवेश किया जा सकेगा।

उदाहरण के तौर पर, अगर कोई निवेशक ₹1 लाख गोल्ड ETF में लगाता है, तो पहले इसमें से ₹95,000 तक रकम सीधे सोने में जाती थी। लेकिन अब ₹10,000-₹20,000 तक हिस्सा फ्यूचर्स में लगाया जा सकता है। यानी निवेश का आधार भले ही सोना ही रहे, लेकिन इसकी संरचना पहले से ज्यादा वित्तीय (हाइब्रिड) हो जाएगी।

वोलाटिलिटी में दिख सकता है फर्क

शांत बाजार में इसका असर ज्यादा नजर नहीं आता, लेकिन जब कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव होता है, तब फ्यूचर्स और फिजिकल गोल्ड के रिटर्न में हल्का अंतर दिख सकता है। इसका मतलब है कि ETF का रिटर्न असली सोने से थोड़ा अलग हो सकता है।

क्यों आता है यह गैप?

Value Research के मुताबिक, फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट की एक तय अवधि होती है और उन्हें समय-समय पर रोलओवर करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में लागत आती है, जो धीरे-धीरे ETF और सोने के रिटर्न के बीच अंतर पैदा कर सकती है।

साथ ही, एक्सपायरी पर फ्यूचर्स का सेटलमेंट कैश या फिजिकल डिलीवरी के जरिए होता है, जिसे मैनेज करना थोड़ा जटिल होता है। जबकि सिर्फ सोने में निवेश करने वाले फंड्स में यह झंझट नहीं होता।

Gold ETF में बदलाव: क्या निवेशकों को चिंता करनी चाहिए? जानिए आसान भाषा में पूरी बात

गोल्ड ETF को लेकर हाल ही में हुए नियमों में बदलाव ने निवेशकों के बीच हलचल जरूर पैदा की है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि फिलहाल चिंता की कोई बड़ी वजह नहीं है।

दरअसल, नियमों में बदलाव के बावजूद गोल्ड ETF का मूल ढांचा जस का तस बना हुआ है। अब भी यह जरूरी है कि फंड अपनी कम से कम 95% रकम सोने से जुड़े एसेट्स में ही निवेश करें। यानी ETF पूरी तरह से डेरिवेटिव्स पर आधारित नहीं हो सकते।

फंड हाउसेज का भी कहना है कि फ्यूचर्स जैसे इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल सिर्फ खास हालात में किया जाएगा- जैसे जब अचानक ज्यादा निवेश आ जाए या तुरंत फिजिकल गोल्ड खरीदना मुश्किल हो। हालात सामान्य होते ही निवेश वापस फिजिकल गोल्ड में कर दिया जाएगा।

वहीं, 50% की लिमिट को लेकर भी काफी भ्रम बना हुआ है। Value Research के मुताबिक, यह सीमा पूरे फंड पर नहीं बल्कि 95% गोल्ड एक्सपोजर के भीतर लागू होती है। यानी ऐसा नहीं है कि फंड अपने आधे पैसे को फिजिकल गोल्ड से हटाकर कहीं और लगा सकते हैं। फिजिकल गोल्ड अब भी प्राथमिकता में रहेगा।

सीधे शब्दों में कहें तो SEBI का यह बदलाव गोल्ड ETF की बुनियादी मजबूती को नहीं बदलता, बल्कि फंड मैनेजर्स को थोड़ी लचीलापन जरूर देता है ताकि वे अस्थायी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभाल सकें।

Gold ETF में निवेशकों के लिए क्या है सही रणनीति?

सोने में निवेश करने वालों के लिए अभी घबराने की जरूरत नहीं है। अगर आपने Gold ETF में पैसा लगाया हुआ है, तो फिलहाल बाहर निकलने का कोई बड़ा कारण नहीं दिखता। लेकिन निवेश को लेकर अपनी उम्मीदों में थोड़ा बदलाव जरूर करना होगा।

अब तक Gold ETF को पूरी तरह फिजिकल गोल्ड से जुड़ा माना जाता था, लेकिन नए नियमों के बाद इसमें कुछ बदलाव आ सकते हैं। इसका मतलब यह है कि ये फंड सोने की कीमत के साथ तो चलते रहेंगे, लेकिन हर हाल में 100 फीसदी फिजिकल गोल्ड का सपोर्ट हो, यह जरूरी नहीं रहेगा।

ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी हो गया है कि वे अपने फंड से जुड़े दस्तावेज और पोर्टफोलियो की जानकारी को ध्यान से पढ़ें। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिलेगी कि उनका पैसा आखिर किस तरह के एसेट्स में लगाया जा रहा है।

अगर कोई निवेशक पूरी तरह फिजिकल गोल्ड में ही निवेश चाहता है, तो वह विकल्प के तौर पर सीधे सोना खरीद सकता है या फिर सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर भी विचार कर सकता है। हालांकि, इन विकल्पों का चुनाव निवेश के लक्ष्य और जरूरत के हिसाब से ही करना चाहिए।

First Published : April 6, 2026 | 12:23 PM IST