मई 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने अपने गठन के कुछ सप्ताह के भीतर ही दो विशिष्ट कदम उठाए।
सरकार के 5 साल का कार्यकाल पूरा होने के कुछ ही महीने रह गए हैं, ऐसे में यह सही वक्त है कि उन विशिष्ट कदमों पर एक नजर डालकर उनका आकलन किया जाए ताकि यह पता चल सके कि क्या अगली सरकार को भी ऐसा करना चाहिए।
सरकार का पहला काम यह था कि उसने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) जैसा गैर सरकारी संगठन तैयार किया। एनएसी को संप्रग सरकार के राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर अमल कराना और उसकी निगरानी रखना था। इसको सरकार से आर्थिक मदद मिलती थी, और इसकी ताकत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी मुखिया और कोई नहीं बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं।
हकीकत यह है कि जब तक सोनिया गांधी इस संगठन की अध्यक्ष थीं, एनएसी ने बहुत तेजी से काम किया। यहां तक कि इस संगठन ने सरकार की तमाम क्षेत्रों की कई नीतियों को प्रभावित किया। इसी बीच इस बात को लेकर एक बवाल हो गया कि क्या एनएसी का अध्यक्ष लाभ का पद है और क्या सोनिया गांधी ने संसद सदस्य बने रहने के लिए आवश्यक शर्तों का उल्लंघन किया है।
यह विवाद हल हो पाता, इससे पहले ही सोनिया गांधी ने मार्च 2006 में लोक सभा सदस्य का पद त्याग दिया। वह फिर से उसी लोक सभा क्षेत्र से चुनाव के मैदान में उतरीं और जैसी कि पहले से उम्मीद थी, कुछ महीने बाद वह फिर चुनाव जीतकर लोकसभा में वापस आ गईं। इसके बाद सोनिया गांधी एनएसी की दोबारा से अध्यक्ष नहीं बनीं। एनएसी ने उसके बाद भी दो साल तब तक काम किया, जब तक कि मार्च 2008 में इसका कार्यकाल खत्म नहीं हो गया। लेकिन बाद के दो सालों में इसका कोई योगदान नहीं रहा। महत्त्वपूर्ण यह है कि सोनिया गांधी के हटने के बाद कोई दूसरा इसका अध्यक्ष भी नहीं बना।
एनएसी का गठन संप्रग सरकार का एक खास कदम था। इसका मकसद यह था कि सरकार के नीति निर्धारण में नागरिक समाज को भी तवज्जो मिले। इसमें कुछ भी गलत नहीं था कि एनएसी जैसे एक ऐसे निकाय का गठन किया जाए जो ऐसे कार्यक्रम को लागू करने के संबंध में सरकार को सलाह दे जिसका उसने चुनावों के समय मतदाताओं से वादा किया। लेकिन यह प्रयोग विवादों में उलझ गया और अब इस बात पर भी संदेह है कि आने वाली कोई सरकार इस तरह की कोशिश करेगी।
संप्रग सरकार का दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम यह था कि सरकार को चलाने के दायित्व को कांग्रेस पार्टी या सहयोगी दलों को चलाने के दायित्व से अलग कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह को ही सरकार और प्रशासन के संचालन का काम देखना था। इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं करनी थी कि वे गठबंधन को एकजुट बनाए रखें। गठबंधन को कायम रखने के राजनीतिक प्रबंधन तथा गठबंधन के राजनीतिक उद्देश्यों को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सोनिया गांधी पर छोड़ दी गई, जो संप्रग की अध्यक्ष हैं।
यह देखा गया कि संप्रग सरकार के पहले दो साल के कार्यकाल के दौरान यह व्यवस्था बहुत अच्छी चली। प्रशासक या सरकार के नेता के रुप में मनमोहन सिंह की क्षमता पर कोई संदेह नहीं था लेकिन ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला कि वह संप्रग जैसे विभिन्न पार्टियों के गठबंधन को चलाने के लिए अपने में खुद की ही पार्टी के लोगों का विश्वास जगा सकें। इस काम के लिए सोनिया गांधी को ही सबसे ज्यादा उपयुक्त समझा गया। दायित्वों का बंटवारा इतनी सफाई से किया गया कि इसकी सोनिया गांधी के मास्टरस्ट्रोक के रुप में सराहना की गई।
हंगामा तब बरपा जब मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना पहला साहसिक कदम उठाया। वह कदम था भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव। इस मामले में प्रधानमंत्री का मानना था कि अमेरिका के साथ यह समझौता होने से भारत को लाभ ही लाभ है। लेकिन जिन लोगों पर सहयोगी दलों के साथ तालमेल बैठाने की जिम्मेदारी थी, उन्हें महसूस हो गया कि सरकार के कार्यकाल को जोखिम में डाले बगैर समझौता होना मुश्किल है।
इस मुद्दे पर सभी सीमाएं टूट गईं। मनमोहन सिंह इस समझौते के लिए इच्छुक हैं, जिससे भारत की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके और वह चाहते थे कि इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन सरकार के सहयोगी, वाम दल और कुछ अन्य पार्टियां प्रधानमंत्री के इस तर्क को खारिज कर रही हैं। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस गतिरोध को किस तरह से दूर किया जा सकेगा। लेकिन सरकार के भीतर या बाहर कोई भी सरकार चलाने और सहयोगी दलों से तालमेल बैठाने की जिम्मेदारी का बंटवारा करने के संप्रग सरकार के अनोखे फैसले की सराहना नहीं कर रहा है। शायद ऐसी व्यवस्था केवल सैध्दांतिक रूप में ही हो सकती है।