कृषि को कोई लाभ नहीं होने वाला
कर्ज माफी योजना का किसानों के साथ-साथ कृषि को कोई लाभ होने वाला नहीं है। जिसके पीछे साफ कारण है कि केंद्र सरकार ने जिस कर्ज माफी योजना की घोषणा की है कि उसके तहत बैंकों से लिए गए कर्ज माफ किए जायेंगे। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि कर्ज के बोझ तले दबे किसानों ने साहूकारों से कर्ज लिए हुए हैं। परिणामस्वरुप कृषि का स्तर सुधरता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। – मृणालताई गोरे, वरिष्ठ समाजसेवक, मुंबई
खुद किसान ठगा महसूस करेंगे
योजना के संशोधित मापदंडों के बाद भी केवल 27 फीसदी कर्जदार ही लाभान्वित होंगे। इस अवस्था को संभालने का उपाय कर्ज माफी नहीं बल्कि सिंचाई, बिजली, कृषि अनुसंधान और घरेलू खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों जैसे बुनियादी क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना है।
इस योजना का दुर्गुण यह भी है कि इससे ईमानदार किसान स्वयं को ठगा हुआ समझेंगे और इससे कर्ज न चुकाने की मानसिकता को बढ़ावा मिलेगा, जो पूरी साख व्यवस्था के वित्तीय अनुसाशन को चौपट कर सकता है। अत: कृषि व्यवस्था को लाभदायक बनाने की दीर्घावधि योजनाओं पर ही जनता की गाढ़ी कमाई व्यय की जानी चाहिए। – डॉ. जी. एल. पुणताम्बेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मप्र)
कृषि विकास की नीतियों को लागू करें
किसानों की कर्ज माफी से कृषि को कोई फायदा नहीं होने वाला है। लेकिन अर्थव्यवस्था में जिस गति से विस्तार हो रहा है उतनी गति से अभावों और अन्य चीजों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकेगा।
सरकार ने जिस उदारता का परिचय देते हुए किसानों के ऋण माफ किए हैं, उसी उदारता का परिचय देते हुए आवश्यकता है कि कृषि विकास के लिए जिन नीतियों की घोषणा की जाती है, उन्हें व्यवहारिक स्तर पर क्रियान्वित किया जाए। इसके अलावा आधुनिक कृषि के लिए उन्नत किस्म के बीजों, वन-औषधियों से जुड़े रोजगार, दुग्ध उत्पादन, जैविक कृषि आदि से जुड़े रोजगार के अवसरों का सृजन कर बेरोजगारों व कृषि की दयनीय दशा में सुधार किया जा सकता है। – मनोज कुमार ‘बजेवा’, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
प्यासे के लिए बस दो बूंद पानी
जिस तरह प्यासे व्यक्ति को पानी की दो बूंद मिलना, कुछ ऐसा ही योगदान कर्ज माफी द्वारा कृषि क्षेत्र को दिया जा रहा है। एक किसान कई तरह की समस्याओं से टकराते हुए फसल प्राप्त करता है।
सारी समस्याएं पार करते हुए अंतिम चरण में जब फसल बाजार में बिक्री के लिए आती हैं तो उसका उचित मूल्य नहीं मिलता है, यहां से कृषक की दयनीय स्थिति हो जाती है और वह कर्ज के चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है। यदि किसान द्वारा पैदा की पैदावार का उचित निराकरण एवं उस पैदावार का उचित मूल्य मिलने पर कई समस्याओं को कम करते हुए कृषि क्षेत्र को वाकई फायदा हो सकता है। – अरूणोपुत्र हुली, जयपुर
