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नेपाल में प्रचंड चुनावी नतीजों के बाद

Last Updated- December 06, 2022 | 9:00 PM IST

नेपाल के चुनावी नतीजों से बहुत लोग जूझ रहे हैं। माओवादियों की जीत अप्रत्याशित भी है और अद्भुत भी।


भारत के पसोपेश का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने पटना में एक बैठक आयोजित करने की योजना बनाई थी। इस बैठक में उन सभी नेपाली नेताओं को शिरकत करनी थी, जिन्हें भारत विजयी उम्मीदवार के रूप में देख रहा था।


इनमें कुछ माओवादी भी थे, लेकिन ज्यादा नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माले)के सदस्य थे। जब नतीजे आए तो बैठक स्थगित हो गई और आनन-फानन में भारत सरकार ने नए निमंत्रण पत्र तैयार किए। दरअसल, भारत सरकार को भी यह अंदाजा नहीं था कि माओवादी इस कदर नेपाल पर छा जाएंगे। 66 जगहों पर दोबारा चुनाव हुए हैं और 10 मई तक पूरे नतीजे आ जाएंगे। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि माओवादी सबसे बड़े दल के रूप में उभरेंगे।


यह कैसे हुआ, इसकी कई वजहें हैं। जो लोग हारे हैं, वे यह कहानी ज्यादा अच्छी तरह सुना सकते हैं। नेपाली कांग्रेस और देश के सबसे जाने-माने नेता 85 वर्षीय गिरिजा प्रसाद कोइराला का पूरा परिवार चुनाव हार चुका है- बेटी, भांजा, भतीजा, सब।


माओवादियों का नारा :’अए लाई हेरियो पटक-पटक, माओवादी लाई हेरो एक पटक'(सबको देखा बार-बार, माओवादी को देखो एक बार) शायद रंग लाया। माले के शीर्ष नेता माधव नेपाल तो 2 सीटों पर लड़े और दोनों पर हार गए। यदि माले माओवादियों से चुनावी समझौता कर लेता तो ऐसा नहीं होता ।


बहरहाल, चुनाव परिणाम कुछ ऐसा है कि सभी की बोलती बंद हो गई है। अमेरिका अब एक कदम पीछे हटकर अपने विकल्प गिन रहा है। अमेरिका में माओवादियों को आतंकवादी करार दिया गया है और विधिनुसार उनके साथ हुक्का पानी वर्जित है। चीन, जिसने माओवादियों को ‘आवारागर्द कुकर्मियों’ का दर्जा दिया था और पूरे जनांदोलन में नेपाल के राजा का साथ दिया था, अब हतप्रभ है।


भारत ने यह कहा था कि नेपाल नरेश को कुर्सी त्याग देनी चाहिए। लिहाजा अब सरकार जाहिर करना चाहती है कि प्रकारांतर से भारत का सर्मथन माओवादियों के साथ था। लेकिन वे दूध पीते बच्चे नहीं हैं।सवाल यह है कि सत्ता से बाहर रहकर सरकार और व्यवस्था को बुरा-भला कहना एक बात है। लेकिन सरकार जब अपनी हो तब क्या करना चाहिए?


दोनों तरफ पुरानी मानसिकताएं घर कर गई हैं और इनसे उबरना आसान नहीं है। भारत का यह मानना है कि अब हमारी वह छवि नहीं रही, जो नेपाल के जनमानस में पहले थी। लेकिन वहां परिस्थितियां बदल गई हैं। लिहाजा संबंध बदलना स्वाभाविक है। चीन के पास अब पासपोर्ट है, ल्हासा (तिब्बत) और काठमांडू के बीच रेल लाइन बिछाने का। चीन में बने सस्ते सामान की भरमार पहले भी थी, अब खुली सीमा से यह सामान भारत में और आसानी से आ पाएगा।


