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Loan against MFs: म्युचुअल फंड पर कर्ज तभी लें जब ब्याज से ज्यादा रिटर्न मिले

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म्युचुअल फंड बाजार में निवेश करते हैं और इनकी कीमत घटती-बढ़ती रहती है। कर्ज देने वाली संस्था भी समय-समय पर देखती रहती है कि गिरवी रखी गई यूनिटों की कीमत कितनी है।

Last Updated- July 14, 2024 | 9:51 PM IST
Mutual Fund

Loan against MFs: एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक शेयरों में निवेश करने वाले सिर्फ 59 फीसदी खुदरा निवेशक ही अपनी रकम दो साल या उससे अधिक वक्त के लिए बरकरार रख पाते हैं। इलाज अथवा अन्य आपात स्थितियों के दौरान वे इसे भुना लेते हैं। इससे बचने का एक अच्छा रास्ता म्युचुअल फंड के एवज में कर्ज लेना है।

इस तरह के कर्ज में म्युचुअल फंड को गिरवी रखा जाता है, जिसे डीमैट प्रारूप में ही रखना चाहिए। बैंक बाजार के मुख्य कार्य अधिकारी आदिल शेट्टी कहते हैं, ‘ऋणदाता यह देखता है कि फंड उसकी मंजूरी वाली सूची से है या नहीं।’

कर्ज लेते समय मूल्य-ऋण अनुपात एलटीवी अहम होता है। यह अनुपात ही बताता है कि गिरवी रखी गई संपत्ति की कुल कीमत का कितना प्रतिशत कर्ज मिलेगा। अक्सर इक्विटी फंड के लिए 45 से 50 फीसदी और डेट फंड के लिए 75 से 85 फीसदी एलटीवी रखा जाता है। ब्याज दर अमूमन 10 से 16 फीसदी के बीच होती है मगर कभी-कभी इससे अधिक हो सकती है।

शेट्टी का कहना है, ‘नए ग्राहकों और खराब क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहकों से अधिक ब्याज वसूला जाता है।’ दर इस बात पर भी निर्भर करती है कि गिरवी संपत्ति में कितना जोखिम है। इस कर्ज से निवेशकों को अपना निवेश लंबे समय तक बढ़ाते रहने का मौका मिलता है।

मिरै ऐसेट फाइनैंशियल सर्विसेज के निदेशक और मुख्य कार्य अधिकारी कृष्ण कन्हैया कहते हैं, ‘अगर आपका पोर्टफोलियो सालाना 12 से 15 फीसदी रिटर्न देता है और आपको उस पर केवल 10.5 फीसदी ब्याज दर पर कर्ज मिल सकता है तो पोर्टफोलियो भुनाने में कोई समझदारी नहीं होगी।’

अगर इक्विटी फंड को एक साल पूरा होने से पहले ही भुनाया जाए तो अल्पावधि पूंजीगत लाभ कर (15 फीसदी) और एक्जिट लोड का बोझ बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए म्युचुअल फंड पर कर्ज लिया जा सकता है।

पैसाबाजार के मुख्य वित्त अधिकारी (सुरक्षित ऋण) साहिल अरोड़ा बताते हैं कि म्युचुअल फंड पर मिलने वाले कर्ज का इस्तेमाल अपनी मर्जी से किया जा सकता है और इस पर कोई बंदिश नहीं होती। यह कर्ज ओवरड्राफ्ट सुविधा की तरह होता है।

अरोड़ा समझाते हैं, ‘कर्ज की जो भी रकम मंजूर की जाती है, उसमें से कर्जदार अपनी जरूरत के मुताबिक रकम निकाल सकता है, जिसे किस्तों में चुकाया जा सकता है। जितनी बार चाहें रकम निकाली जा सकती है। प्रीपेमेंट का कोई शुल्क भी नहीं लगता।’ जितनी रकम निकाली गई है और जितने दिनों के लिए निकाली गई है, उतना ही ब्याज लिया जाता है।

म्युचुअल फंड बाजार में निवेश करते हैं और इनकी कीमत घटती-बढ़ती रहती है। कर्ज देने वाली संस्था भी समय-समय पर देखती रहती है कि गिरवी रखी गई यूनिटों की कीमत कितनी है। अगर किसी म्युचुअल फंड के शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) में बहुत ज्यादा गिरावट आती है तो कर्ज में दी गई रकम एलटीवी अनुपात से ज्यादा हो सकती है। उस सूरत में संस्था कर्ज लेने वाले को बताती है कि उसे और फंड यूनिट गिरवी रखनी पड़ेंगी या कुछ कर्ज का नकद भुगतान करना पड़ेगा। अरोड़ा कहते हैं, ‘अगर ग्राहक सात दिनों के भीतर नई यूनिट गिरवी नहीं रखता या नकद नहीं चुकाता तो कर्ज देने वाली संस्था गिरवी रखी यूनिटों को बेच सकती है।’

एलटीवी अनुपात के हिसाब से रकम होने पर कर्ज में दी गई अतिरिक्त रकम को ओवरड्यू माना जाता है। कन्हैया का कहना है, ‘जब तक इसे चुका नहीं देते तब तक इस पर सालाना 15 फीसदी ओवरड्यू चार्ज और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगता रहता है।’ ओवरड्यू नहीं चुकाया जाए तो कर्ज लेने वाले का क्रेडिट स्कोर भी कम हो जाता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि म्युचुअल फंड को गिरवी रखकर कर्ज लिया जाए या नहीं? इसके लिए देखिए कि कर्ज किस ब्याज दर पर मिल रहा है और इन फंड पर आपकी रिटर्न दर क्या है। दोनों की तुलना कीजिए। शेट्टी का कहना है कि अगर पोर्टफोलियो पर मिलने वाले रिटर्न की दर अधिक है तो गिरवी रखकर कर्ज ले लीजिए। अगर रिटर्न दर कम है तो यूनिट बेच दीजिए।

यह कर्ज तभी लीजिए, जब इसे चुकाने का इंतजाम आपके पास हो। सहज-मनी के संस्थापक और सेबी के पंजीकृत निवेश सलाहकार (आरआईए) अभिषेक कुमार का कहना है, ‘अगर कर्ज देने वाली संस्था अलग से जमानत मांगती है तो कर्जदार के पास गिरवी रखने के लिए कुछ होना चाहिए।’

कन्हैया की सलाह है कि मंजूर किया गया पूरा कर्ज इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अगर आप इस तरह के कर्ज से बचना चाहते हैं तो कुमार आपको आपातकाल के लिए रकम जमा कर अलग रखने की राय देते हैं।

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First Published - July 14, 2024 | 9:51 PM IST

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