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संप्रग सरकार के विश्वास प्रस्ताव में विजय हासिल करने के बाद परमाणु करार की संभावनाएं बढ़ीं, फिर भी जारी है तकरार

Last Updated- December 07, 2022 | 2:04 PM IST

ऊर्जा जरूरतों के लिए अहम
सविता पांडे
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू, नई दिल्ली


मेरा मानना है कि भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित नागरिक परमाणु समझौता (123 समझौता) भारत के हित में है।

सभी जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, उसके लिए ऊर्जा की जरूरत पड़ना भी लाजिमी ही है। इसके अलावा देश में बिजली की किल्लत होने की बात भी किसी से छिपी नहीं रह गई है। सभी मानते हैं कि देश में गंभीर बिजली संकट है जिससे निपटने के लिए बिजली उत्पादन की क्षमता में बहुत तेजी से इजाफा करना वक्त की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इसलिए ही भारत-अमेरिकी नागरिक परमाणु करार की कुछ लोग बहुत जोरदार तरीके से वकालत कर रहे हैं और हमारे प्रधानमंत्री उन लोगों की अगुवाई कर रहे हैं। मेरा मानना है कि यह करार भारत के लिए बहुत फायदेमंद है। इससे ऊर्जा संकट पर काबू पाने में कुछ सफलता हाथ लगेगी। दरअसल परंपरागत ऊर्जा के स्रोतों की बजाय नाभिकीय ऊर्जा अच्छा विकल्प है।

यह सस्ता होने के साथ ही पर्यावरण के अनुकूल भी है। इस समझौते के बाद भारत को परमाणु ईंधन मिल पाएगा, साथ ही इससे संबंधित तकनीक भी हासिल हो पाएगी। यूरेनियम के मिलने से हमारा थोरियम ईंधन भी इस्तेमाल हो पाएगा। यह बात तो सभी जानते हैं कि भारत में थोरियम के विशाल भंडार हैं लेकिन बिना यूरेनियम के उनका उपयोग कर पाना संभव नहीं हो पाया है। भारत के परमाणु कार्यक्रम की बुनियाद बहुत ही मजबूत रही है। इस समझौते से इस कार्यक्रम को जरूरी तकनीक हासिल हो पाएगी जिससे इसका और विकास संभव हो पाएगा।

नाभिकीय मामलों में रूस और फ्रांस हमेशा से भारत के सहयोगी रहे हैं। लेकिन कुछ बाधाओं की वजह से उनका समुचित सहयोग हमें नहीं मिल पाया है। सही मायनों में यही समझौता उन बाधाओं को दूर करेगा। यह भी कहा जा रहा है कि 123 समझौते के बाद भारत का ‘एटमी अकेलापन’ भी खत्म हो जाएगा। भारत में कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु बिजली की हिस्सेदारी अभी भी बहुत कम है और इसे बढ़ाया जाना देश के हित में है। और इस लक्ष्य को हासिल करने में यह समझौता बहुत अहम भूमिका निभाएगा। वैसे इस समझौते की राह अभी काफी मुश्किल है।

परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों (एनएसजी) के सामने जब यह समझौता मंजूरी के लिए जाएगा तो असल दिक्कत वहां पर आएगी। इस समूह के प्रमुख देशों में से एक हमारे पड़ोसी चीन ने अभी तक इस समझौते के समर्थन के मुद्दे पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं किया है। ऐसे मुद्दों पर चीन का भारत विरोधी रुख रहा है और इस बार भी उससे कम ही उम्मीदें हैं। वैसे इस करार को मंजूरी दिलाना अमेरिका की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है, इस तरह से अमेरिका इस करार को लागू कराने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाला है।

इसकी भी सीधी सी वजह है, वह यह कि इस करार के लागू होने के बाद अमेरिकी कंपनियों को भारत में बड़ा कारोबार मिलेगा और ये कंपनियां इस मौके को हाथ से निकलने नहीं देना चाहती हैं। वैसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बुनियाद दो देशों के हितों की सुरक्षा पर ही टिकी होती है, इस तरह से 123 समझौता भी कोई अपवाद नहीं है। इसमें भी दोनों देशों के अपने-अपने हित हैं। भारत में बहुत सारे लोग शोर मचा रहे हैं कि इस समझौते में बहुत सारी शर्तें अपमानजनक हैं और इससे देश की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।

ऐसे लोगों को मेरा यही कहना है कि कुछ हासिल करने के लिए कुछ कीमत तो चुकानी पड़ती ही है। (इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि मैं देश की संप्रभुता और अपमानजनक शर्तों पर भी करार को करने की पक्षधर हूं।) अब सरकार को इन लोगों की चिंताओं को दूर करते हुए करार पर आगे बढ़ना चाहिए। जिससे देश के विकास को बल मिले और ऐसी शर्तें भी नहीं माननी चाहिए कि उनकी कीमत आने वाले वक्त में देश को चुकानी पड़े।
बातचीत: प्रणव सिरोही

