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सरकारी मूंछों की लड़ाई में पिसती एक संस्था

Last Updated- December 07, 2022 | 3:40 AM IST

राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक बेहतरीन पहल थी। इसका मकसद देश के 60 फीसदी कृषि भूमि (जो सिंचाई के लिए वर्षा पर आश्रित है) पर खेती को फिर से फायदे का सौदा बनाने का था।


इससे इन खेतों के जरिये अपना गुजर-बसर करने वाले किसानों की दशा को सुधारने का वादा किया गया था। इसकी घोषणा 2005 में स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में की थी, जबकि इसके बारे में अधिसूचना नंवबर 2006 में जारी कर दी गई।

हालांकि, बड़ी उम्मीद के साथ स्थापित हुए इस प्राधिकरण से लोगों को नाउम्मीदी ही मिली है। आलम यह है कि यह प्राधिकरण अभी तक अपना काम शुरू भी नहीं पाया है। वजह है, मृदा और जल संरक्षण के मुद्दे पर इसकी कई मंत्रालयों के बीच चल रही खींचतान। साथ ही, यह खुद कृषि मंत्रालय के अंदरूनी कलह का भी शिकार हो रहा है।

कृषि मंत्रालय का कोई भी विभाग प्राधिकरण के लिए अपने अधिकार छोड़ने के वास्ते तैयार नहीं है। इस वजह से यह अपने बूते पर इस वक्त कुछ भी कर पाने की हालत नहीं है। आज तक इसकी हैसियत, अधिकार और कार्यक्षेत्र की छोड़िए, अभी तक यह फैसला नहीं हो पाया है कि यह प्राधिकरण काम कैसे करेगा। इसकी परिकल्पना की गई थी एक एजेंसी के रूप में, जो अलग-अलग मंत्रालयों के वर्षाजल प्रबंधन कार्यों का संयोजन करेगा और इसका इस्तेमाल किसानों के फायगे के लिए करेगा।

लेकिन नतीजा निकाला, ढाक के तीन पात। एनएआरआर के साथ आज कृषि मंत्रालय के विभाग सौतेली औलाद की तरह बर्ताव कर रहे हैं। आलम यह है कि इसके पास अपना काम करने के लिए न तो पूरा स्टाफ है और न ही पूरा पैसा। इस सौतेले बर्ताव की बानगी आपको इस साल बजट में इसे मिली रकम के आवंटन में मिल सकती है।

इसके लिए वित्त मंत्रालय ने इस साल खास तौर पर 100 करोड़ रुपये दिए थे। इसमें से 98.5 करोड़ रुपये की मोटी ताजी रकम तो कृषि विभाग ने खुद के वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास कार्यक्रम (आरएपीडी) में डाल दिए। इस वजह से प्राधिकरण के पास बचे केवल 1.5 करोड़ रुपये।  इस बात का अभी तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है कि क्यों आरएडीपी को प्राधिकरण को अभी तक नहीं सौंपा गया है।

इससे भी बुरी हालत यह है कि इतनी छोटी सी रकम का इस्तेमाल भी प्राधिकरण अपनी इच्छा के मुताबिक नहीं कर सकता। उसे अपने प्रस्ताव को अमली जामा पहनाने के लिए कृषि विभाग से इजाजत लेनी पड़ती है। दूसरी तरफ, कृषि विभाग के बर्ताव के पहले ही बताया जा चुका है। साथ ही, प्राधिकरण में 52 अधिकारियों के पद बनाए गए हैं, जिनमें केवल 10 पर ही सचमुच के अधिकारी दिखते हैं। इसमें भी अधिकारियों को कृषि विभाग से ही अधिकारियों को चुना गया है।

चूंकि, इन अधिकारियों को उनकी तनख्वाह भी कृषि विभाग से ही मिलती है, इसलिए जाहिर सी बात है कि उनकी वफादारी भी अपने पुराने विभाग के साथ ही होगा। इस मामले को कृषि पर संसद की स्थायी समिति को काफी गंभीरता के साथ लिया है। उसने इन बातों और वर्षा सिंचित क्षेत्र की उपेक्षा पर गहरी नाराजगी जताई है। उसका कहना है कि वर्षा सिंचित क्षेत्रों की उपेक्षा लाखों लोगों के बीच असंतोष और नक्सलवाद के फैलाव ही असल वजहों में एक है।

वैसे, वर्षा सिंचित खेती की अहमियत काफी ज्यादा है। ऐसा इसलिए क्योंकि नहरों और सिचांई के दूसरे स्रोतों तक पहुंच रखने वाली भूमि के लिए भी वर्षा काफी जरूरी होती है। आज की तारीख में जल प्रबंधन गतिविधियों को कई मंत्रालय अंजाम देते हैं। कृषि, ग्रामीण विकास, जल संसाधन व पर्यावरण और वन मंत्रालय तो खास तौर पर इस काम को अंजाम देते हैं।

दरअसल, ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास तो इस बाबत सबसे पैसे आते हैं। इस बारे में सबसे ज्यादा काम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम के तहत किया जाता है। हालांकि, कृषि मंत्रालय को छोड़कर किसी और मंत्रालय के पास वर्षा जल प्रबंधन कार्यक्रमों को डिजाइन करने के लिए तकनीकी ज्ञान नहीं हैं। इसलिए तो प्राधिकरण को इसी के तहत रखा गया था।

गौरतलब है कि सरकार द्वारा गठित 36 से ज्यादा प्राधिकरण, बोर्र्ड और कमीशन काम करने को लेकर काफी स्वायत्ता मिली हुई है। एनएआरआर के मामले में भी इसके गठन के समय प्रधानमंत्री ने कहा था कि इसके पास भी स्वायत्ता मिलनी चाहिए। लेकिन उनका यह बयान हकीकत से कोसों दूर है। इसे गठित करने की योजना में इसके लिए एक तकनीकी विशेषज्ञ को सीईओ की कुर्सी पर बिठाने की बात थी।

साथ ही, इसके लिए एक पूर्णकालिक सचिव भी रखने का प्रस्ताव था। इन्हीं वजहों से इसे काफी महत्व दिया जा रहा था, लेकिन इन्हीं बातों ने उसका कबाड़ा निकाल दिया। सचिव की कुर्सी पर किसी आईएएस अधिकारी को बिठाने की बात थी, जबकि सीईओ की कुर्सी पर किसी तकनीकी विशेषज्ञ की बात नौकरशाहों के गले से नीचे नहीं उतरी। इसे एनएआरआर का विभाग और मंत्रालयों से सहयोग की राह में रोड़े के रूप में देखा गया।

ऐसे हाल में बेहतर होगा अगर इसे एक अलग संस्था बना दिया जाए या प्रधानमंत्री कार्यालय या फिर योजना आयोग के तहत डाल दिया जाए। इस वजह से यह सभी मंत्रालयों और सरकार के विभिन्न हिस्सों ठीक तरीके से संयोजन कर पाएगा। इससे यह अपने उस काम को ठीक तरीके से कर पाएगा, जिसके लिए इसका जन्म हुआ है। 

First Published - June 4, 2008 | 8:45 PM IST

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