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राजन कमिटी की सिफारिशों के बाद

Last Updated- December 06, 2022 | 9:03 PM IST

वित्तीय क्षेत्र में सुधारों पर बनी रघुराम राजन कमिटी की सिफारिशें वित्तीय हलकों में काफी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।


यहां सिफारिशों के कुछ अनछुए पहलुओं की पड़ताल करने को कोशिश की जा रही है। सिफारिशों पर अगर व्यापक निगाह डाली जाए तो प्रस्ताव के तकनीकी पक्षों पर असहमति की गुंजाइश काफी कम नजर आती है।


मेरे हिसाब से इन पक्षों का वर्गीकरण वित्तीय प्रणाली के सामने पेश आने वाली प्रमुख दिक्कतों के हल के नजरिए से किया जाना चाहिए। मेरी राय में कमिटी के कुछ प्रस्ताव इस कैटिगरी में आते हैं, जबकि बाकी को बेहतर प्रस्तावों की कैटिगरी में रखा जा सकता है, लेकिन इन प्रस्तावों की इस बाबत पड़ताल करनी जरूरी है कि क्या ये प्रस्ताव समस्याओं को दुरुस्त करने के सबसे कारगर उपाय है।


इसके अलावा इन्हें लागू करते वक्त पेश आने वाली चुनौतियों पर भी बारीक निगाह डालनी जरूरी है।इस कॉलम में मार्केट डेवलपमेंट, क्रेडिट इन्फ्रास्ट्रक्चर और नियामक ढांचा संबंधी सिफारिशों का जायजा लिया गया है। बाजार की तरलता और कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए कमिटी ने कई प्रस्ताव किए हैं।


इन प्रस्तावों में एकीकृत नियामक ढांचा से लेकर खास एक्सचेंज बनाए जाने की बात कही गई है। इसके जरिये नए प्रॉडक्ट्स और संवेदनशील निवेशकों के साथ आने और वित्तीय क्षेत्र में नए प्रयोग की उम्मीद जताई गई है। सिफारिशों में सरकारी और कॉरपोरेट डेट मार्केट (ऋण बाजार) को विदेशियों के लिए भी खोलने का प्रस्ताव है।


एक्सचेंज रेट रिजीम में संक्रमण के दौर के मद्देनजर यह बात कही गई है। अगर रुपये को खुला छोड़ना है, तो पूंजी का प्रवाह चिंता का विषय नहीं माना जाना चाहिए। इसके अलावा एक्सचेंज रेट के खतरों को कम करने के लिए घरेलू और विदेशी निवेशकों को लो कॉस्ट हेजिंग का अवसर मुहैया कराया जाना चाहिए। हालांकि यह बात जरूर है कि बाजार के विकास के लिए की गईं कई सिफारिशें लंबे अर्से से बहस का मुद्दा बनी हुई हैं, लेकिन नियंत्रण से मुक्त रुपये के सहारे के लिए इसकी प्रासंगिकता ज्यादा है।


सिर्फ मार्केट रिस्क को बाजार के उभरने की वजह तो नहीं माना जा सकता, लेकिन यह अहम वजह है। इसी तरह रिपोर्ट की सफारिशों में कहा गया है कि कीमतों में अनचाहे उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए बाजार में पाबंदी जैसे विकल्प का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए।


इस मामले में मतभेद उस वक्त उभर कर सामने आए, जब अभिजीत सेन कमिटी की रिपोर्ट में कृषि उत्पादों के वायदा कारोबार पर पाबंदी लगाने के मामले में सर्वसम्मति से कुछ नहीं कहा गया, हालांकि रिपोर्ट में फिलहाल जारी पाबंदियों को हटाने के बारे में भी साफ-साफ कुछ नहीं कहा गया है। जाहिर है कि इस मसले पर गतिरोध कायम है। क्रेडिट इन्फ्रास्ट्रक्टर के मामले में भी रघुराम राजन कमिटी ने कई अहम सिफारिशें की हैं।


शुरुआत यूनिवर्सल स्मार्ट कार्ड आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (पहचान पत्र) से की गई है। इस बात में कोई शक नहीं है कि इस सिस्टम के जरिये लोगों का क्रेडिट तंत्र से आसानी से संपर्क हो सकेगा, लेकिन लोगों तक यह सेवा बेहतर ढंग से पहुंचाने में काफी मुश्किलें पेश आ सकती हैं।