राष्ट्रहित में नहीं है यह समझौता
डी. राजा
राष्ट्रीय सचिव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

भारत-अमेरिका परमाणु समझौता देश की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता के लिए खतरा साबित हो सकता है। हमारे देश का अपना परमाणु कार्यक्रम अच्छी तरह से चल रहा है, ऐसे में परमाणु सहयोग समझौता करने की कोई खास जरूरत ही नहीं है। इस समझौते का भारत की ऊर्जा सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। इससे बहुत कम मात्रा में ही बिजली पैदा होगी।

हमारे देश में पहले से ही 70 परमाणु रिएक्टर मौजूद हैं जहां 2.6 फीसदी परमाणु ऊर्जा का उत्पादन होता है। सरकार का कहना है कि इस परमाणु समझौते के तहत 6.8 फीसदी परमाणु ऊर्जा का उत्पादन होगा वह भी 2020 तक। एक तरह से यह परमाणु समझौता पूरी तरह से भविष्यवाणियों पर ही निर्भर है। जिसका फायदा भविष्य में मिलने का दावा किया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ सुरक्षा समझौते से सरकार के दावे के विपरीत ईंधन आपूर्ति की कोई गारंटी नहीं दी गई है।

भारत अमेरिका के साथ जो रणनीतिक साझेदारी कायम कर रहा है वह देश की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को नजरअंदाज करता है। परमाणु अप्रसार संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न देशों की तरह आईएईए की निगरानी से अपने रिएक्टर को बाहर निकालने का अधिकार नहीं होगा। ऐसी परिस्थितियां राष्ट्रहित में तो नहीं कही जा सकती हैं। दरअसल जार्ज बुश का कार्यकाल आखिरी चरण में है और उनकी कोशिश है कि भारत अमेरिका परमाणु समझौते को उनके रहते ही अमरीकी संसद से अनुमोदन मिल जाए।

हम यह चाहते हैं कि देसी परमाणु रिएक्टरों को बढ़ाया जाए। घरेलू ऊर्जा संसाधनों का विकास करना चाहिए। इसके साथ ही होमी भाभा के दिए गए 3 चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम को जारी भी रखें। अगर आप अमेरिका के परमाणु रिएक्टरों के बारे में जानकारी लेंगे तो आपको पता चलेगा कि वहां तीन दशक से कोई भी नया रिएक्टर नहीं बनाया गया है। अमेरिका के परमाणु रिएक्टर उद्योग के संयत्रों का कोई खरीदार नहीं है, इसीलिए अमेरिका चाहता है कि भारत इस तरह के संयत्रों को खरीद ले।

इस परमाणु समझौते से तो यही लगता है कि पश्चिमी देशों की ऊर्जा कंपनियों के लिए एक बाजार की जरुरत है जो भारत और चीन के जरिए ही पूरी हो सकती है। भारत में भी कुछ कारोबारी हित काम कर रहे हैं जिनकी कोशिश यही है कि राजनीतिक नेताओं पर ऐसा दबाव बनाया जाए जिससे इस समझौते को एक रूप मिल सके। हालांकि यह सच है कि इसके जरिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा नहीं मिलने जा रही है। सरकार को यह समझना होगा कि परमाणु का एक बिजली का संयत्र लगाने में बहुत खर्च आता है और इन परमाणु बिजली संयत्रों से पैदा होने वाली बिजली की लागत भी ज्यादा होगी और आम जनता के लिए यह बिजली महंगी होगी।

एक तरह से अमेरिका के गिरफ्त में आ रही है हमारी विदेश नीति। अगर आप अमेरिका के हाइड एक्ट की बात करें तो यह अमेरिका का राष्ट्रीय कानून है जो भारत के लिए विशेष तौर पर बनाया गया है। इस कानून के तहत अगर कोई विवाद होता है तो किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में जाने के बजाय इसके लिए हम अमेरिका के बनाए गए कानून के अंतर्गत बंधने के लिए बाध्य हो सकते हैं। कोई ये कैसे भूल सकता है कि लोकतांत्रिक हितों का पैरोकार बनने वाले अमेरिका ने अपनी परमाणु शक्ति के बलबूते हिरोशिमा और नागासाकी को कैसे बर्बाद किया था।

आपको यह याद होना चाहिए कि भारत में जब पोखरण परमाणु समझौता हुआ तब अमेरिका ने भारत पर कितने प्रतिबंध लगा दिए थे। हमें ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। सरकार लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज करके ऐसा समझौता कर रही है जबकि उसे पता है कि परमाणु ऊर्जा की वजह से दुनिया को गंभीर दुष्परिणाम को झेलना पड़ा है।
बातचीत: शिखा शालिनी

First Published - July 30, 2008 | 11:29 PM IST

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