Representative image
स्वास्थ्य बीमा दावे से संबंधित शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों में बीमा भरोसा पोर्टल पर दर्ज शिकायतें पूरे वित्त वर्ष 2024-25 की कुल शिकायतों के मुकाबले 14.5 फीसदी अधिक थीं। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 64,365 शिकायतें प्राप्त हुईं जबकि फरवरी 2025-26 तक 73,729 शिकायतें दर्ज की गईं।
दावे का खारिज होना अक्सर पॉलिसी शर्तों की पर्याप्त समझ न होने का नतीजा होता है। स्टेवेल डॉट हेल्थ के सह-संस्थापक अरुण राममूर्ति ने कहा, ‘कई पॉलिसीधारक यह नहीं समझते कि गैर-चिकित्सीय खर्च, कॉस्मेटिक उपचार और कुछ अन्य प्रक्रियाएं स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के दायरे में नहीं आतीं।’
पहले से मौजूद बीमारियों या पिछले उपचारों का खुलासा न करना भी दावे को खारिज किए जाने का कारण बन सकता है। राममूर्ति ने कहा, ‘मधुमेह, उच्च रक्तचाप या थायराइड जैसी बीमारियों पहले से न बताने वाले लोगों को दावे खारिज होने का सामना करना पड़ सकता है।’
प्रतीक्षा अवधि भी एक सामान्य कारण है। अगर लागू प्रतीक्षा अवधि समाप्त नहीं हुई है तो बीमाकर्ता दावे को अस्वीकृत कर सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि उपचार बीमाकर्ता के चिकित्सीय आवश्यकता मानदंड को पूरा न करे तो दावे का भुगतान न किया जाए।
अस्पताल में भर्ती होने के समय पॉलिसी का लैप्स होना भी दावे के खारिज होने का कारण बन सकता है। धोखाधड़ी या दस्तावेजों में विसंगतियों के कारण भी आपके दावे अस्वीकृत किए जा सकते हैं।
आंशिक दावे का निपटान आम तौर पर इसलिए होता है क्योंकि पॉलिसी में कुछ प्रतिबंध होते हैं। रूम रेंट की सीमा का आनुपातिक कटौती प्रभाव पूरे बिल पर दिख सकता है। कवरश्योर के संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी सौरभ विजयवर्गीय ने कहा, ‘यदि पॉलिसीधारक निर्धारित सीमा से ऊपर के कमरे वाली श्रेणी का चयन करता है तो भुगतान 20 से 40 फीसदी तक कम हो सकता है।’ को-पे क्लॉज भी बीमाकर्ता द्वारा भुगतान की जाने वाली राशि को कम कर सकते हैं। विशिष्ट उपचारों पर उप-सीमा भुगतान को और भी कम कर सकते हैं।
पॉलिसी अक्सर उपभोग्य सामग्रियों और गैर-चिकित्सीय खर्चों को बाहर रखती है जो बिल का 10 से 15 फीसदी हो सकते हैं।
बीमाकर्ता उचित और प्रथागत लागत समायोजन का हवाला देकर दावे की रकम में कटौती भी कर सकते हैं। राममूर्ति ने कहा, ‘अस्पतालों के साथ पैकेज दरों में अंतर के कारण अक्सर आंशिक निपटान होता है।’
उपलब्ध सबसे सस्ती पॉलिसी चुनने या केवल बीमित राशि के आधार पर खरीद करने के बजाय खरीदारों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि पॉलिसी क्या कवर करती है, कवरेज में क्या कमियां हैं और ऐसी कौन सी शर्तें हैं जो भुगतान को कम कर सकती हैं। विजयवर्गीय ने कहा, ‘ऐसी पॉलिसी चुनें जो आपकी वास्तविक जरूरतों को पूरा करे।’ उपयुक्त पॉलिसी में कोई रूम रेंट पर कोई सीमा न हो, न्यूनतम या कोई उप-सीमा न हो और को-पे का प्रावधान भी न हो। राममूर्ति ने कहा, ‘खरीदारों को यह भी जांचना चाहिए कि क्या यह नए सिरे से बहाल किए जाने का लाभ प्रदान करती है, पहले से मौजूद बीमारियों के लिए छोटी प्रतीक्षा अवधि है और व्यापक अस्पताल नेटवर्क तक पहुंच प्रदान करती है।’