हालांकि यह शर्म की बात है कि आईटी सेक्टर की हमारी काबिलियत के सहारे दूसरे देशों के आइडेंटिफिकेश सिस्टम का प्रबंधन होता है, जबकि हमें खुद को साबित करने के लिए हर जगह 6-7 प्रमाण पत्र पेश करने पड़ते हैं। रिपोर्ट में लोन प्राप्त करने और इससे संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए पहचान पत्र को जरूरी शर्त बताया गया है। हालांकि ये सभी सिफारिशें समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन प्रस्तावों और इसे लागू करने में कहीं न कहीं विरोधाभास नजर आता है।


अन्य प्रस्तावों के मुकाबले नियामक ढांचा बनाने का प्रस्ताव थोड़ा बड़ा कदम है और यह पूरी तरह मौलिक जान पड़ता है। इस प्रस्ताव के जरिये कमिटी ने एक यूनिवर्सल रेग्युलटेर (नियामक) के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश की है। वित्तीय होल्डिंग कंपनियों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर एक ही कंपनी को सभी तरह की वित्तीय सेवाएं मुहैया कराने का अवसर मिलेगा, जिसकी हिमायत कमिटी भी करती है।


मसलन हाउसिंग फाइनैंस, अन्य बैंकिंग सेवाएं और इनवेस्टमेंट सेवाएं एक ही वित्तीय कंपनी मुहैया करागएगी। यूनिवर्सल बैंकिंग में वित्तीय सिस्टम को बेहतर बनाने की भरपूर संभावना है, लेकिन संपत्तियों और दायित्वों का ढांचा काफी पेचीदा होने की वजह से इसमें जोखिम का खतरा भी ज्यादा होगा। यूनिवर्सल बैंक के अलग-अलग हिस्सों की बैलेंसशीट का नियमन अलग-अलग इकाइयों द्वारा किए जाने से यह खतरा बढ़ने लगता है।


कमिटी की सिफारिशों के मुताबिक, एक यूनिवर्सल रेग्युलेटरी एजेंसी बनाकर यूनिवर्सल बैंकिंग का फायदा उठाने के साथ-साथ इससे संबंधित खतरे से भी निपटा जा सकता है।  हालांकि कमिटी इस बदलाव की प्रक्रिया में दिक्कतें पेश आने की बात भी स्वीकार करती है और इसके मद्देनजर वित्तीय सेवा ओवरसाइट एजेंसी बनाने का प्रस्ताव किया गया है।


यह एजेंसी विभिन्न नियामक संस्थाओं के बीच समन्वय का काम करेगी। इस एजेंसी के ढांचे के बारे में विस्तार से बताया गया है और इसकी कमान नियामक  संस्थानों के सबसे सीनियर प्रमुख के हाथ में सौंपने की बात कही गई है।


मेरी राय में यूनिवर्सल रेग्युलेटर का प्रस्ताव काफी अहम है। कमिटी वित्तीय सेक्टर की संभावित दिशा-दशा का जायजा लेने में पूरी तरह सही है और इस बात पर उंगली नहीं उठाई जा सकती है कि  इसमें कुछ वित्तीय सुपरमार्केट्स हावी रहेंगे, जो हर क्षेत्र के बिजनेस में मुकाबला करने वाले खिलाड़ी साबित होंगे। वित्तीय बाजार के ढांचे को दुरुस्त करने के लिए सही नियामक ढांचा काफी जरूरी है। 


हालांकि मेरी राय में इस बाबत स्वतंत्र संस्थान के बजाय समन्वय तंत्र का प्रस्ताव कुछ आशंकाएं पैदा करता है। हम सेना में भी इस तरह का प्रयोग कर चुके हैं और जहां जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ तंत्र की स्थापना की गई है और सेना की तीनों इकाइयों में सबसे सीनियर प्रमुख को इसका चीफ बनाया जाता है, जबकि अमेरिका में ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ अलग शख्स को नियुक्त किया जाता है।


कमिटी को अपनी सिफारिशें करते वक्त इस प्रयोग के नतीजों से सबक लेना चाहिए था। बहरहाल कमिटी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कई ऐसे प्रस्ताव हैं, जो वित्तीय सिस्टम को बेहतर और संपूर्ण बनाने में सहायक होंगे। हालांकि  वर्तमान हालात में कई दूसरों के मुकाबले ज्यादा अहम हैं, जबकि कुछ प्रस्तावों को लागू करना ज्यादा आसान है। हालांकि इस बारे में अंतिम फैसला तभी हो सकेगा, जब इसे लागू करने की संभावना जगेगी।

First Published - May 5, 2008 | 12:01 AM IST

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