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नौटंकी और हल्केपन से लबरेज एक बैठक

Last Updated- December 07, 2022 | 8:41 AM IST

इस 22 जून को सऊदी अरब में जेद्दा ऊर्जा बैठक के दौरान नौटंकी और हल्केपन का जबरदस्त नजारा देखने को मिला।


हालांकि इस बैठक के दौरान लोगों के बीच फैले हुए भ्रम का मुजाहिरा मुझे देखने को मिला अगले दिन, जब हम पत्रकारों को खुराइस शहर ले जाया गया। वहां सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी, सऊदी अरामको ने अपनी नई उत्पादन इकाई खोली है।

हमें उस जगह पर इसलिए ले जाया गया था, ताकि वे हमें सऊदी अरब की तेल उत्पादन बढ़ाने की तैयारी दिखा सकें। अगले साल जून से खुराइस का यह तेल कुंआ हर दिन 12 लाख बैरल तेल का अतिरिक्त उत्पादन करेगा। जेद्दा से हमें खुराइस कंपनी के बोइंग 737 विमान में ले जाया गया। विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद ही प्लेन के रेडियो सिस्टम पर ‘तकबीर’ यानी अल्लाह-ओ-अकबर की आवाज सुनाई देनी लगी। तभी मेरी निगाह मेरे पास बैठे एएफपी के ब्रिटिश पत्रकार पर गई।

वह बेचैन हो रहा था और उसका चेहरा पीला पड़ गया था। घबराकर मैंने उससे पूछा कि क्या उसे एयरसिक बैग की जरूरत है? उसने न में सिर हिलाकर रेडियो की तरफ इशारा किया, जिससे ‘अल्लाह ओ अकबर’ की आवाज आ रही थी। उसने लगभग फुसफुसाते हुए पूछा, ‘क्या आपको लगता है, हम लोग महफूज हैं? यह आवाज, आपको याद है कि 9 सिंतबर, 2001 को अमेरिकी एयरलाइंस के साथ क्या हुआ था?’ जेद्दा ऊर्जा बैठक भी इस तरह के भ्रमों से भरी हुई थी।

जेद्दा के उस चार एकड़ के सजे-धजे हाल में बैठकर मैं उन विसंगतियों से सीधे-सीधे परिचित हुआ, जिन्होंने तेल जगत को घेर रखा है। यह बात तो शुरू में ही साफ हो गई कि बैठक तेल की कीमतों पर चर्चा के लिए नहीं, बल्कि सऊदी अरब के बारे में बात करने के लिए हो रही है। बैठक की शुरुआत में ही जब सऊदी अरब के शासक अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज अल सऊद (जिनके नाम के आगे बड़ी इज्जत के साथ ‘दो पवित्र मस्जिदों के संरक्षक’ का खिताब लगाया जाता है) आए, तो उनके साथ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन और चीन के उप राष्ट्रपति झी जिंपिंग थे।

ये दोनों सऊदी अरब के राजा के साथ बैठे हुए थे, जबकि दूसरे मुल्कों के मंत्री अपने प्रतिनिधि मंडलों के साथ, सऊदी अरब के तेल मंत्री अली अल नियामी के साथ कमरे के चारों तरफ फैले मेजों की ‘शोभा’ बढ़ा रहे थे।  अपने लंबे-चौड़े भाषण में चीन के उप राष्ट्रपति ने वही कहा, जिस काम में चीनी बड़े माहिर हैं। उन्होंने अपने भाषण में हालत की समझने या जानने से पहले न तो कुछ कहा और न ही किसी भी तरह का वादा किया। तीन घंटों तक दूसरे मुल्कों के मंत्रियों का भाषण सुनने के बाद भी झी ने केवल इतना कहा कि कच्चे तेल का वायदा कारोबार करने वाले कारोबारी अच्छी तरह से जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं।

यहां कच्चे तेल के खरीदारों और उत्पादकों के बीच पैदा हुई खाई को खत्म करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया। कच्चे तेल के खरीदारों की मांग है कि उत्पादकों को उत्पादन बढ़ाना चाहिए। वहीं, उत्पादकों का कहना है कि उत्पादन तो पूरा है, लेकिन सटोरियों की वजह से कीमत में इजाफा हो रहा है। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री सैमुअल बॉडमैन ने खरीदारों का पक्ष रखते हुए कहा कि, ‘दुनिया में कच्चे तेल का इस्तेमाल औसतन 1.8 फीसदी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा है। मगर पिछले तीन सालों में दुनिया भर में तेल का उत्पादन करीब 8.5 करोड़ बैरल प्रति दिन के स्तर पर स्थिर है।

