कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) द्वारा 2.5 करोड़ रुपये की वसूली नोटिस के खिलाफ एक रिटायर्ड कर्मचारी की कानूनी लड़ाई ने एम्प्लॉयर द्वारा मैनेज किए जाने वाले प्रोविडेंट फंड (PF) ट्रस्ट और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े जोखिमों की ओर फिर से ध्यान खींचा है।
हाल ही में तेलंगाना हाई कोर्ट ने ईपीएफओ के उस नोटिस को खारिज कर दिया, जिसमें एक रिटायर्ड कर्मचारी से पहले ही भुगतान की जा चुकी पीएफ राशि वापस वसूलने को कहा गया था। यह मामला उस समय सामने आया जब एम्प्लॉयर के छूट प्राप्त (एक्जेम्प्टेड) पीएफ ट्रस्ट ने अपनी छूट की स्थिति वापस कर दी थी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि एम्प्लॉयर या पीएफ ट्रस्ट द्वारा अनुपालन (कंप्लायंस) में की गई चूक का दायित्व स्वतः उस कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता, जिसने यह राशि सद्भावना (गुड फेथ) में प्राप्त की हो।
यह मामला वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए एक अहम सवाल भी खड़ा करता है। यदि किसी कंपनी का पीएफ ट्रस्ट अनुपालन संबंधी समस्याओं में फंस जाता है, तो क्या ईपीएफओ कर्मचारियों से उनकी रिटायरमेंट सेविंग वापस करने की मांग कर सकता है?
यह विवाद एक रिटायर्ड कर्मचारी से जुड़ा था, जिसे उसके एम्प्लॉयर द्वारा चलाए जा रहे एक्जेम्प्टेड (छूट प्राप्त) पीएफ ट्रस्ट से पीएफ सेटलमेंट के तहत 2.5 करोड़ रुपये मिले थे। ‘एग्जेम्प्ट PF ट्रस्ट’ एक ऐसा फंड होता है जिसे ईपीएफओ के पास सीधे योगदान (कंट्रीब्यूशन) जमा करने के बजाय एम्प्लॉयर खुद मैनेज करता है। ऐसे ट्रस्ट को तभी मंजूरी मिलती है जब वे कम से कम EPF स्कीम के बराबर फायदे देते हों।
इस मामले में, कर्मचारी को भुगतान किए जाने से पहले एम्प्लॉयर ने अपने एक्जेम्प्टेड ट्रस्ट का दर्जा छोड़ दिया था। ईपीएफओ का तर्क था कि छूट समाप्त होने के बाद कंपनी को पीएफ फंड (कॉर्पस) ईपीएफओ को हस्तांतरित करना चाहिए था, न कि सीधे कर्मचारी के दावे का निपटान करना चाहिए था।
बाद में ईपीएफओ ने रिटायर्ड कर्मचारी को नोटिस जारी कर 2.5 करोड़ रुपये ब्याज सहित वापस जमा करने को कहा। हालांकि, हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि एम्प्लॉयर की अनुपालन (कंप्लायंस) संबंधी चूक के लिए कर्मचारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कर्मचारी ने यह राशि वैध रूप से और सद्भावना के साथ प्राप्त की थी, इसलिए उससे इसकी वसूली नहीं की जा सकती।
लॉ फर्म सिंगानिया एंड कंपनी के साझेदार दिवियाय चड्ढा के अनुसार, अदालत के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ईपीएफ अधिनियम, 1952 या ईपीएफ योजना, 1952 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो ईपीएफओ को केवल इस आधार पर किसी कर्मचारी से पहले ही निपटाए जा चुके पीएफ बकाये की वसूली करने की अनुमति देता हो कि एम्प्लॉयर या पीएफ ट्रस्ट ने छूट (एक्जेम्प्शन) समाप्त होने के बाद धनराशि हस्तांतरित नहीं की।
चड्ढा ने कहा, “ईपीएफ योजना के तहत दायित्व पूरी तरह एम्प्लॉयर और पीएफ ट्रस्ट का है, न कि कर्मचारी-लाभार्थी का।”
