Salary Structure Change: 1 अप्रैल की सुबह इस बार सिर्फ कैलेंडर नहीं बदलेगी, बल्कि आपकी सैलरी, सेविंग्स और टैक्स की पूरी कहानी नया मोड़ लेगी। ऑफिस जाने वाले करोड़ों लोगों के लिए ये तारीख एक नए दौर की शुरुआत जैसी है, जहां पे स्लिप का चेहरा बदलेगा, हाथ में आने वाली तनख्वाह का एहसास थोड़ा अलग होगा और भविष्य के लिए बचत का गणित अलग तरीके से कैलकुलेट होगा।
अब तक जो नियम धीरे-धीरे फाइलों में चलते थे, वो जमीन पर उतरने वाले हैं। नौकरी बदलने का अनुभव, पैसे मिलने का इंतजार, और टैक्स समझने की उलझन, इन सबमें एक नई रफ्तार और सादगी आने वाली है।
आसान भाषा में कहें तो अब आपकी मेहनत की कमाई का हिसाब थोड़ा साफ, थोड़ा तेज और थोड़ा लंबी सोच वाला होने जा रहा है। और यही बदलाव आने वाले समय में आपकी जेब और प्लानिंग दोनों को नए तरीके से प्रभावित करेगा।
कई सालों से प्राइवेट कंपनियां बेसिक सैलरी को जानबूझकर कम रखती थीं। आमतौर पर ये 25 से 40 फीसदी के बीच ही रहती थी। इसका मकसद PF और ग्रेच्युटी पर कम पैसे खर्च करना और कर्मचारी के हाथ में ज्यादा टेक होम पे देना था। लेकिन अब ये खेल खत्म होने वाला है।
‘कोड ऑन वेजेस 2019’ के तहत अब वेजेस की एक साफ परिभाषा आ गई है। बेसिक पे, डियरनेस अलाउंस और रिटेनिंग अलाउंस को मिलाकर कुल CTC का कम से कम 50 फीसदी होना जरूरी है। प्राइवेट सेक्टर में DA और रिटेनिंग अलाउंस ज्यादा चलन में नहीं है, इसलिए ज्यादातर कंपनियां बेसिक सैलरी बढ़ा देंगी। अगर फिर भी अलाउंस 50 फीसदी से ज्यादा रह गए तो बाकी हिस्सा भी वेजेस माना जाएगा।
ये नियम पूरे भारत में हर जगह लागू होगा। चाहे 15 लोगों की छोटी स्टार्टअप हो या 50 हजार कर्मचारियों वाली बड़ी कंपनी, किसी को कोई छूट नहीं होगी। अब पे स्लिप देखते ही सैलरी स्ट्रक्चर अलग नजर आएगा।
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बेसिक सैलरी बढ़ने का सीधा असर रिटायरमेंट सेविंग्स पर पड़ेगा। क्योंकि PF और ग्रेच्युटी बेसिक पर ही कैलकुलेट होते हैं, इसलिए इनमें योगदान बढ़ जाएगा। कर्मचारियों के लिए शुरुआत में महीने की टेक होम सैलरी थोड़ी कम हो सकती है। लेकिन लंबे समय में फायदा बहुत बड़ा है। PF में ज्यादा पैसा हर महीने जमा होगा और कंपाउंडिंग के साथ रिटायरमेंट का कोष काफी मोटा हो जाएगा। नौकरी छोड़ते समय ग्रेच्युटी भी ज्यादा मिलेगी क्योंकि वो आखिरी बेसिक सैलरी पर आधारित होती है।
कंपनियों पर भी बोझ बढ़ेगा। इंडस्ट्री के जानकारों का अनुमान है कि PF और ग्रेच्युटी मिलाकर स्टैट्यूटरी खर्च 5 से 15 फीसदी तक ऊपर जा सकता है। IT, रिटेल, BPO और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की कंपनियां सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी क्योंकि इन्होंने हमेशा बेसिक सैलरी को कम रखा था।
जो सबसे बड़ा और तुरंत राहत देने वाला बदलाव है वो है फुल एंड फाइनल सेटलमेंट का समय। पहले कर्मचारी नौकरी छोड़ते समय 30 से 90 दिन तक इंतजार करते थे। पेंडिंग सैलरी, लीव एनकैशमेंट और दूसरे बकाए मिलने में देरी होती थी। इससे कई लोगों को आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ती थी, खासकर जब नई नौकरी जॉइन करने की जल्दी हो।
अब ‘कोड ऑन वेजेस’ के सेक्शन 17(2) के तहत कंपनियों को कर्मचारी के आखिरी काम के दिन से दो वर्किंग दिनों के अंदर सारे वेज संबंधी बकाए चुकाने होंगे। चाहे इस्तीफा दिया हो, छंटनी हुई हो, डिस्मिसल हुआ हो या कोई भी वजह से अलगाव हुआ हो। देरी अब सिर्फ खराब प्रैक्टिस नहीं, बल्कि कानूनी उल्लंघन है। कर्मचारी राज्य के लेबर डिपार्टमेंट में शिकायत कर सकते हैं और देरी पर ब्याज भी मिल सकता है।
हालांकि, ग्रेच्युटी का अपना 30 दिन का नियम है और PF ट्रांसफर EPFO के अलग प्रोसेस से होता है, इसलिए ये दोनों इस दो दिन के नियम में नहीं आते।