अगर आपूर्ति में इजाफा नहीं होगा, तो मांग में आए एक फीसदी के इजाफे से भी बाजार को स्थिर करने के लिए कीमतों में 20 फीसदी तक इजाफा करना पड़ेगा।’ दूसरी तरफ, बहस को तेज करने के लिए ईरान जैसे मुल्क भी मौजूद थे। उसने कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग का जिम्मेदार सीधे-सीधे अमेरिका को ठहराया। ईरान के तेल मंत्री ने कहा कि उत्पादन कम होने की एक वजह कच्चे तेल के बड़े उत्पादक देशों पर लगाए गए प्रतिबंध भी हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि,’जब कच्चे तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल आ गई थी, तब तो खरीदार मुद्दे को बाजार पर छोड़ देना चाहते थे। तो अब क्यों वे बाजार को नियंत्रित करने की मांग कर रहे हैं?’ वैसे मंत्रियों की बयानबाजी के अलावा, पत्रकारों के बीच गार्डन ब्राउन की मौजूदगी को लेकर चर्चाओं का बाजार भी गर्म था। बात यह चल रही थी कि वे यहां सऊदी अरब के शाही खानदान को बहुचर्चित अल यमयाह घोटाले की फिर से शुरू हुई जांच के मामले में आश्वासन देने आए थे।

यह घोटाला सऊदी अरब और ब्रिटिश एरोस्पेस व बीएई सिस्टम्स के बीच अरबों डॉलर के उस समझौते से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत इन ब्रिटिश कंपनियों को सऊदी अरब को लड़ाकू हवाई जहाज और मिसाइलें मुहैया करानी हैं। इसे ब्रिटेन का अब तक का सबसे बड़ा सौदा करार दिया गया था। इस समझौते के तहत सऊदी अरब ने हथियारों के लिए 40 अरब डॉलर और उनकी फिनिशिंग पर अलग से 48 अरब डॉलर देने का फैसला किया था। हालांकि, सऊदी अरब के शाही खानदान के सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने इस सौदे के बदले में ब्रिटिश कंपनियों से छह करोड़ डॉलर की दलाली ली थी।

यह सौदा उस वक्त खतरे में पड़ गया, जब ब्रिटेन की जांच एजेंसियों ने इसकी जांच शुरू कर दी। लेकिन 2006 में जब सऊदी सरकार ने 72 यूरोफाइटर जहाजों के ऑर्डर को रद्द करने की धमकी दी तो ब्रिटेन के अटार्नी जनरल लॉर्ड गोल्डस्मिथ ने जांच बंद करने की घोषणा कर दी। इससे एक बात तो खुले तौर पर साफ हो गई कि कानून के लंबे हाथ भी पैसे और पहुंच के आगे छोटे पड़ जाते हैं। ब्रिटिश संसद को इस बारे में बताया गया कि,’देश को होने वाले फायदे को देखते हुए कानून को समझौता करना पड़ता है।’

हालांकि, ब्रिटेन की अदालतों ने इस मामले को पिछले साल नवंबर में जब फिर से खोल दिया, तो सऊदी त्योरियां दोबारा चढ़ गईं। हालांकि, गॉर्डन ब्राउन ने इस मामले का भी हल ढूंढ निकाला है। इस मामले की जांच कर रही जांच एजेंसी के नए प्रमुख रिचर्ड एल्डरमैन ने एक प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत दलाली देने वाली कंपनियां अपने जुर्म को मानकर बस जुर्माना भर कर आजाद हो सकती हैं। इसी वजह से तो जेद्दा बैठक में ब्राउन को इतनी तवज्जो दी गई।

अगर लोगों की तादाद किसी बैठक की कामयाबी की पहचान होती है, तो जेद्दा में हुई बैठक बड़ी सफलता थी। वहां 36 देशों के तेल मंत्री आए थे। ओपेक और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी जैसे सात अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इसमें शिरकत की थी और बड़ी-बड़ी ऊर्जा कंपनियों के प्रतिनिधि वहां मौजूद थे। लेकिन अगर नतीजों की तरफ देखें तो जेद्दा बैठक सुपरफ्लॉप हुई थी क्योंकि इसके बाद भी तेल कीमतों में उछाल बदस्तूर जारी है।

First Published - June 30, 2008 | 10:21 PM IST

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