शायद ही किसी क्षेत्र को फायदा होगा
भारत में ज्यादातर किसान छोटे हैं। उनकी इस कर्ज माफी से मामूली ही फायदा होगा। क्योंकि किसानों के अपने खर्च भी होते हैं, किसान भी खर्च करने के लिए जमीन पर ही निर्भर रहता है। प्रति वर्ष किसान को कोई न कोई परेशानी आ जाती है। अगर सरकार 50-60 हजार रुपये का कर्ज माफ भी कर दे तो उससे किसानों का कुछ नहीं होगा। आज भारत में ज्यादातर किसान गरीब हैं और कर्ज के नीचे दबे हैं। इससे शायद ही किसी क्षेत्र को फायदा होगा। – ओ. पी. मालवीय, भोपाल
कम ब्याज पर राशि देना अच्छा होता
किसानों के लिए कर्ज माफी की योजना की वही दुर्गति होगी, जो कि सभी राजनैतिक योजनाओं की होती है। कर्ज माफी के बजाय किसानों को बीज, खाद आदि के लिए मुफ्त या कम ब्याज पर राशि दी जाती तो ज्यादा अच्छा होता।
जिस वर्ग के किसानों को यह योजना संबोधित है, उस वर्ग के किसान ज्यादातर ऋण के लिए स्थानीय साहूकार या व्यापारी पर आश्रित रहते हैं। बैंकों पर उसकी निर्भरता न के बराबर है। अत: यह योजना सिर्फ राजनैतिक उद्देश्य ही पूरा करेगी। अपने आर्थिक लक्ष्य पर पहुंचने की इससे आशा करना व्यर्थ है। – डॉ. सतीश कुमार शुक्ल, सलाहकार, फेडरेशन ऑफ इंडियन कमोडिटी एक्सचेंज, मुंबई
यह मजाक और वोटों की राजनीति है
किसानों की कर्ज माफी कृषि क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं से ध्यान हटाने का हथियार मात्र है। इसमें फायदा है तो सिर्फ सरकार को या बड़े जमींदारों को। यदि सरकार को कर्ज माफ करना ही है तो सिर्फ छोटे किसानों का कर्ज माफ करे क्योंकि आत्महत्या बड़े किसान नहीं छोटे किसान कर रहे हैं। बड़े किसानों से कर्जा वसूल कर छोटे किसानों को उन्नत बीज, खाद, ट्रैक्टर तथा बिजली रियायती दरों पर दी जानी चाहिए। यह कर्ज माफी सिर्फ एक मजाक और वोटों की राजनीति है। – अनवर अंसारी, वाणिज्य निरीक्षक, उत्तर रेलवे, अम्बाला मण्डल, अम्बाला छावनी
पहले आधार मजबूत करें
जब तक आप आधार मजबूत नहीं करेंगे, कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। कर्ज माफी की सारी मलाई बड़े व प्रभावशाली किसानों को ही मिलेगाी क्योंकि 80 फीसदी कर्ज छोटे किसानों ने निजी साहूकारों से लिए हैं जिनका कोई कानूनी रिकॉर्ड नहीं होता।
80 फीसदी छोटे किसानों ने निजी तौर पर साहूकारों से कर्ज लेकर अपनी खेती की है। सरकार यदि वाकई कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर है तो उसे इस क्षेत्र की समस्याओं व तरक्की बाबत एक नया आयोग गठित करना चाहिए, जिसमें केवल खेतिहर किसान हों, एयरकंडिशनों में बैठने वाले ब्यूरोक्रेट व जमींदार टाइप नेता नहीं। – कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक, दैनिक जागरण, मेरठ
किसानों को फायदा, कृषि को नहीं