दावे से संबंधित कई विवाद इसलिए पैदा होते हैं क्योंकि पॉलिसीधारकों ने पॉलिसी खरीदते समय उचित जानकारी नहीं दी जाती है। विजयवर्गीय ने कहा, ‘लोग अक्सर प्रस्ताव फॉर्म में मौजूदा बीमारियों और पिछले उपचारों का उल्लेख करना छोड़ देते हैं।’ कुछ लोग रक्तचाप, मधुमेह या थायराइड जैसी सामान्य स्थितियों का उल्लेख करने में भी भूल कर जाते हैं। धूम्रपान या शराब पीने जैसी जीवनशैली की आदतों के बारे में जानकारी अक्सर छुपाई जाती है। ऐसी चूक दावे के समय समस्याएं पैदा कर सकती हैं। खरीदारों को प्रस्ताव फॉर्म में मौजूदा पॉलिसियों का खुलासा करना चाहिए।
कैशलेस उपचार में पॉलिसीधारकों को बिल में वस्तुओं को किसी प्रकार वर्गीकृत किया गया है उस पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए। सिक्योरनाउ इंश्योरेंस ब्रोकर के सह-संस्थापक कपिल मेहता ने कहा, ‘यदि वस्तुओं को अलग-अलग वर्गीकृत किया जाता है जिससे वे बाहर लगे तो बीमाकर्ता उन्हें अस्वीकृत कर सकता है जब तक कि पॉलिसीधारक समय पर स्पष्टीकरण न मांगे।’
अगर कोई प्रमुख अस्पताल आपके बीमाकर्ता के नेटवर्क में नहीं है तो इसका कारण यह हो सकता है कि बीमाकर्ता को उसके शुल्कों के बारे में चिंता है। पॉलिसीधारकों को यह आकलन कर लेना चाहिए कि क्या उसके शुल्क उचित प्रतीत होते हैं। मेहता ने कहा, ‘इसका एक तरीका यह पूछना हो सकता है कि यदि आप खुद भुगतान कर रहे हैं तो क्या यह रकम उचित लगेगी।’ पॉलिसीधारकों को जहां तक संभव हो नेटवर्क अस्पतालों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बीमा समाधान की सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी शिल्पा अरोड़ा ने कहा, ‘यदि वे गैर-नेटवर्क अस्पताल का विकल्प चुनते हैं तो उन्हें कैशलेस उपचार के बजाय रिएम्बर्समेंट के लिए तैयार रहना चाहिए।’ रिएम्बर्समेंट मामलों में या गैर-नेटवर्क अस्पताल में भर्ती होने पर पॉलिसीधारक को अस्पताल में भर्ती होने की सूचना बीमा कंपनी या तीसरे पक्ष के प्रशासक (टीपीए) को देनी चाहिए। अरोड़ा ने कहा, ‘रिएम्बर्समेंट मामलों में पॉलिसीधारक को डिस्चार्ज के 30 दिनों के भीतर एक उचित क्लेम फाइल जमा करनी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि क्लेम फॉर्म को सटीकता से और बिना किसी त्रुटि या गायब विवरण के मूल दस्तावेजों के साथ भरा जाना चाहिए। तेज प्रॉसेसिंग और निपटान के लिए क्लेम अनुरोध ऑनलाइन भी उठाया जाना चाहिए।
दावे को अस्वीकृत करने या आंशिक निपटान करने के बाद बीमाकर्ता को एक विस्तृत निपटान पत्र जारी करना चाहिए जिसमें बताया गया हो कि क्या भुगतान नहीं किया गया और क्यों। मेहता ने कहा, ‘बीमाकर्ता को यहां तक कि छोटी अस्वीकृत वस्तुओं को भी अलग से सूचीबद्ध करना चाहिए और उन्हें निपटाने के कारणों को बताना चाहिए।’
पूर्ण अस्वीकृति के मामले में उसे अस्वीकृति का कारण बताते हुए एक अस्वीकृति पत्र जारी करना चाहिए। मामले को आगे बढ़ाने से पहले पॉलिसीधारक को स्पष्टीकरण और पुन: विचार के लिए बीमाकर्ता के शिकायत निवारण अधिकारी से संपर्क करना चाहिए। मेहता ने कहा, ‘यदि इससे मामला हल नहीं होता है तो पॉलिसीधारक को बीमा भरोसा पोर्टल के जरिये नियामक तक शिकायत बढ़ानी चाहिए।’ यदि वह भी विफल रहता है तो अगला कदम बीमा लोकपाल है।
न्यायालय और उपभोक्ता अदालतें एक विकल्प बनी हुई हैं लेकिन प्रक्रिया आम तौर पर लंबी होती है। अरोड़ा ने कहा, ‘यदि दावे की रकम 50 लाख रुपये से अधिक है और लोकपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर आती है तो पॉलिसीधारक को उपभोक्ता अदालत में जाना चाहिए।’