प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
नए वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत के साथ टैक्स कटौती स्रोत (TDS) और टैक्स संग्रह स्रोत (TCS) के नियमों में कई अहम बदलाव लागू हो गए हैं। ये बदलाव 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो गए हैं। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य टैक्स प्रक्रिया को ज्यादा सरल, साफ-सुथरा और आसान बनाना है, ताकि आम लोगों को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े। ये बदलाव खास तौर पर विदेश में पैसे भेजने, प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री और निवेश से होने वाली आय से जुड़े मामलों पर लागू हैं। कुल मिलाकर, इन सुधारों से टैक्स का बोझ कम होने और कंप्लायंस की मुश्किलें घटने की उम्मीद है।
सबसे बड़ा राहत वाला बदलाव विदेशी पैसे भेजने (foreign remittance) और विदेश यात्रा पैकेज पर TCS की दर को लेकर आया है। अब ज्यादातर मामलों में TCS सिर्फ 2 प्रतिशत ही लगेगा। पहले कुछ मामलों में यह दर 20 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी, जिससे लोगों पर एक साथ ज्यादा पैसा देने का दबाव पड़ता था और कैश फ्लो बिगड़ जाता था।
1 फाइनेंस की पर्सनल टैक्स हेड और चार्टर्ड अकाउंटेंट नियति शाह के मुताबिक, अब 2 प्रतिशत की एक समान दर होने से लोगों को अपना पैसा बेहतर तरीके से प्लान करने में आसानी होगी। पहले ज्यादा दरों की वजह से खासकर विदेश में पढ़ाई के लिए पैसे भेजते समय परिवारों को लिक्विडिटी की दिक्कत झेलनी पड़ती थी और रिफंड का इंतजार भी करना पड़ता था। अब यह दबाव काफी कम हो जाएगा।
सिरिल अमरचंद मंगलदास के पार्टनर कुणाल सवानी भी इस बदलाव को पॉजेटिव मानते हैं। उनके अनुसार, पहले 20 प्रतिशत तक TCS लगने की वजह से ट्रैवल या खुद की पढ़ाई के लिए भेजे गए पैसे पर काफी कैश ब्लॉक हो जाता था। अब कम दर की वजह से बजट बनाना आसान होगा और रिफंड पर निर्भरता भी कम होगी।
सुप्रीम कोर्ट के वकील तुषार कुमार का कहना है कि पहले ज्यादा TCS दरों की वजह से तुरंत कैश फ्लो पर दबाव पड़ता था, लेकिन अब सही विदेशी खर्च बिना ज्यादा रुकावट के हो पाएगा। हालांकि वे यह भी साफ करते हैं कि TCS अभी भी एक एडवांस टैक्स है, इसलिए रिफंड मिलने में थोड़ा समय लग सकता है।
NRI से प्रॉपर्टी खरीदने वालों के लिए भी सरकार ने बड़ी राहत दी है। 1 अक्टूबर 2026 से अब प्रॉपर्टी खरीदने वाले भारतीयों को TAN (Tax Deduction Account Number) लेने की जरूरत नहीं होगी। इसकी जगह सिर्फ PAN से ही काम चल जाएगा।
नियति शाह बताती हैं कि पहले एक बार प्रॉपर्टी खरीदने वाले व्यक्ति को भी TAN के लिए आवेदन करना पड़ता था, फिर TDS काटना, रिटर्न फाइल करना और सर्टिफिकेट जारी करना जैसी कई प्रक्रियाएं करनी पड़ती थीं। यह पूरा प्रोसेस काफी मुश्किल था और लोगों को बीच में एजेंट या बिचौलियों पर भी निर्भर रहना पड़ता था।
कुणाल सवानी का कहना है कि अब यह पूरा प्रक्रियागत झंझट खत्म हो गया है। इससे डील जल्दी पूरी होगी और नियमों का पालन न करने (non-compliance) का जोखिम भी कम होगा।
तुषार कुमार के मुताबिक, इस बदलाव से बाजार में भागीदारी बढ़ सकती है, खासकर उन शहरों में जहां NRI की प्रॉपर्टी ज्यादा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि TDS सही दर से काटने और उसे जमा करने की जिम्मेदारी पहले की तरह ही बनी रहेगी।
ग्रेट लेक्स, चेन्नई के फाइनेंस प्रोफेसर विश्वनाथन अय्यर भी इस बात पर जोर देते हैं कि यह सिर्फ प्रक्रिया को आसान बनाने का कदम है। TDS काटने और जमा करने की मूल जिम्मेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
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रिटेल निवेशकों के लिए भी एक अच्छी खबर है। अब TDS न काटने के लिए सिर्फ एक ही डिक्लेरेशन फॉर्म भरना होगा, जो सभी संस्थानों में मान्य रहेगा। पहले हर पेयर (payer) को अलग-अलग डिक्लेरेशन देना पड़ता था, जिससे काम बढ़ जाता था और गलती होने की संभावना भी ज्यादा रहती थी।
नियति शाह कहती हैं कि इस नई व्यवस्था से दोहराव (duplication) खत्म होगा और गलतियों की संभावना कम हो जाएगी। विश्वनाथन अय्यर का मानना है कि यह कदम खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिनकी आमदनी कई अलग-अलग स्रोतों से आती है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि यह सिस्टम सबसे बेहतर तभी काम करेगा जब यह डिपॉजिटरी सिस्टम के भीतर सही तरीके से लागू हो।
तुषार कुमार का कहना है कि इस बदलाव का पूरा फायदा तभी मिलेगा जब सभी संस्थानों के बीच डेटा का सही तरीके से इंटीग्रेशन (integration) हो पाए।
मुख्य बदलाव एक नजर में इस तरह हैं:
(ये सभी बदलाव वित्त वर्ष 2026-27 से लागू होंगे, कुछ मामलों को छोड़कर)
हालांकि नियम आसान हुए हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। नियति शाह कहती हैं कि कई लोग यह समझ लेते हैं कि TCS की दर कम होने से टैक्स की जिम्मेदारी खत्म हो गई, जबकि ऐसा नहीं है। TCS सिर्फ टैक्स वसूली का एक तरीका है। असली जरूरत यह है कि टैक्स रिटर्न भरते समय TCS का सही क्रेडिट जोड़ा जाए।
विश्वनाथन अय्यर नॉन-TDS डिक्लेरेशन में होने वाली गलतियों की ओर इशारा करते हैं। अगर किसी की आय टैक्सेबल है, फिर भी गलती से गलत फॉर्म भर दिया जाए, तो आगे चलकर दिक्कत हो सकती है।
तुषार कुमार का कहना है कि NRI प्रॉपर्टी डील्स में TDS की सही दर तय करना एक बड़ा जोखिम बना रहेगा। इसके अलावा डेटा आधारित जांच (data-driven scrutiny) बढ़ने की वजह से अब गलतियों पर नजर और ज्यादा सख्त हो गई है।