1 अप्रैल 2026 को इनकम टैक्स एक्ट 1961 हमेशा के लिए अलविदा कह देगा। ये कानून 60 साल से ज्यादा पुराना था और इसमें हजारों संशोधन हो चुके थे। कुल 800 से ज्यादा धाराएं और 47 चैप्टर थे। अब नया इनकम टैक्स एक्ट 2025 आ रहा है।
ये नया कानून टैक्स रेट या ज्यादातर डिडक्शन नहीं बदलता। सिर्फ भाषा साफ की गई है। धाराओं की संख्या 819 से घटाकर 536 कर दी गई है और चैप्टर 47 से 23 रह गए हैं। सरकार का कहना है कि अब आम आदमी को स्पेशलिस्ट की मदद कम चाहिए पड़ेगी।
एक जरूरी बात: 31 मार्च 2026 तक का इनकम पुराने कानून के तहत रहेगा। 1 अप्रैल 2026 से बाद का इनकम नये कानून से आएगा। पुराने कानून के तहत चल रहे असेसमेंट, अपील या कोई भी प्रोसीडिंग वैसे ही पुराने कानून से निपटेगी।
पुराने सिस्टम में सबसे कन्फ्यूजिंग बात ये थी कि इनकम कब कमाई गई (प्रीवियस ईयर) और कब टैक्स भरा गया (असेसमेंट ईयर)। दोनों साल अलग होते थे, इसलिए लोग अक्सर कन्फ्यूज हो जाते थे।
नए एक्ट में दोनों शब्द खत्म कर दिए गए हैं। अब सिर्फ एक टर्म है टैक्स ईयर। 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2027 तक की इनकम को टैक्स ईयर 2026-27 कहेंगे। ये वो ही साल होगा जिसमें रिटर्न फाइल किया जाएगा। अब साल गिनने की कोई झंझट नहीं।
विदेश घूमने या बच्चों की पढ़ाई-इलाज के लिए पैसे भेजने वाले परिवारों को अब काफी राहत मिलेगी। बजट 2026 में टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स यानी TCS के रेट्स बदले गए हैं और ये 1 अप्रैल से लागू।
पहले ओवरसीज टूर पैकेज पर 7 लाख तक 5 फीसदी और उससे ऊपर 20 फीसदी TCS लगता था। अब फ्लैट 2 फीसदी रेट है, कोई थ्रेशोल्ड नहीं। उसी तरह एजुकेशन और मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत 10 लाख से ऊपर के रेमिटेंस पर भी अब 2 फीसदी ही TCS।
यह बदलाव असल में आपके कुल टैक्स (tax liability) को कम नहीं करता, क्योंकि TCS सिर्फ एडवांस टैक्स होता है, जो बाद में ITR फाइल करते समय एडजस्ट हो जाता है।
लेकिन हां, अब शुरुआत में जो पैसा फंस जाता था, वो परेशानी काफी हद तक कम हो गई है।
टैक्स फाइल करने वालों को एक और सुविधा मिल रही है। रिवाइज्ड इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की समयसीमा टैक्स ईयर खत्म होने के 9 महीने से बढ़ाकर 12 महीने कर दी गई है। यानी तीन महीने का एक्स्ट्रा टाइम।
लेकिन इसमें एक शर्त है। 9 महीने के बाद रिवाइज्ड रिटर्न फाइल करने पर अब फीस लगेगी। अगर बिना अतिरिक्त खर्च के रिवाइज करना है तो पुराने 9 महीने के अंदर ही कर लें।
जो लोग सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में निवेश करते हैं उन्हें एक अहम बदलाव ध्यान में रखना चाहिए। पहले मैच्योरिटी पर कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स फ्री था, चाहे बॉन्ड RBI से प्राइमरी इश्यू में खरीदा हो या स्टॉक एक्सचेंज से सेकंडरी मार्केट में। अब ये छूट सिर्फ उन लोगों के लिए है जो सीधे RBI से प्राइमरी इश्यू में सब्सक्राइब किए थे।
अगर आपने स्टॉक एक्सचेंज से खरीदा है तो मैच्योरिटी पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा। होल्डिंग पीरियड के हिसाब से 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन या फिर शॉर्ट टर्म गेन के तौर पर इनकम में जोड़कर टैक्स।
ये सारे बदलाव 1 अप्रैल 2026 से एक साथ शुरू हो रहे हैं। कामकाजी लोगों, नौकरी बदलने वालों, टैक्सपेयर्स, विदेश यात्रा करने वालों और निवेशकों को अपनी प्लानिंग थोड़ी पहले से करनी होगी। सैलरी स्ट्रक्चर, सेविंग्स और टैक्स फाइलिंग सब पर असर पड़ेगा, लेकिन लंबे समय में ज्यादातर बदलाव साफ और फायदेमंद साबित होने वाले हैं।