अर्थव्यवस्था में जारी उथल पुथल और कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग ने लगभग सभी उद्योगों की कमर तोड़ दी है।
एयरलांइस जगत भी इससे अछूता नहीं रह पाया है, जहां की आधे से अधिक परिचालन लागत एविएशन टरबाइन फ्यूल या एटीएफ पर निर्भर करती है। ऐसी आशंका है कि इस वर्ष एयरलाइंस उद्योग को 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। विमान कंपनियों के आकार और एयरलाइन प्रमोटरों की वित्तीय क्षमता को देखते हुए यह आंकड़ा अपने आप में बहुत बड़ा है।
खासतौर पर तब जब कि इनमें से अधिकांश कंपनियों का एकमात्र कारोबार यही है और उनके पास कमाई का कोई और साधन मौजूद नहीं है। जिनके पास पैसे कमाने के दूसरे स्त्रोत भी हैं, जैसे गो एयर का उदाहरण ले लें तो भी उन्हें विचार करना होगा कि क्या वे आय के दूसरे स्त्रोतों से पैसे जुटाकर जोखिम वाले जगह पर लगाएंगे। सरकार के स्वामित्व वाली एयरलाइंस कंपनी एयर इंडिया के लिए भी हालात कुछ खास अच्छे नहीं हैं। कंपनी को पिछले साल 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है और वर्तमान में कंपनी पर करीब 10,000 करोड़ रुपये का कर्ज है।
एयरलाइंस कंपनियों के साथ साथ नागरिक विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल भी लगातार यह कहते आए हैं कि विमान कंपनियों के घाटे की सबसे बड़ी वजह एटीएफ की बढ़ी हुई कीमतें हैं। अन्य देशों की तुलना में भारत में एटीएफ की कीमत और अधिक है। यह काफी हद तक सही भी है, पर लगता नहीं कि मौजूदा हालात में वित्त मंत्री इन कंपनियों की गुहार पर बहुत अधिक ध्यान देने के मूड में होंगे। अगर वित्त मंत्री अभी इस स्थिति में होते कि वह पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले कर को 5,000 करोड़ रुपये तक कम कर सकते थे तो निश्चित तौर पर उनकी पहली पसंद एटीएफ तो नहीं होती।
इसकी बजाय वह दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर से कर को कम करते क्योंकि आगामी चुनावों के मद्देनजर उनके लिए विमान यात्रियों को खुश करने से ज्यादा बेहतर होता कि वे आम लोगों को खुश करें। इधर राज्य सरकारों ने भी एटीएफ पर लगने वाले बिक्री कर को कम करने का इरादा छोड़ दिया है। यह अलग बात है कि दो राज्य बिक्री कर को कम कर चुके हैं पर उनमें से एक केरल फिर से कर को बढ़ाने का मन बना रही है। ऐसे में एयरलाइंस कंपनियों के पास एक ही विकल्प बचता है कि वे अपने खर्चे को कम करें और टिकटों के दाम बढ़ाएं।
कुछ कदम तो उठाए भी जा चुके हैं जैसे किराया बढ़ाना, उड़ानों की संख्या घटाना, महंगे विदेशी पायलटों को बाहर का रास्ता दिखाना। भले ही एयरलाइंस कंपनियां पहले ही किराया बढ़ा चुकी हैं पर माना जा रहा है कि यह कम है और जल्द ही इसमें और बढ़ोतरी होगी। किराया बढ़ाए जाने का एक सीधा सा असर यह होगा कि ऐसे यात्री जो पहली बार हवाई यात्रा की तैयारी में थे, उन्हें अपना मन बदलना होगा। पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यही वे लोग हैं जिन्होंने पिछले तीन-चार सालों में भारतीय विमान उद्योग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।