उन्होंने आगे कहा कि जब तक कर्मचारी पर धोखाधड़ी, गलत जानकारी देने, तथ्यों को छिपाने या एम्प्लॉयर/ट्रस्ट के साथ मिलीभगत जैसे आरोप न हों, तब तक ईपीएफओ किसी रिटायर्ड कर्मचारी से पीएफ राशि लौटाने की मांग नहीं कर सकता।
हालांकि, अदालत ने एक सीमित संभावना खुली छोड़ी है। यदि भविष्य में कोई विशेष कानूनी प्रावधान ऐसा दायित्व कर्मचारी पर डालता है, तो ईपीएफओ को नया नोटिस जारी करना होगा। उस नोटिस में कानूनी आधार, मामले के तथ्य और वसूली की गणना का स्पष्ट विवरण देना होगा। साथ ही, कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी देना होगा।
सामान्य कर्मचारियों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इससे यह साफ होता है कि पीएफ ट्रस्टों की आंतरिक अनुपालन (कंप्लायंस) संबंधी विफलताओं के लिए कर्मचारियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के वकील के. साई तेजा ने कहा, “पीएफ में जमा राशि कर्मचारी की सामाजिक सुरक्षा (सोशल सिक्योरिटी) की बचत है। इसे ऐसी रकम नहीं माना जा सकता जिसे एम्प्लॉयर या ईपीएफओ, एम्प्लॉयर या ट्रस्ट की चूक के कारण आसानी से वापस मांग लें।”
उन्होंने कहा कि यदि ईपीएफओ किसी कर्मचारी से व्यक्तिगत रूप से राशि की वसूली करना चाहता है, तो उसे इसके लिए किसी विशिष्ट कानूनी प्रावधान का हवाला देना होगा, विधिवत नोटिस जारी करना होगा, सुनवाई का अवसर देना होगा और वसूली के आधार को स्पष्ट रूप से बताना होगा।
वहीं, एलारा लॉ ऑफिसेज की साझेदार सुप्रिया मजूमदार ने कहा कि यह फैसला इस बात को मजबूत करता है कि पीएफ अनुपालन बनाए रखने, फंड का प्रबंधन करने और छूट (एक्जेम्प्शन) समाप्त होने के बाद संचित राशि को हस्तांतरित करने की जिम्मेदारी एम्प्लॉयर और पीएफ ट्रस्ट की होती है।
मजूमदार ने कहा, “पीएफ को ऐसी राशि नहीं माना जा सकता जिसे ट्रस्ट की अनुपालन विफलताओं के कारण बंधक बनाकर रखा जाए।”
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हालांकि अदालत के इस फैसले से उन कर्मचारियों को सुरक्षा मिली है, जिन्हें उनकी पीएफ राशि पहले ही मिल चुकी है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्टों की निगरानी और जांच-पड़ताल फिर भी जरूरी है।
चड्ढा के अनुसार, एक्जेम्प्टेड ट्रस्टों में बड़ा जोखिम पीएफ राशि के भुगतान से पहले फंड मैनजमेंट से जुड़ा होता है। मौजूदा मामले में कर्मचारी की पीएफ राशि का एक हिस्सा उन निवेशों से जुड़ा था, जो येस बैंक के बॉन्ड इश्यू से प्रभावित हुए थे।
चड्ढा ने कहा, “कर्मचारियों को एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्टों के फंड मैनजमेंट और एम्प्लॉयर के अनुपालन पर ज्यादा सतर्क नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यह सुरक्षा केवल वैध रूप से पीएफ भुगतान हो जाने के बाद लागू होती है। यह जरूरी नहीं कि किसी संकटग्रस्त ट्रस्ट में अभी भी फंसी राशि पर भी समान रूप से लागू हो।”
वहीं, खैतान एंड कंपनी के साझेदार अंशुल प्रकाश ने कहा कि किसी एम्प्लॉयर को मिली एक्जेम्प्शन की स्थिति कर्मचारियों के पीएफ लाभों पर कोई असर नहीं डालती।
