सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों द्वारा चुने जाने के बाद ऋषि सुनक ने ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड के प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया है। सुनक इस पद पर पहुंचने वाले पहले ब्रिटिश एशियाई हैं, इसलिए उनका सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना भारत के पूर्व औपनिवेशिक शासक देश के लिए एक अहम घटना है।
इससे पहले दो अन्य छोटे यूरोपीय देशों आयरलैंड और पुर्तगाल में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री बन चुके हैं और आयरलैंड में सत्ता को लेकर हुए समझौते के तहत लियो वराडकर एक बार फिर प्रधानमंत्री बन सकते हैं। हालांकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पद निस्संदेह वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक महत्त्व रखता है और दिखाता है कि भारतीय प्रवासियों ने जिन देशों में बसने का चयन किया वहां के मामलों में उन्होंने खुद को किस तरह ताकतवर ढंग से स्थापित किया।
हालांकि यह अपेक्षा कुछ ज्यादा ही हो जाएगी कि उनके प्रधानमंत्री बनने से भारत-ब्रिटेन के रिश्तों में भी सुधार आएगा। आप्रवासन जैसे विषयों पर सुनक के विचार अपनी पार्टी के कट्टर नेताओं से अलग नहीं हैं और पश्चिम के भारतीय मूल के सत्ताधारी नेताओं ने भारत से करीबी दिखाने में खास सावधानी बरती है। उन्हें लगता है कि करीबी दिखाने से उनकी वफादारी पर शक किया जाएगा।
भारतीय प्रवासियों की बात करें और भारत में रहने वाले कुछ भारतीयों का भी ध्यान रखें तो उन्हें इस बात से काफी राहत मिली होगी कि सुनक जैसे व्यक्ति का ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बन पाना संभव हुआ। इसमें दो राय नहीं कि भारत के साथ भी सुनक के मजबूत रिश्ते हैं। उनका विवाह इन्फोसिस के सह-संस्थापक की बेटी से हुआ है और यह मामला ब्रिटेन में राजनीतिक विवाद का विषय भी बना था क्योंकि उनकी पत्नी के कर दर्जे को लेकर तथा रूस में इन्फोसिस के कारोबार को लेकर कुछ सवाल उठाए गए थे। बहरहाल, इससे यह तो पता चलता ही है कि भारत के साथ उनके करीबी रिश्ते बरकरार हैं।
सुनक हिंदू धर्म का पालन करते हैं और महामारी के दौरान जब वह ब्रिटेन के वित्त मंत्री के रूप में 11 डाउनिंग स्ट्रीट में रहते थे तो दरवाजों पर दीये लगाते हुए उनकी तस्वीर सामने आई थी। संभव है बतौर प्रधानमंत्री भी वह ऐसा करें। इससे पता चलता है कि ब्रिटेन जो एक समय प्रवासियों को लेकर बिल्कुल भी मित्रवत नहीं था और जहां स्वयं सुनक की पार्टी ने कहा था कि वह बाहरियों के लिए प्रतिकूल माहौल तैयार करेगी, वहां अब सांस्कृतिक विविधता इस कदर बढ़ गई है।
कंजरवेटिव पार्टी के नेता एनॉक पॉवेल ने सन 1968 में अपने प्रसिद्ध भाषण ‘रिवर्स ऑफ ब्लड’ में अनुमान जताया था कि राष्ट्रमंडल देशों के प्रवासियों के ब्रिटेन में आने के कारण वहां कट्टरपंथी हिंसा, मानसिक आघात और विभाजन जैसी स्थितियां उत्पन्न होंगी। वास्तव में ऐसा नहीं हुआ और इसका श्रेय ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था को दिया जाना चाहिए।
ब्रिटेन में इस बात को रेखांकित किया गया कि सुनक काफी अमीर हैं, वह अतीत में बैंकर के रूप में काम कर चुके हैं और वह एक विशिष्ट पब्लिक स्कूल के पढ़े हुए हैं। वह नस्ली विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन आर्थिक या वर्गीय विविधता का नहीं। बहरहाल, इन बातों से वर्तमान क्षण की महत्ता कम नहीं होती।
यहां तक कि विपक्षी लेबर पार्टी के नेता वेस स्ट्रीटिंग ने भी ब्रिटिश टेलीविजन पर कहा कि उनके संसदीय क्षेत्र के बच्चे भी सुनक और उनके परिवार को 10 डाउनिंग स्ट्रीट स्थित प्रधानमंत्री आवास में प्रवेश करते देखकर इस देश के साथ अधिक जुड़ाव महसूस करेंगे। ब्रिटेन और वहां का प्रधानमंत्री आवास, विंस्टन चर्चिल के खुले नस्ली व्यवहार से बहुत दूर निकल आए हैं।