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नए जमाने की तकनीक है 3जी

Last Updated- December 07, 2022 | 1:03 AM IST

अपने देश में 3जी तकनीक पर भारी बहस मची हुई है। कंपनियां जल्दी से जल्दी इसे भारत में लॉन्च करने की मांग कर रहीं हैं, जबकि सरकार है कि इसे टालने में लगी हुई है।


आए दिन इसके बारे में खबरें छपती रहती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भला यह होती कौन सी चीज है? आज की तारीख आदमी की बुनियादी जरूरतों में रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ मोबाइल भी शामिल हो गया है। मोबाइल भी कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि ऐसा जिसमें एसएमएस के साथ-साथ इंटरनेट सर्फ करने की सुविधा हो।

एमएमएस भी हो. ताकि आप उसके जरिये फोन के कैमरे से खींची गई खूबसूरत तस्वीरों को अपने दोस्तों को भेज सकें। इस वक्त फोन में इंटरनेट तो है, लेकिन उससे सर्फ न केवल काफी महंगा है बल्कि एक वेबपेज को लोड होने में दसियों मिनट लग जाते हैं। एक तस्वीर को एमएमएस करने में सुबह से शाम हो जाती है। 3 जी टेक्नोलॉजी आपकी इन मुश्किलों को दूर करने के लिए ही आ रही है।

क्या बला है यह?

एक वाक्य में कहें तो मोबाइल फोन स्टैंडड्र्स और तकनीक की तीसरी पीढ़ी को 3जी कहते हैं। तकनीकी अल्फाज में कहें तो यह अंतरराष्ट्रीय मोबाइल दूरसंचार प्रोग्राम, आईएमटी2000 के तहत इंटरनैशनल टेलिकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) परिवार का सदस्य है।

3जी की तकनीक की वजह से आप तक एडवांस सर्विसेज इसलिए पहुंच पाती हैं क्योंकि इसमें  नेटवर्क कैपेसिटी का बेहतर इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इसके लिए काफी बड़े स्पेक्ट्रम की भी जरूरत होती है। इसमें इस्तेमाल किया जाता है एचएसपीए डेटा ट्रांसमिशन तकनीक का, जिसकी वजह से आपकी मुट्टी में समाए सेलफोन में बिजली सी तेजी आ जाती है और आप बेखटक विडियो कॉल्स और ब्रॉडबैंड सी रफ्तार वाले इंटरनेट का लुत्फ उठा सकते हैं।
ऐसे हुई शुरुआत

इस सबसे पहले एक अक्टूबर, 2001 में लॉन्च किया था जापान में एनटीटी डोकोमो ने। लेकिन इस मामले में सबसे पहले प्रतियोगिता देखी गई दक्षिण कोरिया में, जहां मई, 2002 तक दो कंपनियों ने 3जी सेवाओं को लॉन्च कर लिया था। ब्रिटेन के आइल ऑफ मैन इलाके में दिसंबर, 2001 में इस लॉन्च कर दिया गया, लेकिन उस वक्त वहां न तो कोई हैंडसेट मौजूद था, न ही कोई नेटवर्क प्रोवाइडर इसे उपलब्ध करवा रहा था।

यूरोपीयों को इसकी पहली झलक देखने को मिली मार्च, 2003 में। इस साल के अक्टूबर के महीने में तो अमेरिका में भी इससे लॉन्च किया गया। आस्टे्रलिया में भी इसे फरवरी 2002 तक आ गया था। मार्च, 2006 तक तो यह अफ्रीका में भी पहुंच गया था। ग्लोबल मोबाइल सप्लायर्स एसोसिएशन की मानें तो दिसंबर, 2007 तक यह तकनीक 71 देशों में आ चुकी थी।

जून, 2007 तक तो दुनिया भर के 20 करोड़ लोग-बागों के हाथों में रहने वाले मोबाइल इस तकनीक से जुड़ चुके हैं। लेकिन अब भी दुनिया के केवल 6.7 फीसदी मोबाइल फोन उपभोक्ता ही इस तकनीक से जुड़ पाए हैं। अब भी चीन, तुर्की और भारत जैसे कई अहम देशों में यह तकनीक आ नहीं पाई है।

फायदे क्या हैं?