भारत के सामने दो विकल्प होंगे – ऐसा होने दे या बिलबिला कर सीमा पर रोक लगा दे। उसके बाद भारत में आने के लिए वीजा लेना भी कल्पनातीत है, लेकिन ऐसा हो भी सकता है। आज नहीं तो 5 या 10 साल बाद। कई बातों पर नेपाल के माओवादियों की मंशा साफ है। वे चाहते हैं कि उनका देश स्वाभिमान से विश्व में सिर उठाकर बोल पाए।


ऐसा करने से उन्हें आज 1950 की मैत्री संधि रोक नहीं रही है, जो नेपाल नरेश के युग की है। इसके चलते, नेपाल की विदेश नीति और हथियार आदि के मामलों में भारत का संदर्शन उस देश को स्वीकार था। लेकिन वह जमाना दूसरा था। अब शायद नेपाल का यह गवारा न हो। सबसे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा है दोनों देशों के सैन्य संबंध।


नेपाल के सेनाध्यक्ष को भारतीय सेना में मानद दलपति की उपाधि दी जाती है और भारतीय सेनाध्यक्ष को नेपाल सेना में यही पदवी दी जाती है। हर वर्ष हजारों नेपालियों की भर्ती भारतीय सेना में की जाती है। पर्यटन से ज्यादा भारत और अन्य देशों से भेजा गया विप्रेषित धन, नेपाल के सकल घरेलू उत्पाद का सबसे बड़ा हिस्सा है।


यदि नेपाल चाहता है कि उसकी प्रभुसत्ता पर इन सब बातों से आंच आ रही है, तो नेपाल सरकार इस व्यवस्था को बदल सकती है। लेकिन इसके  परिणाम भुगतने के लिए तैयारी भी कर लेनी चाहिए।इस समय पूरे विश्व की सद्भावना नेपाल के साथ है। लेकिन अब ठंडे दिमाग से उस देश को सोचना पड़ेगा कि आगे क्या करना है। यदि माओवादी अपनी जिद पर कायम रहे कि उनके 19,000 सहयोगियों को नेपाल सेना में भर्ती किया जाए तो एक नई आग भड़क सकती है। 


नेपाल के सेनाध्यक्ष एकमंगत कटवाल यह कह चुके हैं कि उन्हें एक चुनी सरकार से आदेश लेने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी। लेकिन एक ‘वाद-विशेष’ से प्रेरित लोगों को सेना में भर्ती करना गलती होगी। जिन माओवादियों ने हथियार नहीं डाले हैं, वे क्या करेंगे और किसके नियंत्रण में रहेंगे, यह भी एक सवाल है।


माओवादियों ने यह साफ कर दिया है कि वे बाजार व्यवस्था के खिलाफ नहीं हैं और चाहेंगे कि उद्योग नेपाल में निवेश करें। भारत की एक बड़ी कंपनी ने जनवरी में यहां 40 करोड़ रुपये की लागत से फैक्ट्री लगाई है। लेकिन यदि बंद और सीनाजोरी नहीं रुकी तो देश से निकलने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं रहेगा।


भारत और नेपाल के बीच महाकाली संधि अभी तक कार्यान्वित नहीं हुई है। इससे दोनों देशों को लाभ मिल सकता है। भारत को इससे ऊर्जा मिलेगी, जिसकी उसे सख्त जरूरत है और नेपाल पानी से बनने वाली बिजली बेचकर देश का विकास कर सकता है। दोनों देशों में संधि को लेकर संदेह है, लेकिन आशा है कि नई सरकार इन संदेहों को दूर करने की कोशिश करेगी।


कुल मिलाकर भारत-नेपाल संबंध में अप्रत्याशित परिवर्तन आने वाला है। इस बदलाव का प्रबंध तंत्र क्या होगा और राजनीतिक दांवपेंच से इस प्रक्रिया को बचाकर नई रूपरेखा देना भारत और नेपाल दोनों की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

First Published - May 3, 2008 | 12:13 AM IST

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