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धर्मनिरपेक्ष कम्युनिस्ट की डायरी का एक पन्ना

Last Updated- December 07, 2022 | 12:44 PM IST

पिछले कुछ हफ्तों से जो राजनीतिक उठा-पटक मची हुई है, उस वजह से मैं अपनी डायरी नहीं लिख पाया। अब अखबारों और खबरिया चैनलों को इंटरव्यू देने से जो वक्त बचता, वह तो पार्टी की बैठकों में ही जाया हो जाता।


ऐसे में डायरी लिखने का वक्त कहां से निकालता। लेकिन अब जब विश्वास मत पर संसद का विशेष सत्र शुरू हुआ है, तो थोड़ी फुर्सत मिली है। मैं अपने-आप को लिखने से इसलिए भी नहीं रोक पाया क्योंकि हमें सांप्रदायिक भाजपा के साथ मिलकर जो वोट देना है। अब मुझे सुख से बीते पिछले चार साल बहुत याद आ रहे हैं। हमारे लिए उन चार सालों से बेहतर वक्त कभी नहीं आया था।

हमारे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी और हम खुले तौर सरकार की आलोचना कर सकते थे। इसके साथ ही, सरकारी नीतियां भी हमारी सहमति के बिना पास नहीं हो सकती थीं। मुझे तो हैरत होती है कि क्या हम दोबारा ऐसी हालत में आ पाएंगे।

हैरत तो मुझे तेजी से बदलते घटनाक्रम पर भी हो रही है। मुझे कभी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि मुलायम तेवर वाले उस सरदार में परमाणु करार के मुद्दे पर इतना जबरदस्त स्टैंड लेने की ताकत होगी और ‘सुप्रीम लीडर’ पूरे तरह से साथ देंगी। वह भी ऐसी हालत में जब हमने सुप्रीम लीडर के खिलाफ एक शब्द तक कभी नहीं कहा। खुले तौर पर तो हम यही कहते आए हैं कि हम राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर ही परमाणु करार का विरोध कर रहे हैं, लेकिन इस इनकार के पीछे असल वजह कुछ और ही है।

पहली बात तो यह कि हम ‘महाशैतान’ के साथ हुए किसी भी समझौते को तो अपनी सहमति दे ही नहीं सकते न। खास तौर पर तब तो बिल्कुल ही नहीं, जब उसका मुखिया जॉर्ज बुश हो। हम अभी तक भूले नहीं हैं वह दौर, जब अमेरिकियों ने इस्लामिक आतंकवादियों को पैसों और हथियारों से लैस कर अफगानिस्तान में सोवियत संघ को बेइज्जत किया था। तब सोवियत फौज, अफगानिस्तान में उस पर आश्रित एक सरकार को ताकतवर बनाने का काम कर रही थी। यह अमेरिकियों के लिए वियतनाम की हार का बदला था, लेकिन इसमें एक अंतर है।

अमेरिका ने तो वियतनाम में मिली पराजय को झेल लिया, लेकिन सोवियत संघ इस कलंक को सह नहीं पाया। इसके अलावा हमारे सामने कई घरेलू राजनीति से जुड़ी हुई दिक्कतें भी तो हैं, जिनका वास्ता मुस्लिमों की भावनाओं को ‘ध्यान’ रखने से है। बदकिस्मती से कॉमरेड पंधे ने इस मुद्दे पर हमारा साथ देने से साफ इनकार कर दिया और यह बात जगजाहिर हो गई। लेकिन हकीकत तो यही है कि अगर हमें अगले विधानसभा चुनावों को जीतना है तो कम से कम बंगाल और केरल में हमें उनकी जरूरत पड़ेगी ही पड़ेगी।

बंगाल के पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव के नतीजे और केरल में पार्टी में मची हुई अंदरुनी उठा-पटक ने तो हमारी नींद हराम कर रखी है। हमारे आलोचकों को मुस्लिमों और इस्लामिक मुल्कों के प्रति हमारा लगाव बड़ा अजीब लगता है। आखिर एक वक्त में हमने लोगों के लिए धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। ऊपर से मुस्लिम भी तो मूर्ति पूजने वाले काफिरों से ज्यादा नफरत नास्तिक कम्युनिस्टों से किया करते हैं। वे तो ईसाइयों और यहूदियों से ज्यादा नफरत हमसे करते हैं।

उन्होंने अफगानिस्तान में भी तो ‘महाशैतान’ का साथ दिया था। इस सबके बावजूद हमारे दिल में उनके लिए लगाव की असल वजह है, हम दोनों में कई तरह की समानताओं का होना। उन्हें विश्वास और जीने का तरीका आठवीं सदी में बनाए गए सिध्दांतों से मिलता है, जबकि हमें 19वीं सदी के सिध्दांतों से। वे भी हमारी ही तरह पूरे मुल्क पर एक ही पार्टी या धर्म की स्थापना पर यकीन रखते हैं। आज उनके दिल में भी हमारी ही तरह अमेरिका के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरी हुई है।