सरकार के इस पहल से सिर्फ कर्ज लेने वाले किसानों को फायदा होगा, कृषि को नहीं। कृषि को फायदा तो तभी हो सकता है जब सरकार किसानों को कृषि के आधुनिक उपाय उपलब्ध कराएं। भारत में जब तक सिंचाई आदि के लिए मानसून पर निर्भरता रहेगी, तब तक कृषि का अधिक विकास नहीं होगा।
किसानों की उनकी फसल का उपयुक्त दाम मिले। कृषि के लिए दो ही बात अहम है, पहली बात कृषि के आधुनिक उपायों पर सरकार द्वारा रचनात्मक कार्य हो। दूसरी बात यह है कि कृषि की उपज का किसानों को अधिकतम उपयुक्त मूल्य मिले, जिससे किसानों में उत्साहवर्धन हो तभी कृषि को फायदा हो सकता है। – सुनील जैन ‘राना’, छत्ता जम्बू दास, सहारनपुर
किसानों को प्रशिक्षण की आवश्यकता
आज कृषि क्षेत्र को उद्योग की तरह प्रत्येक क्षेत्र में मदद की जरूरत है। किसान के लिए कर्ज माफी योजना ने बेहतर इलाज का काम नहीं किया है। बिजली-पानी, प्राकृतिक खाद-बीज, बिगड़ती हवा, खराब होती मिट्टी और मैले होते पानी की समाधान का वैज्ञानिक तरीके का प्रशिक्षण आम किसान को दिया जाना चाहिए।
जबकि आज पानी के बुलबुले की तरह इक्का-दुक्का किसान को खानापूर्ति के तौर पर प्रशिक्षण दिया जाता है। किसान को जमीन की खरीद-बिक्री से रजिस्ट्री ऑफिस, कर्मचारी और अनाज उपजाने-बेचने तक अपनी गाढ़ी कमाई और समय का अपव्यय करना पड़ता है। – राजेंद्र प्रसाद मधुबनी, व्याख्याता मनोविज्ञान, वार्ड न. 14 मधुबनी, बिहार
डूबते को तिनके का सहारा
विडंबना ही है कि कृषि प्रधान देश भारत में खेतीबाड़ी व किसानों की हालत बेहद दयनीय है। जी.डी.पी. में 18.5 फीसदी योगदान व 74.4 फीसदी आबादी के जीविकोपार्जन का जरिया होने के बावजूद कर्ज के मकड़जाल में उलझे किसान आत्महत्या करने को विवश हैं।
ऐसे में ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ द्वारा किसानों की कर्ज माफी वाकई स्वागतयोग्य व डूबते को तिनके का सहारा के समान है। इससे जहां किसान ज्यादा विश्वास व उत्साह के खेतीबाड़ी करेंगे वहीं अच्छी पैदावार होने से किसान व देश दोनों को भला होगा। ‘खाद्य-सुरक्षा’ को बढ़ावा मिलेगा। आखिर विकसित देश भी तो किसानों को भरपूर सब्सिडी देते हैं, तो कृषि प्रधान देश भारत क्यों नहीं? – हर्ष वर्धन कुमार, डी-5556, द्वितीय तल, गांधी विहार, दिल्ली
भौचक्का खड़ा है किसान
हजारों करोड़ रुपया पानी की तरह पी लेने वाली कई सिंचाई परियोजनाएं आज भी अधूरी है और पिछले बीस सालों से सिंचाई की कोई बड़ी परियोजना क्रियान्वित नहीं हुई। देश की 14 करोड़ 20 लाख कृषि योग्य जमीन में से 60 फीसदी जमीन आज भी सिंचाई सुविधा से वंचित है।
कृषि ऋण 17,5000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है और एक ट्रैक्टर लेने के लिए तीन हेक्टेयर से अधिक सिंचित कृषि भूमि गिरवी रखनी पड़ती है। बहरहाल, भौचक्का खड़ा किसान समझ नहीं पा रहा है कि पुराने कर्जों की माफी की सूरत में सरकार की जय-जयकार करे या ऐसी कामना करे कि आगे फिर बैंक न चाहते हुए भी सरकारी दबाव में उसे कर्ज देते रहेंगे। – मोहन वर्मा, सिंचाई कार्य मंडल, नहर कॉलोनी, सीतापुर, उत्तर प्रदेश
