प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो: Google Gemini
आजकल अच्छी पढ़ाई, बढ़िया नौकरी और करियर में आगे बढ़ने के लिए लाखों युवा अपना घर-बार छोड़कर दूसरे बड़े शहरों में जा रहे हैं। लेकिन एक नए शहर में कदम रखते ही सबसे बड़ी मुसीबत होती है अपने बजट में पसंद का किराए का घर ढूंढना। इस बीच भारत के हाउसिंग सेक्टर में घर ढूंढने के इसी झंझट को खत्म करने और किराएदारों की लाइफ आसान बनाने के लिए एक नया तकनीकी बदलाव आ रहा है। इस नए ट्रेंड को ‘पोर्टेबल डिजिटल रेंटल आइडेंटिटी’ (Portable Digital Rental Identity) नाम दिया गया है। एक्सपर्ट का मानना है कि यह नया आइडिया देश के किराए के बाजार को पूरी तरह बदल सकता है और यही वजह है कि आज के युवाओं के बीच इसकी चर्चा और डिमांड दोनों बहुत तेजी से बढ़ रही है।
अगर आसान और बोलचाल की भाषा में समझें तो ‘पोर्टेबल डिजिटल रेंटल आइडेंटिटी’ किराएदार का एक ऐसा डिजिटल पहचान पत्र या रिपोर्ट कार्ड है, जो उसके किराएदारी के इतिहास (Rental History) को दिखाता है। जैसे जब आप बैंक से लोन या क्रेडिट कार्ड लेने जाते हैं, तो बैंक आपका ‘सिबिल स्कोर’ देखता है ताकि यह पता चल सके कि आपने पहले के लोन समय पर चुकाए हैं या नहीं। ठीक इसी तरह, यह डिजिटल रेंटल आइडेंटिटी नए मकान मालिक को यह बताती है कि कोई किराएदार समय पर किराया देता है या नहीं और उसका पिछला रिकॉर्ड कैसा रहा है।
किराए के बाजार की इस जमीनी हकीकत और दिक्कत पर बात करते हुए RentenPe की को-फाउंडर और CEO सारिका शेट्टी बताती हैं, “भारत में बड़ी संख्या में छात्र और युवा पढ़ाई और नौकरी के बेहतर अवसरों के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे हैं। लेकिन उनकी इस बढ़ती आवाजाही को सपोर्ट करने के लिए हाउसिंग इकोसिस्टम में अभी भी जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। लोन सेक्टर में जहां क्रेडिट ब्यूरो की वजह से किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता उसके साथ नए शहर तक पहुंच जाती है, वहीं किराएदारों के मामले में ऐसा नहीं है। उनकी रेंटल क्रेडिबिलिटी यानी किराएदारी का रिकॉर्ड और भरोसेमंद छवि अक्सर शहर बदलने के साथ पीछे छूट जाती है।”
शेट्टी आगे बताती हैं, “अगर कोई किराएदार पुणे में कई सालों तक समय पर किराया देता रहा हो, तब भी बेंगलुरु पहुंचने पर उसकी वह विश्वसनीयता लगभग बेकार हो जाती है। मकान मालिकों के पास किराएदार के पिछले रिकॉर्ड की पक्की जानकारी नहीं होती, इसलिए वे अक्सर पुरानी जान-पहचान या अपने अनुमान के आधार पर फैसला लेते हैं।”
उनके मुताबिक, इसका नतीजा यह होता है कि वे ज्यादा सिक्योरिटी डिपॉजिट मांगते हैं, घर किराए पर लेने की प्रक्रिया लंबी और मुश्किल हो जाती है, और बाहर से आए किराएदारों की तुलना में स्थानीय या परिचित लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।”
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जब कोई युवा किसी नए शहर में जाता है, तो भले ही उसकी सैलरी अच्छी हो, लेकिन नए मकान मालिकों के पास उसकी ईमानदारी को परखने का कोई पक्का जरिया नहीं होता। इस भरोसे की कमी या डेटा न होने का सबसे बड़ा नुकसान देश के उन युवाओं को ही उठाना पड़ता है, जो इन शहरों को आगे बढ़ा रहे हैं।
शेट्टी का कहना है कि इस व्यवस्था की वजह से पैदा होने वाली दिक्कतों का सबसे ज्यादा असर भारत के युवा और आर्थिक रूप से सबसे सक्रिय किराएदारों पर पड़ता है। यही लोग देश के तेजी से बढ़ते बड़े शहरों में किराए के मकानों की मांग को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में अब रेंटल पहचान को औपचारिक रूप देने और किराएदारों के पिछले रिकॉर्ड को ऐसा बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है, जिसे कहीं भी आसानी से साथ ले जाया जा सके और सत्यापित किया जा सके। इसी वजह से इस विषय पर चर्चा तेज हो रही है और इसे भारत के हाउसिंग सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में देखा जा रहा है।
इस नए बदलाव के भविष्य और फायदों पर अपनी बात रखते हुए सारिका शेट्टी कहती हैं, “भारत जैसे-जैसे तेजी से शहरी और डिजिटलाइजेशन की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे एक पोर्टेबल डिजिटल रेंटल आइडेंटिटी हाउसिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकती है। यह व्यवस्था मकान मालिकों और किराएदारों के बीच भरोसा बढ़ाने, जानकारी को अधिक पारदर्शी बनाने और घर किराए पर लेने की पूरी प्रक्रिया को ज्यादा तेज, आसान और प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है।”