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इंसाफ के तमाम रास्ते

Last Updated- December 07, 2022 | 5:02 PM IST

न्याय पाने के कई रास्ते हैं, यह अलग बात है कि इनमें से कुछ रास्ते तय करने में समय कम लगता है और कुछ में ज्यादा।


हक की लड़ाई लड़ने के लिए अगर उच्च या उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर की जाए तो यह रास्ता छोटा भी होता है और खर्च भी कम होता है। यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की कोशिश यही होती है कि वे रिट याचिकाओं को उच्च और उच्चतम न्यायालय में ले जा सकें।

जनहित रिट याचिकाएं जितनी अधिक तादाद में दाखिल की जा रही हैं उनसे लोगों की इस तरह की मनोवृत्ति का पता चलता है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दो फैसले दिए हैं उनसे लोगों के इस रुझान को ही बल मिलता है। इनमें से पहला मामला कपिला हिंगोरानी बनाम बिहार राज्य का है जिसमें बिहार हिल एरिया लिफ्ट इरीगेशन कॉरपोरेशन (भालको) के कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर फैसला सुनाया गया था।

दरअसल मामला यह था कि 2000 में बिहार राज्य के बंटवारे के बाद नए राज्य झारखंड का गठन हुआ और इस तरह भालको का भी बंटवारा हो गया। झारखंड में झारखंड हिल एरिया लिफ्ट इरीगेशन कॉरपोरेशन (झालको) का गठन किया गया। दोनों ही राज्यों में सार्वजनिक उपक्रमों का हाल बेहाल है और कुछ इसी तरह झालको और भालको भी वित्तीय रूप से खस्ताहाल थे।

इन इकाइयों में अधिकांश कर्मचारियों को सालों से वेतन नहीं दिया गया था और इसी वजह से कई भुखमरी के शिकार हो गए थे और कुछ ने जिंदगी से तंग आकर खुदखुशी कर ली थी। इसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई और अदालत ने आदेश दिया कि कर्मचारियों को वेतन भुगतान के लिए एक फंड तैयार किया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों राज्यों से कहा कि कर्मचारियों को लेकर उठ रहे विवादों को मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए सुलझाया जाए। अदालत ने यह भी साफ किया कि वह दोनों राज्यों को यह निर्देश नहीं दे रही है कि पीएसयू के कर्मचारियों को वेतन मुहैया कराना उनका दायित्व बनता है, बल्कि वह केवल इतना कहना चाह रही है कि, ‘कर्मचारियों का भी मानवीय अधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत वेतन पाना उनका मौलिक अधिकार भी है और राज्यों को चाहिए कि वे कर्मचारियों के इस अधिकार की रक्षा करें।’

अदालत के इस फैसले के पीछे उसकी जो भी मंशा रही हो पर दोनों ही राज्य बड़ी ही आतुरता के साथ अदालत को यह समझाने में जुटे हुए थे कि वे कर्मचारियों की भलाई के लिए यथासंभव प्रयास कर रहे हैं और पूरी कोशिश में हैं कि उन कर्मचारियों को राज्य की इकाइयों में भर्ती किया जा सके। कर्मचारियों को राहत प्रदान करने के लिए जो भी कदम उठाए जा रहे हैं और प्रयास किए जा रहे हैं, उस पर उच्चतम न्यायालय लगातार निगरानी रखे हुए है।

वहीं दूसरी ओर झारखंड उच्च न्यायालय में भी एक मामला चल रहा है जो राज्य की इकाइयों में कर्मचारियों की पुनर्नियुक्ति को लेकर है। प्रभावित कर्मचारियों ने अपने हक की लड़ाई के लिए उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की थी। उच्चतम न्यायालय ने हाल के एक आदेश में उच्च न्यायालय से कहा है कि वह जल्द से जल्द रिट याचिका पर सुनवाई कर फैसला सुनाए और कर्मचारियों को फिर से नियुक्त करने और बकाया वेतन का मसला सुलझाए।

इन मामलों से ठीक उलट एक ऐसा मामला भी था जिसमें उच्चतम न्यायालय का फैसला कर्मचारियों के खिलाफ गया। कर्मचारियों ने अदालत से पुनर्नियुक्ति की मांग की थी। मामला उत्तर प्रदेश की खस्ताहाल इकाई का था (उत्तर प्रदेश बनाम यूपी राज्य खनिज विकास निगम समिति)। अपने गठन के साथ ही राज्य की यह इकाई घाटे में चलने लगी और उसने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी की योजना बनाई।

ऐसे में कर्मचारियों ने मांग की कि उन्हें राज्य सरकार की दूसरी इकाइयों और विभागों में नियुक्त किया जाए। इस मांग को देखते हुए निगम ने इन कर्मचारियों को निकाला तो नहीं, पर उनके भविष्य को अधर में लटका दिया। कर्मचारियों ने अपने हक के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की। राज्य सरकार ने यह कह कर आपत्ति जताई कि जब श्रम कानूनों के तहत कर्मचारियों के हक का उल्लेख किया गया है तो उन्हें रिट याचिका दायर करने की क्या जरूरत थी।

यहां तक कि इस मामले की सुनावई कर रहे उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों के बीच भी इस बात को लेकर मतभेद था कि औद्योगिक कानून के तहत कर्मचारियों के हक के लिए वैकल्पिक व्यवस्था है तो ऐसे में रिट याचिका दायर करना कितना सही है। हालांकि बाद में जिस तीसरे न्यायाधीश को यह मामला रेफर किया गया था, उन्होंने स्थिति को साफ करते हुए कहा कि ऐसे मामले में रिट याचिका दायर की जा सकती है।

अदालत ने फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को यह आदेश दिया कि वह कर्मचारियों को फिर से भर्ती करें। दूसरे न्यायाधीश ने राज्य सरकार के इस भरोसे पर विश्वास कर लिया कि वह कर्मचारियों को नियुक्त करने की पूरी कोशिश करेगी। इधर राज्य सरकार ने अदालत के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील कर दी।

उच्चतम न्यायालय का इस बारे में कहना था कि अगर ऐसा कोई मामला आए जिसमें दोनों ही पक्षों की ओर से तथ्यों पर आधारित परस्पर विरोधी दावे पेश किए जा रहे हों तो ऐसे में फैसला देने का अधिकार उस मशीनरी का है जिसका गठन औद्योगिक कानून के तहत किया गया है। औद्योगिक विवाद कानून, वेतन भुगतान कानून और दूसरे ऐसे कुछ कानून हैं जिनमें ऐसे मामलों के निपटारे का प्रावधान है।

साथ ही संविधान के अनुच्छेद 309 में भी ऐसे नियम हैं जिनमें कर्मचारियों की फिर से भर्ती का उल्लेख है। इस वजह से ऐसे मामलों की सुनवाई रिट अदालत के बजाय औद्योगिक ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए। ये कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो पहले से बनाए जा चुके हैं।

फिर भी जब कभी ऐसा होता है कि कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जाता और वे भुखमरी के कगार पर पहुंच जाते हैं या फिर आत्महत्या की कोशिशें करने लगते हैं तो ऐसे समय में अदालत के सामने यह समस्या खड़ी हो जाती है कि आखिर वह किसे अपनाएं- कठोर कानून को या फिर कर्मचारियों के हित को? अक्सर कहा जाता है कि प्रक्रियाएं न्याय के गुलाम की तरह होती हैं। यही वजह है कि इन मामलों की सुनवाई रिट अदालतों में न होकर औद्योगिक ट्रिब्यूनल में ही की जानी चाहिए।

First Published - August 15, 2008 | 3:45 AM IST

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