तपते रेगिस्तान में वर्षा की मानिंद
कर्ज से दबा अशांत दिमाग कुछ भी सकारात्मक नहीं कर सकता। किसानों की कर्ज माफी कृषि क्षेत्र के लिए तपते रेगिस्तान में वर्षा की मानिंद है। इससे गरीब व मझोले कृषक, बैंक और साहूकारों के बोझ से मुक्त होंगे और अपना पूरा जोर खेतीबाड़ी उत्पादन में लगा सकेंगे। सरकार को चाहिए कि उन अन्नदाता किसान को उन्नत किस्म के बीज, खाद, तकनीकी जानकारी व पर्याप्त बिजली-पानी दें।
किसान भी वर्षा जल व भूमिगत पानी, बूंद-बूंद सिंचाई व्यवस्था से ज्यादा उपज उगा सकता है। ज्यादा पानी न होने पर कृषक कम पानी वाली फसलें भी बो सकता है। किसानों को आपस में मिलकर एक-दूसरे के संसाधनों का भी अधिकतम उपयोग करना चाहिए ताकि कोई भी पेट खाली ना रहे। सरकार को नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना पर तेजी से अमल करना चाहिए। – सीप गुप्ता, 24, सदर बाजार, श्रीगंगानगर, राजस्थान
किसानों को मिलेगा तात्कालिक लाभ
वित्त मंत्री के इस कर्ज माफी की घोषणा से सीमान्त व मझोले किसानों को न के बराबर तात्कालिक लाभ ही मिलेगा। इसके दो प्रमुख कारण है- पहला यह कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि ऋणों की परिभाषा में सरकार ने व्यापारियों, उद्योगपतियों, कंपनियों व सरकारी प्रतिष्ठानों आदि को दिए जाने वाले ऋणों को भी शामिल किया है।
अत: कर्ज माफी का अधिकतर लाभ इन्हें ही मिलने वाला है। दूसरा कारण यह है कि किसानों के ऋण उपलब्धता में गैर संस्थागत बैंकिंग क्षेत्र की भूमिका सर्वाधिक है। अत: ऐसे किसानों को भी कर्ज माफी का कोई फायदा नहीं होगा। कृषि प्रधान देश का विकास ‘कृषि’ व ‘उद्योग’ के संतुलन पर ही निश्चित होता है। – शशिधर दुबे, अर्थशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
असली दर्द पहचानना जरूरी
जब तक किसानों की कृषि से जुड़ी समस्याओं पर चिंतन नहीं होगा, तब तक कर्ज देने का उद्देश्य पूरा कैसे होगा? ठोस कर्ज नीति के अभाव का ही परिणाम सामने दिखाई दे रहा है कि कर्ज किसान परिवार के मौज-शौक की पूर्ति के लिए ले लेता है। पिछला कर्ज बकाया चुकाने के लिए भी ले लेता है।
परिणाम यह होता है कि किसान पर कर्ज का भार निरंतर बढ़ता जाता है और अंतत: विवश होकर आत्महत्या करने को बाध्य हो जाता है। किसान का असली दर्द पहचानना और समझना जरूरी है। – निर्मल कुमार पारोदी, जाय बिल्डर्स कॉलोनी, इंदौर
पुरस्कृत पत्र
योजना का लाभ दलाल उठाएंगे
वाकई किसानों की कर्ज माफी लाभदायक योजना है लेकिन वास्तव में यह लाभ किसान ले पायेंगे? इस योजना का लाभ कोई उठाए या न उठाए दलाल जरूर उठा लेंगे। क्योंकि किसानों के पास कई समस्याएं हैं, उनमें से एक है साक्षरता।
