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आधा भरा हुआ एक गिलास

Last Updated- December 07, 2022 | 7:42 AM IST

हाल ही में इंटरनेट उपभोक्ताओं पर किए गए ए सी नीलसन ग्लोबल कंज्यूमर कॉन्फीडेंस सर्वे से जो बात सामने निकल कर आई है उससे कोई खास अचंभा नहीं होता है।


कुल 51 देशों के 28,000 से अधिक इंटरनेट उपभोक्ताओं पर किए गए सर्वे से जो खुलासा हुआ है उसे जानकर इसलिए भी हैरानी नहीं होती है क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था और अल्पावधि के परिदृश्य ही कुछ इस तरह के बने हुए हैं।

इस सर्वे से पता चला है कि अमेरिका में उपभोक्ता विश्वास सूचकांक में आश्चर्यजनक रूप से 17 अंकों की गिरावट आई है, वहीं 66 फीसदी अमेरिकियों ने बताया कि उनमें अपने रोजगार के विकास को लेकर पिछले वर्ष की तुलना में अधिक निराशा है। हालांकि, छह महीने पहले नीलसन का जो सर्वे आया था, इस बार परिणाम उससे ठीक विपरीत हैं।

उस दफा अमेरिका उन देशों की सूची में शामिल तक नहीं था जहां लोगों में अपने रोजगार और भविष्य को लेकर निराशा थी। इस सर्वे से पता चला है कि जापान में भी परिस्थितियां कमोबेश कुछ इसी तरीके की हैं जहां 88 फीसदी लोग रोजगार के अवसरों को लेकर निराश हैं। ऐसे लोगों की संख्या पिछले साल की तुलना में अधिक है जब 83 फीसदी लोग अपने रोजगार को लेकर नाखुश थे।

इस सर्वे में भारत के लिए भी कुछ अच्छे संकेत सामने निकलकर नहीं आए हैं। देश में उपभोक्ता विश्वास में तेज गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2007 की दूसरी छमाही में जहां ये सूचकांक 133 अंक पर था, वहीं 2008 के पहली छमाही में यह 10 फीसदी घटकर 122 अंक पर आ गया है। हैरानी की बात है कि यह सर्वे अप्रैल में किया गया था जब आर्थिक हालात उतने बदतर नहीं थे जितने अब हो चुके हैं।

उस दौरान महंगाई की दर 7 फीसदी के आसपास थी जो भले ही बहुत राहत की बात न हो तो भी दहाई के आंकड़े को पार करने से तो बेहतर ही थी। इस सर्वे में शामिल 42 फीसदी भारतीयों ने कहा कि देश आर्थिक मंदी की गिरफ्त में आ चुका है। वहीं अगर चीन की बात की जाए तो 14 फीसदी चीनीयों का भी कुछ ऐसा ही मानना था कि उनका देश मंदी के दौर से गुजर रहा है।

इस सर्वे में शामिल आधे से अधिक भारतीयों ने कहा कि ऐसे सामान जिनकी जरूरत उन्हें अगले एक साल के दौरान पडेग़ी उसे खरीदने के लिए अभी का समय सबसे खराब है। पर ऐसे में जब कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं और उनका असर भारत पर भी देखने को मिल रहा है तो कहना गलत नहीं होगा कि इस समस्या की वजह कुछ हद तक अवधारणा प्रबंधन भी रही है।

भले ही लोगों को यह समय सामान खरीदने के लिहाज से अनुकूल नहीं लग रहा हो, फिर भी उस लिहाज से कम ही लोगों को लगता है कि यह समय उनके पर्सनल फाइनैंस को लेकर ठीक नहीं है। जहां 53 फीसदी भारतीयों को लगता है कि उन्हें फिलहाल खरीदारी करने से बचना चाहिए, वहीं महज 18 फीसदी ऐसे हैं जिन्हें ये लगता है कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके पर्सनल फाइनैंस पर कोई आंच आ सकती है।

First Published - June 25, 2008 | 10:34 PM IST

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