उनकी तरह हम भी दुनिया भर में अपनी ही तरह के लोगों की सहूलियतों का ध्यान रखते हैं। साथ ही, उनके बीच भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो हिंसा के रास्ते से हर मुश्किल का हल ढूंढना चाहते हैं। उनके मुल्ला भी आग उगलते हैं और हमारे नेता भी इस मामले किसी से कम नहीं हैं। वैसे, कॉमरेड करात इस बीच थोड़े बुझे-बुझे से नजर आ रहे थे। शायद विदेशों में बीती उनकी छुट्टी का असर था। लेकिन राहत की बात यह है कि वह फिर से फायरिंग मोड में नजर आ रहे हैं। हम साफ तौर पर संप्रादायिक भाजपा के बजाय ‘धर्मनिरपेक्ष’ आईयूएमएल के साथ जाना ज्यादा पसंद करेंगे।

हम पाकिस्तान के रास्ते ईरान से मिलने वाली गैस को अमेरिकी परमाणु करार से ज्यादा बेहतर समझते हैं। भले ही गोर्बाच्योव और डेंग ने हमारी पीठ में छुरा घोंप दिया हो, लेकिन हमें अब भी भरोसा है कि कम्युनिज्म का परचम एक दिन पूरी दुनिया में लहराएगा। एक दिन उस लालफीताशाही की जीत जरूर होगी, जो लोगों के दिमाग में नई सोच के ‘कीड़े’ को पनपने का मौका ही नहीं देगा। लेकिन इसके लिए हमें जरूरत है अपने मुल्क को लगातार गरीब बनाए रखने की। इसके लिए हमने काफी कोशिश भी है और इसमें हमें काफी कामयाबी भी मिली है।

हम अगर सुधारों की गाड़ी को रोक नहीं पाए तो कम से कम उसकी रफ्तार जरूर कम कर दी। हमने सब्सिडी के पहले से ही भारी पिटारे को और वजनदार बनाया, ताकि हमारा आर्थिक ढांचा चरमरा कर गिर जाए। इससे ‘क्रांति’ का दिन और भी करीब आ जाएगा। हम नहीं चाहते कि गरीबों का भला हो। अगर उनका भला हो गया, तो हमारी क्रांति कौन करेगा?  लोगों में कम और कारोबारियों के बीच ज्यादा मशहूर एक ‘सोशलिस्ट राजनेता’ की मदद से हो सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार विश्वास मत हासिल भी कर लेगी।

वैसे यह ‘नेताजी’ राजनीति की दुनिया के अलावा, अर्थ और पेज 3 वाले सेलिब्रिटी की दुनिया में भी काफी मशहूर हैं। मौके पर चौका मारने में तो उनकी कोई सानी ही नहीं है। ऐसी बात है तो कॉमरेड करात भी उनसे ज्यादा अलग नहीं हैं, जो आजकल बीएसपी की एक नेता को शीशे में उतारने में लगे हुए हैं। उन नेता साहिबा के प्रति तो उनके प्रशंसकों की श्रध्दा के बारे में कहना ही क्या? उन्होंने अपनी नेता को इतने ‘उपहार’ दिए कि आज उनके पास संपत्ति का अंबार लग गया है। उनकी जाति पर आधारित राजनीति का अभी कल तक विरोध करते आए थे, लेकिन वक्त हमेशा एक सा तो नहीं रहता है न।

वैसे, हमने भी तो जाति की राजनीति का दामन उसी समय थाम लिया था, जब हमने अर्जुन सिंह की आरक्षण की राजनीति का साथ दिया था। वैसे, कुछ कमजोर लम्हों में मैं भी यह सोचता हूं कि आरक्षण के लिए आर्थिक आधार का सहारा लेना चाहिए था, नाकि किसी धर्म या जाति के आधार का। कभी-कभी तो मुझे हैरानी होती है कि क्या हमारे लिए वक्त भी रुक गया है? पहले वामपंथियों का शुमार कॉलेजों के सबसे होनहार छात्रों में होता था, लेकिन आज तो सचिन तेंदुलकर, नारायण मूर्ति और शाहरूख खान जैसे लोग युवाओं के रोल मॉडल बन चुके हैं। उनके लिए आज देंग, ईएमएस और ज्योति बसु तो छोड़िए, स्तालिन, माओ और फिदेल जैसे महान नेता भी इतिहास की किताब में छपे कुछ नाम भर रह गए हैं।

First Published - July 22, 2008 | 10:03 PM IST

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