साक्षरता की कमी के कारण योजना का लाभ लेने के लिए दलाल समाने आ जाते हैं, जो उनके कर्ज को माफ कराने के बदले एक मोटी रकम ले लेते हैं। किसानों को कर्ज माफी से कृषि क्षेत्र को फायदा तो होगा लेकिन कितना होगा यह कहना मुश्किल है।
इस योजना से किसान कर्ज से मुक्त होंगे और वे अपनी खेती पर ध्यान लगा पाएंगे। जिस कर्ज को चुकाने के लिए उन्हें धन एकत्र कर के बैंक या साहूकार को देना पड़ता है उसकी जगह उस रकम से बीज व कृषि के अन्य वस्तुओं को क्रय करेंगे जिससे अच्छी फसल हो सकेगी।
– जागृति सिंह, अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, इलाहाबाद
सर्वश्रेष्ठ पत्र
कोई फायदा होता नहीं दिख रहा
वर्तमान परिदृश्य में तो किसानों की कर्ज माफी का कृषि को कोई फायदा होता नहीं दिख रहा है। खासकर महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में तो कृषि के अलावा मत्स्य उद्योग पर भी कर्ज माफी का कोई लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाया है।
आलम यह है कि नाबार्ड, जिसके सहयोग से किसानों की कर्ज माफी पर अंतिम फैसला लिया जाना था, वह स्वयं ही कोंकण क्षेत्र से सौतेला व्यवहार कर रहा है। इसके अलावा कोंकण क्षेत्र के किसानों ने आईआरडीपी के तहत कर्ज लिए हुए हैं, जिसके लिए कर्ज माफी योजना में कोई जगह नहीं दी गई है। – विवेक पाटिल, विधायक, किसान कामगार पार्टी, मुंबई
कृषि में विकास की उम्मीद जगेगी
निस्संदेह किसानों को दिए जाने वाली कर्ज माफी की राशि अन्य किसी कर्ज माफी से कही अधिक है। केंद्र सरकार ने बड़े किसानों को राहत देने के लिए 60,000 करोड़ रुपये की राशि को बढ़ाकर 71,680 करोड़ रुपये कर दिए हैं।
जहां एक ओर मुद्रास्फीति की दर 8.1 फीसदी तक पहुंच गई है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में आग लगी हुई है और साथ ही लोक सभा चुनाव भी नजदीक ही है, ऐसे में इतने बड़े पैकेज का भार उठाना मुश्किल होगा। सफलता तो फंड के स्त्रोत और प्रकृति पर निर्भर करती है। – जे. पी. सक्सेना, क्षेत्रीय प्रबंधक (रि.), पंजाब नैशनल बैंक, लखनऊ
साहूकार-महाजन पर लगे पाबंदी
केंद्र सरकार द्वारा देश के किसानों की कर्ज माफी की घोषणा वास्तव में एक महान कदम है। बीते कई साल से देश के विभिन्न क्षेत्रों में कर्ज के बोझ के नीचे दबे हजारों किसानों द्वारा आत्महत्या की खबरें आ रही हैं।
अब क्योंकि सरकार ने किसानों के कर्ज को माफ कर दिया है, यह उम्मीद की जा रही है कि अब ऐसी घटनाओं पर विराम लगेगा। लेकिन असंगठित क्षेत्रों में दिए जाने वाले ऋण को लेकर अभी भी चिंताएं बनी हुई हैं। मसलन साहूकार और महाजन का बोलबाला है। उन पर पाबंदी लगानी बहुत जरूरी है। – उपमा वाजपेयी, निदेशक, अवध टेक्सवुड एंड सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ
क्यों बना कर्ज का विशाल पहाड़?
