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लोन की EMI ने बिगाड़ दिया बजट? एक्सपर्ट ने बताए पैसे बचाने के आसान उपाय

बढ़ती EMI से परेशान उधारकर्ता रीफाइनेंसिंग, बैलेंस ट्रांसफर और समय पर लोन पुनर्गठन जैसे विकल्पों से वित्तीय राहत पा सकते हैं।

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मानसी वार्ष्णेय   
Last Updated- June 03, 2026 | 4:37 PM IST

Personal Loan Tips: आज के समय में लोन लेना पहले से कहीं आसान हो गया है, लेकिन उसके साथ मासिक EMI का बोझ भी उतनी ही तेजी से बढ़ा है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन जैसी सुविधाओं ने जहां लोगों के सपनों को पूरा करना आसान बनाया है, वहीं हर महीने आने वाली किस्तें कई परिवारों के बजट को प्रभावित कर रही हैं।

बढ़ती ब्याज दरें, बदलती आर्थिक परिस्थितियां और आय-व्यय का असंतुलन कई उधारकर्ताओं के लिए चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि लोग समय-समय पर अपने लोन की स्थिति की समीक्षा करें और यह समझें कि क्या वे अभी भी सबसे बेहतर शर्तों पर कर्ज चुका रहे हैं या नहीं।

वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि कई बार उपभोक्ता वर्षों तक एक ही लोन स्ट्रक्चर पर टिके रहते हैं, जबकि बाजार में बेहतर और सस्ते विकल्प उपलब्ध होते हैं। इसका सीधा असर उनकी मासिक बचत और वित्तीय स्थिरता पर पड़ता है।

लोन स्ट्रक्चर की समीक्षा है पहला जरूरी कदम

डिजिटल रेपुटेशन सेफ्टी प्लेटफॉर्म DiReFTY के संस्थापक अश्विनी कुमार का कहना है कि किसी भी उधारकर्ता को सबसे पहले यह जांचना चाहिए कि उसका मौजूदा लोन आज के ब्याज दरों के हिसाब से कितना प्रतिस्पर्धी है।

अश्विनी कुमार के अनुसार, “जिन उधारकर्ताओं पर EMI का बोझ अधिक है, उन्हें यह देखना चाहिए कि क्या उनका मौजूदा लोन स्ट्रक्चर अभी भी उपयुक्त है। रीफाइनेंसिंग, कम ब्याज दर वाले बैंक में बैलेंस ट्रांसफर, आंशिक प्री-पेमेंट या लोन की अवधि बढ़ाने जैसे विकल्प मासिक EMI को कम करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि इन सभी विकल्पों के दीर्घकालिक प्रभाव को समझना भी जरूरी है।”

वे आगे बताते हैं कि केवल EMI घटाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि कुल ब्याज भुगतान कितना बढ़ सकता है।

समय रहते कदम न उठाना बन सकता है बड़ी गलती

अश्विनी कुमार का मानना है कि अधिकांश उधारकर्ता तब कार्रवाई करते हैं जब वित्तीय दबाव बहुत अधिक हो जाता है। यह प्रवृत्ति आगे चलकर समस्या को और गंभीर बना सकती है।

उनका कहना है, “कई लोग तब बैंक या ऋणदाता से संपर्क करते हैं जब स्थिति लगभग नियंत्रण से बाहर हो जाती है। जबकि अगर शुरुआत में ही बातचीत की जाए, तो अधिक लचीलापन और बेहतर समाधान मिलने की संभावना रहती है।”

विशेषज्ञ के अनुसार, शुरुआती चरण में लोन रीस्ट्रक्चरिंग या मोडिफिकेशन के ऑप्शन अधिक प्रभावी साबित होते हैं और उधारकर्ता पर अतिरिक्त दबाव भी नहीं पड़ता।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से आसान हुई तुलना, लेकिन बढ़ा जोखिम

आज डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए लोन की तुलना करना और बेहतर विकल्प ढूंढना काफी आसान हो गया है। कुछ ही मिनटों में ब्याज दरों और शर्तों की जानकारी मिल जाती है, जिससे उपभोक्ता बेहतर निर्णय ले सकते हैं।

अश्विनी कुमार के मुताबिक, “तकनीक ने उपभोक्ताओं के लिए लोन उत्पादों की तुलना और बातचीत करना आसान बना दिया है, जिससे वे अपनी उधारी लागत कम कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ सावधानी रखना भी उतना ही जरूरी है।”

वे चेतावनी देते हैं कि ऑनलाइन मिलने वाले असामान्य ऑफर, कर्ज निपटान के नाम पर किए जाने वाले दावे और अनचाही वित्तीय योजनाएं अक्सर जोखिम भरी हो सकती हैं। वित्तीय दबाव की स्थिति में लोग ऐसे प्रस्तावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं, जिसका फायदा गलत लोग उठा सकते हैं।

कर्ज का असर सिर्फ आर्थिक नहीं

कर्ज से जुड़े मामलों का प्रभाव केवल आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर भी पड़ सकता है।

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डिजिटल युग में कई उपभोक्ताओं को अनचाहे कॉल्स, ऑनलाइन दबाव, व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग और संग्रह एजेंसियों की आक्रामक रणनीतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए पारदर्शी और जिम्मेदार ऋण प्रणाली की जरूरत और भी बढ़ जाती है।

अश्विनी कुमार का कहना है कि जिम्मेदार लोन प्रथाएं केवल वित्तीय स्थिरता ही नहीं बल्कि उपभोक्ता के विश्वास को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

आने वाले समय में रिटेल लेंडिंग सेक्टर का फोकस केवल रिकवरी पर नहीं बल्कि ग्राहक-केंद्रित सेवाओं पर होगा। इसमें पारदर्शिता, व्यक्तिगत समाधान, डिजिटल सेवाएं और समय रहते सहायता शामिल होगी।

इस बदलाव से उधारकर्ताओं को न केवल बेहतर अनुभव मिलेगा बल्कि वे अपनी वित्तीय स्थिति को अधिक संतुलित तरीके से संभाल सकेंगे।

First Published : June 3, 2026 | 4:37 PM IST