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काले बादलों के पीछे छिपी है उम्मीद की किरण

Last Updated- December 07, 2022 | 8:45 AM IST

मानसून की बौछारों ने भले ही अब तक सुहानी बूंदों से ही रूबरू कराया है, लेकिन अपने साथ वह बुरी खबरें भी लेकर आई है।


ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस शुक्रवार को जब महंगाई के आंकड़ों का साप्ताहिक पिटारा खुलेगा तो यह 12 फीसदी की दर को पार करने को बेकरार होगी। स्थिति कितनी बदहाल हो रही है इसे जानने के लिए इतना ही काफी है कि पिछले 15 सालों में मुद्रास्फीति की दर इससे ऊपर नहीं गई है।

रही सही कसर ब्याज दरों ने पूरी कर दी है जो पिछले छह महीनों के दौरान लगातार बढ़ती ही जा रही हैं। इसके फलस्वरूप कारोबारियों की कमाई का ग्राफ नीचे गिरता जा रहा है। देश के शेयर बाजार भी खस्ताहाल है और दोनों प्रमुख सूचकांक पिछले 15 महीने के न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। यहां तक माना जा रहा है कि कुछ ही दिनों में सेंसेक्स की सुई 2005 के बाद की सबसे बुरी स्थिति में पहुंच जाएगी। जो शेयर बाजार उछाल के झूले पर सवार होकर आसमान छूती पींगें ले रहा था, वह अब तक निवेशकों की गाढ़ी कमाई का 900 अरब डॉलर निगल चुका है।

करीब तीन महीने पहले रुपये के लगातार मजबूत होने से निर्यातक बुरी तरह परेशान थे और अब डॉलर के बढ़ने और रुपये की कमजोरी से आयात करने वाले चिंता में घुले जा रहे हैं। लेकिन हमारी सरकार को तो अब भी भरोसा है कि चालू वित्त वर्ष में ही देश आठ फीसद की आर्थिक विकास दर हासिल करने में कामयाब हो जाएगा। हालांकि मुझे लगता है कि वित्त वर्ष 2008 में अगर विकास दर सात फीसद के स्तर तक भी पहुंच जाती है, तो ज्यादातर लोग खुशी-खुशी इसे कामयाबी मानेंगे। इतना ही नहीं, उसके अगले वित्त वर्ष में तो विकास की दर अगर 6 फीसद भी रह जाती है, तो हम सभी राहत की सांस लेंगे।

रैनबैक्सी को कुछ दिनों पहले तक दुनिया भर के दवा बाजार में भारतीय परचम फहराने वाली कंपनी माना जाता था और मीडिया भी उसकी वीरगाथा को काफी बढ़ा चढ़ाकर सुनाता था, लेकिन आखिर में उसने भी खुद को एक विदेशी कंपनी के सुपुर्द कर दिया और सारी कहानी खत्म हो गई। यह भी हो सकता है कि इस हफ्ते के खत्म होते-होते यूएपीए सरकार के लिए हालात इतने बदतर हो जाएं कि देश को एक बार फिर बेमौसम चुनावी बरसात झेलनी पड़े।

क्या इन हालात को देखकर यह कहना उचित होगा कि पिछले पांच सालों में या फिर यूं कहें कि पिछले 15 सालों के दौरान देश में कई लोगों ने आर्थिक खुशहाली को लेकर जो सपने संजोए थे, उन पर अब जाकर पानी फिर गया है। क्या इन गहराते काले संकट के बादलों के पीछे से रोशनी की कोई भी किरण देखने को मिल रही है? मुझे लगता है कि जिन खबरों को अभी हम देश के लिए चोट पहुंचाने वाली करार दे रहे हैं, वे सभी बुरी खबरें असल में अच्छी हैं और धीरे-धीरे बाकी लोगों को भी यह अहसास हो जाएगा कि इन खबरों में खुशी छिपी है।