60 हजार करोड़ रुपये की कर्जमाफी 71 हजार करोड़ रुपये हो चुकी है। सरकार को सर्वप्रथम कर्जप्रदाता बैकों व समितियों पर अनुशासनात्मक व जवाबदेह कार्रवाई करनी चाहिए कि आखिर कर्ज का विशाल पहाड़ क्यों बना, वसूली में विडंबना क्यों, राशि का उपयोग उत्पादक हुआ या गैर उत्पादक, इसका व्यापक सर्वेक्षण कराकर साथ में कर्ज प्राप्तकर्ता को भी कठघरे में खड़ा करना चाहिए। आज भी किसान मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, परंपरागत साधनों का उपयोग करता है, आखिर वर्षा निर्भरता से मुक्ति क्यों नहीं दिला पाते। – शरद कुमार दुबे, (सामाजिक संगठन-पगडंडी), 833 आर्य नगर कानपुर, उत्तर प्रदेश
बकौल विश्लेषक
कैंसर के मरीज को मिली है बस थोड़ी सी ऑक्सीजन
सरकार ने वर्षों से जंग लगी कृषि में थोड़ा जान डालने की कोशिश की है। ठीक वैसे ही जैसे किसी कैंसर के मरीज को ऑक्सीजन दी जा रही हो। सही दिशा में बढ़ते हुए सरकार की यह बहुत ही छोटी पहल है। सरकार को अभी और बेहतर करने की आवश्यकता है। इसमें अतिशयोक्ति नहीं कि हमारे देश में किसानों के साथ अन्याय हो रहा है।
किसानों को मिलने वाली उपज की कीमत काफी कम है। पिछले कुछ सालों में वस्तुओं की कीमतें सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। किसानों को छोड़ कर जहां अन्य लोगों की जेबें मोटी हो रही हैं, वहीं बेचारे किसान को मिलने वाली कीमत में कोई वृध्दि नहीं हुई है। अगर हमें वास्तव में कृषि का विकास करना है तो इसके लिए किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करना होगा।
किसानों का भला करने से ही कृषि का भला होगा। कृषि के विकास के लिए सरकार को तीन बातों पर ध्यान देना होगा- किसानों को अच्छी कीमत मिले, इन्फ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे) को बेहतर बनाया जाए और साथ स्थाई कृषि की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
जिस तरह दूध उत्पादन से जुड़े लोगों को अच्छी कीमत मिलती है, उसी तरह किसानों के लिए भी मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए। अमूल सामूहिक विपणन का अच्छा उदाहरण है। ऐसे मॉडल कृषि के लिए तैयार करने चाहिए। सामूहिक विपणन, सामूहिक कीमत और सामूहिक उत्पादन से किसान को मजबूत करने की जरूरत है।
– टी. एन. प्रकाश, कृषि अर्थशास्त्री, यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंस, जीकेवीके, बेंगलुरु
बातचीत: पवन कुमार सिन्हा
किसानों को मासिक आय दिए जाने से बनेगी बात
जब साल 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार सत्ता में आई थी, अगर उसी वक्त वे किसानों की कर्ज माफी की घोषणा कर देते तो शायद आज हजारों किसान आत्महत्या करने से बच जाते। सभी जानते हैं कि अधिकांश किसान कर्ज के बोझ के नीचे दबे हुए थे। ऐसे में सरकार का यह कदम थोड़ा राहत देने वाला है। हालांकि इससे देश के सिर्फ 40 से 50 फीसदी किसानों को ही फायदा होगा।
कृषि के विकास के लिए कर्ज माफी के अलावा सरकार को और भी पहल करने की आवश्यकता है। किसानों के ऊपर ऋण बढ़ने के मुख्यत: दो कारण हैं- पहला, किसान का जो लागत मूल्य है, वह बीते कई सालों से बढ़ता ही जा रहा है और दूसरा, किसानों को जो कीमत मिलती है, वह पिछले 20 साल से स्थायी बनी हुई है।
जब तक सरकार इस दिशा में कोई स्थायी समाधान नहीं निकालती है, तब तक यह साइकिल (कर्ज माफी) चलता रहेगा और हर दो-तीन साल के बाद सरकार को इस तरह की घोषणा करनी होगी। निस्संदेह इससे कृषि और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। अगर वास्तव में किसानों और कृषि को बेहतर बनाना है तो किसानों को प्रति एकड़ निश्चित आय देनी होगी।
इसके अलावा लो इनपुट सेसटेनेबल एग्रीकल्चर, आर्गेनिक फार्मिंग और टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना होगा। सरकार जब तक इस दिशा में पहल नहीं करती है, तब तक कृषि का भला नहीं होने वाला है। आज हमारे देश को शर्म आनी चाहिए कि किसान जिसे हम ‘अन्नदाता’ कहते हैं, उसकी आय चपरासी की आय के बराबर भी क्यों नहीं है।
– देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ
बातचीत: पवन
…और यह है अगला मुद्दा
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