केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) समाप्त किए जाने के बाद से पॉलिसीबाजार के पोर्टल पर बेची जाने वाली लगभग 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक की बीमा राशि वाली स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों का हिस्सा 2 फीसदी से बढ़कर लगभग 12 फीसदी हो गया है। यह बदलाव खरीदारों की प्राथमिकताओं में आए बदलाव को दर्शाता है।
परिवार में किसी गंभीर बीमारी का होना अक्सर परिवारों को अपने स्वास्थ्य बीमा कवर पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करता है। कवर्स्योर के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) सौरभ विजयवर्गीय ने कहा, ‘लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को गंभीर बीमारियों से जूझते देखा है और महसूस किया है कि छोटे बीमा कवर पर्याप्त नहीं हैं।’
भारत में स्वास्थ्य सेवा की मुद्रास्फीति लगभग 14 फीसदी सालाना है। इसका मतलब है कि उपचार की लागत हर 5 से 6 साल में दोगुनी हो जाती है।
सिक्योरनाउ के सह-संस्थापक कपिल मेहता ने कहा, ‘खरीदार भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बड़ी बीमा रकम वाली पॉलिसियां खरीद रहे हैं।’
गंभीर बीमारियों का इलाज महंगा हो गया है। मेहता ने कहा, ‘किसी महानगर में कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में आज लगभग 30 लाख से 70 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है।’ जीएसटी हटाने से प्रीमियम अधिक किफायती हो गए हैं। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के प्रमुख (स्वास्थ्य बीमा) सिद्धार्थ सिंघल ने कहा, ‘जो ग्राहक पहले 50 लाख रुपये का बीमा कवर खरीदने में सक्षम थे, वे अब 1 करोड़ रुपये का कवर खरीद सकते हैं।’
पॉलिसियों के भारी प्रीमियम का भुगतान करने पर विचार करने से पहले आपको अपनी जरूरतों का आकलन कर लेना चाहिए। इसके लिए पहला मानदंड आपके परिवार का चिकित्सा इतिहास होना चाहिए। विजयवर्गीय ने कहा, ‘अगर परिवार में कोई गंभीर बीमारी चलती है तो बड़ी बीमा रकम वाली पॉलिसी आवश्यक हो जाती है।’
जिस स्थान पर आपका परिवार इलाज कराएगा वह भी मायने रखता है। महानगरों के निजी अस्पतालों में छोटे शहरों के अस्पतालों के मुकाबले लागत बहुत अधिक होती है।
बीमा कवर तय करने का एक तरीका यह भी है कि क्या आपकी पॉलिसी सबसे खराब चिकित्सा परिस्थिति को कवर कर सकती है। विजयवर्गीय ने कहा, ‘अगर परिवार में सबसे खराब चिकित्सा परिस्थिति को आपके बचत को नष्ट किए बिना या आपको उधार लेने के लिए मजबूर किए बिना कवर नहीं किया जा सकता है तो आप शायद कम बीमाकृत हैं।’
लंबी अवधि में बड़ी बीमा रकम वाली पॉलिसी का प्रीमियम चुकाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इंश्योरेंस समाधान की सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) शिल्पा अरोड़ा ने कहा, ‘अगर आप बुनियादी उत्पाद के रूप में 1 करोड़ रुपये की पॉलिसी खरीदते हैं तो यह बाद में काफी महंगी साबित हो सकती है। विशेष रूप से सेवानिवृत्ति के बाद आय कम होने पर ऐसी पॉलिसी को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।’ बुजुर्ग पॉलिसीधारकों के लिए प्रीमियम वृद्धि अक्सर काफी अधिक होती है। अरोड़ा ने कहा, ’55 या 60 वर्ष की आयु के बाद यह 20 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक हो सकती है।’
पॉलिसी में बताई गई सुविधाओं की भलीभांति जांच कर लें। मेहता ने कहा, ‘सभी चिकित्सा समस्याओं के लिए 1 करोड़ रुपये मूल्य का कवर उपलब्ध होना चाहिए।’ पॉलिसी में रूम रेंट पर सीमा या आधुनिक उपचारों के लिए उप-सीमा नहीं होनी चाहिए। अरोड़ा ने कहा, ‘पॉलिसी के तहत कवर से जिन चीजों को अलग रखा गया है और प्रतीक्षा अवधि की भलीभांति जांच कर लेना चाहिए।’ साथ ही इसके नो-क्लेम बोनस (एनसीबी) मानदंडों की भी जांच करें।
जो खरीदार अधिक बीमा रकम वाली बुनियादी पॉलिसी खरीदने में सक्षम नहीं हैं उन्हें बुनियादी पॉलिसी को सुपर टॉप-अप के साथ जोड़ना चाहिए। वे 20 लाख रुपये की बुनियादी पॉलिसी खरीद सकते हैं और 1 करोड़ रुपये का सुपर टॉप-अप जोड़ सकते हैं। विजयवर्गीय ने कहा, ‘ऐसा करना 15 से 25 फीसदी अधिक सस्ता हो सकता है।’
मगर इसमें कुछ बातों का ध्यान भी रखना होता है। दो पॉलिसियां होने पर दावे अधिक जटिल हो जाते हैं। अरोड़ा ने सुझाव दिया कि सुपर टॉप-अप के तहत कटौती बुनियादी पॉलिसी की बीमा रकम के बराबर होनी चाहिए। बुनियादी पॉलिसी और सुपर टॉप-अप दोनों एक ही बीमाकर्ता से खरीदने से दावे की प्रक्रिया आसान हो सकती है।
जो खरीदार अधिक बीमा रकम वाली पॉलिसी नहीं खरीद सकते उन्हें एक छोटी पॉलिसी से शुरुआत करना चाहिए। बाद में उसे धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। सिंघल ने कहा, ‘इस नजरिये में जोखिम यह है कि अगर किसी व्यक्ति को कोई गंभीर बीमारी हो जाती है तो बुनियादी बीमा रकम को बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।’ ऐसे खरीदारों को सक्रिय तौर पर अपनी पॉलिसी का स्केल-अप करना चाहिए।