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संभावनाओं की राजनीति के सम्राट हैं अमर सिंह

Last Updated- December 07, 2022 | 10:43 AM IST

संभावनाओं की राजनीति के सम्राट निस्संदेह अमर सिंह हैं। पिछले एक सप्ताह में संभावनाएं ही संभावनाएं दिख रही हैं। सबसे पहले समाजवादी पार्टी की फिर सत्ता की राजनीति में लौटने की संभावना।


2007 के विधान सभा चुनाव में सपा को वोटों का लगभग उतना ही हिस्सा मिला था जितना 2004 में था। लेकिन सीटें बहुत घट गई थीं। नतीजतन बहन जी मायावती सरकार बनाने में सफल हो गईं – और कोई ऐसी वैसी सरकार नहीं पुख्ता बहुमत की सरकार।

इससे सपा, मुलायम सिंह और अमर सिंह के राजनीतिक हस्तक्षेप पर बहुत हद तक अंकुश लग गया। आप रैली निकाल सकते हैं, सभाएं कर सकते हैं और जाति की राजनीति के चलते उन जातियों की तरफ ढाढ़स का हाथ बढ़ा सकते हैं जो नई अवस्था में स्वयं को बेबस और शक्तिहीन मानती है। लेकिन इससे ज्यादा करना संभव नहीं है क्योंकि सत्ता की बागडोर किसी और के हाथ में है। इस सप्ताह पहली बार सपा में आशा की हिलोर आ गई है।

अचानक विधायक नारा लगा रहे हैं, ‘जागो भारत जागो’ सपा ने 22 जुलाई के शक्ति प्रदर्शन के लिए पूरी तैयारी कर ली है-वे सबसे खबर ले रहे हैं और सब को खबर दे रहे हैं, लेकिन सबकी खबर ले भी रहे हैं। किसी को जरा भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए 22 जुलाई को जब सांसद मत विभाजन के लिए अपनी सीटों पर लगा बटन दबाएं और उसमें कई ऐसे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सांसद भी होते हैं जो सरकार के पक्ष में वोट देते दिखें। संभावनाओं की राजनीति का एक नया अध्याय केवल सपा को ही नहीं सभी को शुरू होता हुआ दिख रहा है।

सवाल यह है कि सशक्तिकरण के अलावा, सपा को सरकार को सर्मथन देने से क्या मिलने वाला है? अमर सिंह कहते हैं कि राष्ट्र हित के चलते उन्होंने वाम दलों से पल्ला झाड़कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से हाथ मिला लिया है। लेकिन राष्ट्र हित बहुउद्देशीय संज्ञा है। राष्ट्र हित में बहुत सी बातें आ जाती हैं जैसे अर्थव्यवस्था के वे सुधार जो अधूरे रह गए थे। वामदल इन्हें रोके हुए थे। संभावना साफ दिख रही है कि यह सुधार आगे बढ़ेंगे और सरकार इन्हें तेजी से पारित करेगी। इससे व्यवस्था में नई ऊर्जा की वजह से सब को लाभ दिख रहा है। अमर सिंह और सपा के सहयोगियों को भी।

एक संभावना यह भी है कि कांग्रेस और सपा के नूतन स्नेह और मधुरता के इस दौर को समाप्त होने में उतना ही कम समय लगे जितना इसे पनपने में लगा है। राष्ट्रहित का क्या है- कभी भी कुछ भी हो सकता है। उस स्थिति में राष्ट्र की राजनीति की परिकल्पना कुछ और ही होगी। फिलहाल, व्यापार जगत में खींचतान लगी है उनमें जो अपने आप को सपा के शुभचिंतक मानते हैं और उनमें जो शुभचिंतक बनना चाहते हैं। मान लीजिए आगामी लोकसभा चुनाव के बाद ऐसी स्थिति आती है जहां न संप्रग सरकार बना सकता है न भारतीय जनता पार्टी और न उसके सहयोगी।

तब जो खटास सपा और वाम दलों में इधर कुछ दिनों में आ गई है वह बरकरार रहेगी? लेकिन उस समय राष्ट्रहित कुछ और होगा-उसकी परिभाषा बदल सकती है। यह सब छोड़िए-आगामी छह महीनों में क्या दिखेगा? कम से कम सरकार में नई स्फूर्ति, फिर शायद मंत्रिमंडल में फेरबदल जिसमें सपा के कुछ सांसद मंत्रीपद पा जाएं। सरकार ऐसा चाहेगी क्योंकि इससे स्थायित्व मिलता है संप्रग को। हां, यह जरूर है कि व्यापार जगत बेधड़क सत्ता के गलियारे में आ जाएगा, लेकिन क्या आज ऐसा नहीं है? आज लुक छिप कर होता है, तब डंके की चोट पर होगा।

आने वाले राज्य विधान सभा के चुनावों में (जम्मू कश्मीर, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और दिल्ली) में से कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जहां कांग्रेस और सपा में किसी तरह की तनातनी है। आज की तारीख में सपा एक ऐसा दल है तो राजनीतिक सार्थकता ढूंढ रहा है। यदि कांग्रेस इसका चयन और नेतृत्व ठीक से करती है तो सपा आगे भी एक अच्छा मित्र साबित हो सकता है। दुश्मनी हो सकती है तो एक मुद्दे पर- अमर सिंह के मित्रों को लेकर। उन्होंने कई मुद्दे उठाने शुरू कर दिए हैं जिनसे कहते हैं कि कांग्रेसियों को काफी उलझन हो रही है।

ये मुद्दे सीधी तरह से अमर सिंह के मित्रों के आर्थिक हितों से जुडे हैं। सरकार यदि इन्हें नहीं मानती है तो अमर सिंह का मान नहीं रह जाता है। यदि मानती है तो यह सिद्ध हो जाएगा कि पहले एक गुट के आर्थिक हितों को लेकर सरकार नीतियां अपना रही थी, अब दूसरे गुट के। इस समस्या का क्या समाधान है सपा और अमर सिंह दूध पीते बच्चे नहीं हैं। वे समझते हैं कि सरकार एक सीमा से आगे नहीं जा सकती है। लेकिन सरकार को इसका खुलासा उनके सामने कर देना चाहिए।

यह जरूरी है, क्योंकि हम एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहे हैं जिसके लिए मान सम्मान बेहद मायने रखता है। 39 सांसद लेकर 4 साल सपा अंगूठा चूसती रही, सिर्फ इसलिए क्योंकि अमर सिंह और मुलायम सिंह का तथाकथित अपमान हुआ 10 जनपथ पर ही जब 2004 में सोनिया गांधी ने चाय पार्टी पर आमंत्रित नहीं किया। अपने बारे में अमर सिंह कहते हैं कि वे मुलायम सिंह तक का साथ छोड़ देगें लेकिन अपमान नहीं सहेंगे। इसे आप सामंतवादी मूल्य माने या बेवकूफी लेकिन है ऐसा ही। इसलिए सपा से कांग्रेस किस तरह से पेश आती है, इसमें है दोनों के बीच रिश्ते संभालने और निभाने का गुर। सपा कांग्रेस का सबसे बड़ा मित्र हो सकता है या फिर सबसे बड़ा दुश्मन।

First Published - July 11, 2008 | 11:02 PM IST

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