गरीबों को सुनहरे कल का छलावा देकर उनकी मेहनत की कमाई लूटने का काम कोई ऐसा वैसा राजनेता नहीं कर सकता। इसके लिए जरूरत होती है एक बेहद शातिर दिमाग की।
केंद्र सरकार ने भी पिछले पखवाड़े में कुछ ऐसा ही करके अपने दिमाग का लोहा मनवा लिया। दरअसल, उसके एक फैसले के बाद अब कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत वे औद्योगिक इकाइयां भी आ गई हैं, जिनमें 10 या इससे ज्यादा लोग काम करते हैं।
पहले इसके तहत केवल वे इकाइयां भी आती थीं, जिनमें 20 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे। इस कदम के बाद से ईपीएफओ के तहत आने वाले लोगों की तादाद बढ़कर दो गुना हो जाएगी। इस कदम के बाद ईपीएफओ के तहत आने वाले इन लोगों को रिटायरमेंट के समय मोटी रकम तो मिलेगी ही, साथ ही उन्हें जीवन भर मासिक पेंशन भी मिलेगी। यह पेंशन उनके आखिरी वेतन की आधी रकम के बराबर या फिर 6500 रुपये (दोनों में से जो भी कम हो) की होती है। इस तरीके से देखें तो यह योजना वाकई काफी अच्छी है। तो फिर दिक्कत कहां हैं?
दिक्कत बस एक ही है, जिसे नजरअंदाज करना काफी मुश्किल है। असल में, ईपीएफओ की हालत काफी बुरी है। यहां आज भी सदियों पुराने सिंगल इंट्री बुक कीपिंग सिस्टम पर काम हो रहा है, जिसकी वजह से किसी भी घपले का पता लगाना नामुमकिन है। साथ ही, इसकी पेंशन स्कीम यह ध्यान में रखकर बनाई गई है कि ईपीएफओ अपनी जमा पूंजी हर साल कम से कम 11.5 फीसदी का रिटर्न कमाएगी। हालांकि, आज की तारीख में यह केवल आठ फीसदी का ब्याज कमा रही है। इस वजह से साल दर साल ईपीएफओ का घाटा बढ़ता जा रहा है।
आज की तारीख में इसका घाटा 25 हजार करोड़ रुपये का है, जिसे किसी भी सूरत में कम नहीं कहा जा सकता। दूसरे शब्दों में, ऐसे वक्त में जब भविष्यनिधि संगठन अपनी बुरी गत पर खून के आंसू रो रहा है, इसके दायरे को बढ़ाना इसकी मौत को बुलावा देने के बराबर होगा। आम लोगों के नजरिये से देखें तो इस घाटे को लेकर किसी बात का डर नहीं है, क्योंकि इस संस्था के घाटे की पूर्ति तो सरकार कर ही देगी। हालांकि, यह बात भी साफ नहीं है कि सरकार इस घपले-घोटालों से होने वाले घाटे की पूर्ति कैसे कर पाएगी? वह भी ऐसे हाल में जब उस चोरी के बारे में पता भी नहीं चलता है।
ईपीएफओ में हर साल अपनी कमाई का 24 फीसदी हिस्सा (आखिरकार, नियोक्ता का 12 फीसदी का हिस्सा भी तो आपकी ही सैलरी पैकेज का हिस्सा होती है) देने वाले खाताधारकों के नजर से देखें तो सबसे अहम बात इस संस्था की सदियों पुरानी कार्यशैली है। यह संगठन अपने खातेदारों को एक खास अकाउंट नंबर तक नहीं मुहैया करा पाई है। इसका मतलब है कि आपने एक के बाद एक कई नौकरियां बदली हैं, तो आपका पैसा एक अकाउंट में कभी जमा नहीं हो पाएगा। यही वजह है कि ज्यादातर लोगों के कम से कम दो या तीन ईपीएफ अकाउंट हैं।
अगर इसमें कंस्ट्रकशन, बीड़ी और दुकानों जैसी इकाइयों को भी शामिल कर लिया जाएगा, तो दिक्कत और भी बढ़ जाएगी। वजह यह है कि छोटी इकाइयों में लोग-बाग तेजी से नौकरियां बदलते हैं। ऊपर से, पेंशन स्कीम का फायदा उठाने के लिए आपको एक जगह पर कम से कम 10 सालों तक टिक कर काम करना पड़ता है। साथ ही, एक अकाउंट होने की वजह से उन लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ेगा, जिन्हें जबरदस्ती ईपीएफओ में पैसे डालने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
उन्हें कर्मचारी पेंशन स्कीम (ईपीएस) में जमा किए गए वेतन का 8.33 फीसदी हिस्सा (बाकी का 15.76 फीसदी हिस्सा तो प्रोविडेंट फंड में जाता है) मिल तो जाता है, लेकिन उसमें अच्छी-खासी कटौती कर दी जाती है। न तो सरकार और न ही कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन में कोई यह जानने की इच्छा रखता है कि कितने लोग इस संस्था में पैसा लगाने के लिए तैयार हैं। इसके साथ ही, कोई इस बात पर भी नजर डालने को तैयार नहीं है कि वे इसके लिए पैसे कहां से लेकर आएंगे? यह वाकई काफी अजीब बात है।
इन्वेस्ट इंडिया फाउंडेशन के आईआईएमएस डाटावर्क्स सर्वे के आंकड़ों की मानें तो मुल्क में 10-20 कर्मचारी वाली इकाइयों में काम करने वाले लोगों में से करीब एक चौथाई कामगारों की सालाना कमाई 50 हजार रुपये से भी कम है। उनकी औसत बचत भी केवल नौ फीसदी है। उन्हें अपनी सालाना आय का 24 फीसदी हिस्सा देने के लिए कहना, उनपर जुल्म करने के बराबर होगा। ऊपर से इस पूरे समूह की कुल बचत भी उस स्तर के करीब आधी ही है, जिसकी जरूरत ईपीएफओ सिस्टम को पड़ती है। इसलिए यह राह दोनों पक्षों के लिए कांटों से भरी ही होगी।
एक और मजे की बात यह है कि इस आय वर्ग के एक तिहाई लोग-बाग गांवों में अपना गुजर बसर करते हैं। इसलिए ईपीएफओ के लिए इन्हें अपने दायरे में लाना कोई आसान काम नहीं होगा। समाज में हाशिये पर अपना जीवन गुजारने वाले लोगों के लिए पेंशन स्कीम लाना एक बड़ा और स्वागत योग्य कदम है। लेकिन इसमें उन्हीं लोगों को शामिल करना चाहिए, जो इसके दायरे में आना चाहते हैं।
मतलब, जो लोग पैसे बचाने की अपनी हैसियत को देखकर इस दायरे में आना चाहते हैं, उन्हें ही आने देना चाहिए। जबरदस्ती सबको शामिल करके किसी का भला नहीं हो सकता है। साथ ही, इसके लिए एक ऐसे मजबूत संगठन की जरूरत है, जिसमें घपलों और घोटालों के लिए जगह नहीं हो। लेकिन चुनावों की दहलीज पर खड़े और वोट के भूखे नेता इस बात को समझ पाएंगे, इस बात की आस करना मुश्किल ही नामुमकिन भी है।