अगर यूपीए सरकार से कुछ सहयोगी पार्टियां समर्थन वापस ले लेती हैं और उसे सत्ता से बेदखल होना पड़ता है तो शायद यह उसके लिए बहुत सस्ते में बरी हो जाने वाली स्थिति होगी। कहना गलत नहीं होगा कि कमजोर नेतृत्व और बेसुध सी कैबिनेट का अंत शायद उतना भयावह नहीं होगा जितना हो सकता था। अगर हम यूपीए सरकार के पिछले चार साल से कुछ अधिक के कार्यकाल पर नजर डालें तो पाएंगे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, कानून व्यवस्था समेत ऐसे कई मोर्चे हैं जिन पर सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है।

भले ही देशवासियों को एक बार फिर से चुनाव का बोझ झेलना पड़ेगा पर कम से कम वे यह उम्मीद तो कर सकते हैं कि इस बार कोई ऐसी सरकार चुनी जाएगी, जो अपने बलबूते फैसला लेने में सक्षम होगी। अब अगर जीडीपी की बात करें तो विकास दर धीमी होने से रफ्तार पकड़ती महंगाई कुछ मंद तो होगी। विकास दर धीमी होने से सरकार के साथ कंपनियां भी कुछ ऐसे तरीके ईजाद करेंगी, जिससे लागत कम हो जाए और अधिक से अधिक परिणाम हासिल किया जा सके। मैं जो कुछ कह रहा हूं, उसे महज उम्मीद या संभावना मत मानिए। 

1990 के दशक के शुरुआती सालों में और उसके बाद 2001 में जो मंदी आई थी, उसमें हम ऐसा कर दिखाने में कामयाब रहे थे। मुझे ऐसी कोई वजह नजर नहीं आती कि इस मंदी से सरकार या निजी क्षेत्र फायदा उठाने वाले कदम क्यों नहीं उठा सकता। मुमकिन है कि विपरीत हालात के बीच निजी क्षेत्र भी कुछ कड़े कदम उठाए जिससे आखिरकार हमें फायदा देखने को मिले। पिछले कुछ सालों में ऐसा कई बार देखने को मिला है कि कारोबार में कुछ असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। यहां यह महत्वपूर्ण होता है कि आखिर आप किस तरीके से अपने कारोबार में तालमेल बैठाते हैं।

यह तालमेल अधिकारियों की तनख्वाह, अचल संपत्ति की कीमतों , कुल लागत और यात्रा खर्च के बीच होनी चाहिए। मुझे यह भी मालूम है कि आज जिस तेजी से रियल्टी और होटल सेक्टर के शेयर औंधे मुंह गिर रहे हैं, उससे निवेशकों में हड़कंप मचा होना तय है। मेरे कई ऐसे सहकर्मी होंगे जो अपने वेतन में बढ़ोतरी यानी इन्क्रीमेंट के ग्राफ को लेकर चिंता में होंगे। तो क्या यह संभव नहीं है कि अब वे और जी जान से  अपने काम में जुट जाएं ताकि इन्क्रीमेंट न मिलने से उन्हें जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कम से कम वे बोनस के जरिए तो कर ही सकते हैं।

तो क्या हमें यह नहीं लगता कि इन्क्रीमेंट से जहां सिर्फ कर्मचारियों का ही फायदा होता वहां अब पूरी कंपनी का फायदा होने की गुंजाइश बनती है। अब हम आखिर में रैनबैक्सी के सौदे की बात करेंगे।रैनबैक्सी ने जो कदम उठाया, वह दूसरे भारतीय कारोबारियों के लिए एक अच्छा उदाहरण बन सकते हैं। लड़खड़ा कर चलने से बेहतर है कि  सहारा लेकर अच्छा प्रदर्शन किया जाए। पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल शायद अब भी बाकी है और वह यह कि मंदी का दौर आखिर कब तक जारी रहेगा। शायद इसका सटीक जवाब किसी के पास न हो। पर इतना तो है ही कि जब तक भारत और अमेरिका में नई सरकारें नहीं आती हैं, तब तक हालात में कुछ खास सुधार की उम्मीद नहीं है।

First Published - July 2, 2008 | 10:09 PM IST

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