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बिन बिजली सब सून

Last Updated- December 07, 2022 | 4:40 AM IST

हर कोई जानता है कि आज भारत बिजली की जबरदस्त किल्लत से जूझ रहा है। ऐसे में आग में घी का काम किया है कंसल्टिंग फर्म मैकेंजी की एक रिपोर्ट ने।


छह महीने की मेहनत के बाद बनाई गई इस रिपोर्ट के मुताबिक अगर मुल्क को विकास के मामले में अगले 10 सालों तक कम से कम आठ फीसदी से तरक्की करनी है तो हमें अपनी बिजली उत्पादन की क्षमता को तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा।

मतलब तेज विकास के लिए हमें अपनी 1.2 लाख मेगावॉट की मौजूदा क्षमता को बढ़ाकर कम से कम 3.15-3.35 लाख मेगावॉट करना पड़ेगा। यह जरूरत सरकारी अनुमानों से अब भी तीन गुना ज्यादा है। मैकेंजी ने ऊर्जा की इतनी बड़ी जरूरत के लिए चार वजहें बताईं हैं।

पहला तो यह कि मुल्क का विनिर्माण उद्योग पहले की तुलना में आज ज्यादा तेजी से विकास कर रहा है। फिर बढ़ते शहरीकरण की वजह से बिजली की घरेलू मांग भी बढ़ती जा रही है। साथ ही, सरकार के ग्रामीण विकास के लिए चलाए जा कार्यक्रमों की वजह से इन इलाकों को भी बिजली की जरूरत होगी। आखिरकार बिजली का उत्पादन बढ़ने से इसकी मांग भी तो बढ़ेगी। 

मैकेंजी के इन आकंड़ों को गलत नहीं ठहराया जा सकता। अगर हम आठ फीसदी की रफ्तार से हर साल विकास भी करेंगे तो चक्रवृध्दि दर से हम 10 सालों में 116 फीसदी विकास कर चुके होंगे। हम मैकेंजी का यह तर्क भी मान लें कि जितना हमें तेज विकास करना है, उतनी ही बिजली की हमें जरूरत पड़ेगी। इस हालत में भी हमें 2.6 लाख मेगावॉट बिजली चाहिए होगी।

उसमें अगर आज की बिजली की कमी को भी जोड़ दें, तो हमें तीन लाख मेगावॉट से ज्यादा की बिजली की जरूरत पड़ेगी। सबसे बड़ी दिक्कत मौजूदा बिजली उत्पादन को बढ़ाने की क्षमता में कम से कम पांच गुना इजाफा करने का है। पिछले 10 सालों में हम बिजली उत्पादन में केवल 20 हजार मेगावॉट का इजाफा कर पाए हैं। मतलब हर साल औसतन केवल चार हजार मेगावॉट।

11वीं पंचवर्षीय योजना में बिजली उत्पादन क्षमता में 78 हजार मेगावॉट को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। अगर इस लक्ष्य को हासिल कर लिया गया तो देश की बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़कर दो लाख मेगावॉट हो जाएगी। इसका मतलब हमें उसके बाद के पांच सालों में बिजली उत्पादन क्षमता में 1.35 लाख मेगावॉट का इजाफा करना पड़ेगा।

इसके मुताबिक 2027 तक तो हमें हर साल अपनी बिजली उत्पादन क्षमता में 40-50 हजार मेगावॉट का इजाफा करना पड़ेगा।  इस काम के लिए 600 अरब डॉलर की मोटी-ताजी रकम की जरूरत पड़ेगी। लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि क्या भारत सरकार के पास इतने भरोसेमंद प्रोजेक्ट हैं, जिन्हें वह प्राइवेट सेक्टर को सौंप सकती है।

अपने देश मे एक पॉवर प्लांट लगाने में कम से कम पांच से छह साल लगते हैं। वहीं चीन में यह काम आधे से भी कम वक्त में हो जाता है। साथ ही, यहां भूमि अधिग्रहण भी एक भारी मुसीबत है। कोयले भी पॉवर प्लांटों की जरूरत के हिसाब से नहीं हो रहा। साथ ही, बिजली की चोरी एक बड़ी दिक्कत है।

First Published - June 8, 2008 | 11:16 PM IST

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