जैसे की हम आपको पहले ही बता चुके हैं, यह आज की मौजूदा तकनीक से काफी ज्यादा एडवांस है। 2जी तकनीक मतलब दूसरी पीढ़ी की वॉयरलेस टेलिफोन तकनीक होता है। 2जी तकनीक पर आधारित नेटवर्क डिजीटल होते हैं, जबकि 3जी की मदद से मोबाइल फोन केवल फोन से बढ़कर काफी ज्यादा बन जाता है।

3जी तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे डेटा ट्रांसफर की रफ्तार बिजली जैसी तेज हो जाती है। 2जी के मुकाबले यह नई तकनीक 40 गुना तेज रफ्तार डेटा भेज सकती है और रिसीव भी कर सकती है। इससे आप विडियो कॉल कर सकते हैं। मतलब कि आप अपने दोस्तों की आवाज सुनने के साथ-साथ उनकी तस्वीर भी देख सकते हैं। इसके जरिये आपको पलक झपकते ही अपने शेयरों की जानकारी मिल जाएगी।

साथ ही, आप इसके जरिये ई-लर्निंग का अपना शौक भी पूरा कर सकते हैं। यानी इसकी वजह से आप बिना कॉलेज गए ही अपनी पढ़ाई कर सकते हैं। साथ ही, अगर यह लागू हो गया तो बीमार होने पर आपका मोबाइल फोन ही आपके डॉक्टर की भूमिका में आ जाएगा।

आम लोगों के साथ-साथ यह टेलीकॉम कंपनियों के भी फायदे का सौदा है। उन्हें उम्मीद है कि एक बार यह तकनीक भारत में आ गई फिर तो विडियो कॉल और दूसरी सुविधाएं उनपर पैसों की बौछार कर देगी। झट से अपने फोन पर नए-नए गानों को लोड सकते हैं। साथ ही, इसके आप मैसेजिंग सेवाओं का भी लाभ उठा सकते हैं।

इसमें भी हैं खामियां

इस तकनीक की तो सबसे बड़ी खामी तो इसका काफी महंगा होना ही है। कई यूरोपीय मु्ल्कों में इसे कामयाबी के साथ लॉन्च कर तो दिया गया, लेकिन इस लाने पर कंपनियों को काफी मोटी-ताजी रकम खर्च करनी पड़ी थी। उन्हें इसके लिए अरब यूरो खर्च करने पड़े थे, जिससे उनके मुनाफे पर असर पड़ा था।

उन्हें पहले तो स्पेक्ट्रम को लेने के खातिर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ी, बाद में मशीनरी के लिए भी अपनी जेब काफी हल्की करनी पड़ी थी। इस वजह से 3जी सेवाओं की कीमत में भी खासा उछाल आ जाता है। इसी वजह से तो जिन देशों में यह तकनीक आ चुकी है, वहां भी लोगों का रवैया इसे लेकर ज्यादा उत्साहजनक नहीं है।

इसमें एक बात यह भी है कि लोगों यह नई तकनीक पसंद आएगी या नहीं, इस बारे में भी कंपनियां पेशोपेश में पड़ी हुई हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि 2जी वो सारी सु्विधाएं हैं, जिसकी एक आम आदमी को दरकार होती है। फिर 3जी सेलफोन हैंडसेटों के दाम भी तो काफी ज्यादा होते हैं। इसके अलावा, कई देश तो अब 4जी तकनीक को लाने में जुट गए हैं।

यहां क्या है हालत?

अपने देश में तो 3जी के बारे में काफी हंगामा मचा हुआ है। वजह है, ट्राई और दूरसंचार मंत्रालय के बीच में मचा हुआ घमासान। इस घमासान की वजह यह है कि दूरसंचार मंत्रालय 3जी सेवाओं के लिए नीलामी की मांग कर रही थी, जबकि ट्राई केवल उन्हीं कंपनियों को 3जी स्पेक्ट्रम देना चाहती थी, जिनके पास पहले से ही टेलिकॉम लाइसेंस हैं।

यही देश में इस तकनीक के आने की राह सबसे बड़े रोड़े हैं। इस तकनीक को हासिल करने की दौड़ में 3जी लाइसेंसस हासिल करने की दौड़ में बीएसएनएल, एमटीएनएल, एयरटेल, वोडाफोन जैसे सारे बड़े मोबाइल फोन सेवा प्रदाता कंपनियां लगी हुई हैं। इसके लिए ट्राई का तीन स्पेक्ट्रम की पहचान भी कर ली है।

इसमें 2.1 गीगाहट्र्ज की फ्रिक्वेंसी सीडीएमए ऑपरेटरों को दी गई है, जबकि 900 और 1800 मेगाहट्र्ज जीएसएम ऑपरेटरों दिए गए हैं। वैसे देश भर में 3जी तकनीक को लॉन्च करने के लिए उसने 1.4 अरब रुपये का बेस प्राइस रखा है, जिसका टेल्को ऑपरेटर काफी विरोध कर रहे हैं।

First Published - May 22, 2008 | 11:38 PM IST

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