प्रकाश ने कहा, “पीएफ में जमा राशि कर्मचारी का वैध और अर्जित अधिकार है। यह राशि या तो एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्ट के माध्यम से या फिर ईपीएफओ के जरिए दी जानी चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका प्रशासन किसके जिम्मे है।”
उन्होंने कहा कि किसी कंपनी द्वारा एक्जेम्प्शन छोड़ देने या आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा न करने की स्थिति में भी कर्मचारियों को उनके पीएफ लाभों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, यदि किसी एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्ट में गड़बड़ी या अनुपालन संबंधी विफलता होती है, तो इसकी जिम्मेदारी आम तौर पर उस ट्रस्ट का चलाने वाले एम्प्लॉयर और ट्रस्टियों की होती है।
लेगम सोलिस के फाउंडर शशांक अग्रवाल ने कहा कि यह फैसला कर्मचारियों को पीएफ लाभ प्राप्त करने वाले पक्ष और फंड को मैनेज करने वाले संस्थानों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करता है।
अग्रवाल ने कहा, “ईपीएफओ के पास एम्प्लॉयर और पीएफ ट्रस्ट के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्ति बनी रहती है, लेकिन जिन कर्मचारियों ने सद्भावना के साथ अपनी रिटायरमेंट संबंधी राशि प्राप्त की है, उन्हें दूसरों द्वारा किए गए नियामकीय उल्लंघनों के लिए वसूली का लक्ष्य नहीं बनाया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रतीक झा ने कहा कि इस फैसले से यह साफ होता है कि EPF एक सोशल सिक्योरिटी सिस्टम है, न कि कोई कमर्शियल व्यवस्था, जिसमें अकाउंटिंग या नियमों के पालन से जुड़े विवादों के कारण रिटायर हो चुके लोगों से पैसे वापस करने के लिए कहा जा सके।
झा ने कहा, “अकाउंट्स का मिलान करने और EPFO को फंड ट्रांसफर करने की जिम्मेदारी एम्प्लॉयर और ट्रस्टीज की होती है। कर्मचारियों का इन प्रक्रियाओं पर कोई कंट्रोल नहीं होता और न ही उन्हें बैकएंड पर नियमों के पालन की जानकारी होती है।”
एक्सपर्ट्स का कहना है कि रिटायरमेंट के करीब पहुंच रहे कर्मचारियों को अपने पीएफ से जुड़े सभी दस्तावेजों का रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखना चाहिए, खासकर तब जब उनका एम्प्लॉयर एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्ट चलाता हो।
प्रकाश ने सलाह दी कि कर्मचारियों को यह जांचते रहना चाहिए कि उनकी कंपनी अभी भी एक्जेम्प्टेड पीएफ ट्रस्ट चला रही है या फिर छूट (एक्जेम्प्शन) समाप्त होने के बाद ईपीएफओ में ट्रांजिशन की प्रक्रिया चल रही है।
साई तेजा ने कर्मचारियों को पीएफ स्टेटमेंट, यूएएन (UAN) डिटेल्स, विथड्रॉल फॉर्म, ट्रांसफर दस्तावेज और पीएफ से संबंधित सभी पत्राचार (कम्युनिकेशन) का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की सलाह दी।तेजा ने कहा, “दस्तावेज और रिकॉर्ड ही कर्मचारियों की सबसे व्यावहारिक सुरक्षा कवच हैं।”
वहीं, झा ने कहा कि कर्मचारियों को अपने रिकॉर्ड जरूर संभालकर रखने चाहिए, लेकिन कानून उनसे यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि वे पीएफ ट्रस्टों के अनुपालन (कंप्लायंस) की ऑडिटिंग करें। झा ने कहा, “जिम्मेदारी उन लोगों की है जिन्हें फंड के मैनेजमेंट की जिम्मेदारी सौंपी गई है, न कि उन कर्मचारियों की जो उस राशि के हकदार हैं।”