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…और महंगाई के आंसू बहाएंगे निवेशक

Last Updated- December 06, 2022 | 11:04 PM IST

बेयर स्टीयन्स मामले की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि दुनिया भर के वित्तीय बाजारों के लिए बढ़ती महंगाई दर (मुद्रास्फीति) के रूप में एक दफा फिर से बड़ा खतरा पैदा हो गया है।


तेल और अनाजों की बढ़ती कीमतों को लेकर निवेशकों में चिंता की लहर दौड़ रही है। कच्चे तेल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल पर चली गई है और कमोडिटी (जिसमें कृषि पदार्थ, धातु आदि शामिल हैं) की कीमतों के कुलांचे भरने से निवेशकों की परेशानी शायद अपने परवान पर है। खासतौर पर उभरते बाजारों के निवेशकों के बारे में तो यह बात साफ तौर कही ही जा सकती है।


महंगाई दर के बारे में निवेशकों की चिंताओं को समझा जाना लाजिमी है। इतिहास भी इस बात का गवाह है कि ऊंची महंगाई दर का वातावरण वित्तीय परिसंपत्तियों के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ है।


यदि आप वर्ष 1969 के आखिर से लेकर वर्ष 1979 के आखिर तक की अवधि (जिस दौरान महंगाई दर काफी ज्यादा थी और उसमें लगातार इजाफा दर्ज किया गया था) पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि अमेरिकी और ब्रिटिश बाजार में इक्विटी ने निवेशकों को नकारात्मक वास्तविक प्रतिफल दिया था। अमूमन इक्विटी का रिटर्न बॉन्ड के मुकाबले बेहतर होता है, पर इस अवधि में ऐसा भी नहीं पाया गया था।


ऐसा नहीं था कि कॉरपोरेट जगत के खराब प्रदर्शन की वजह से इक्विटी के जरिये सही रिटर्न हासिल नहीं हो पा रहा था, क्योंकि इस पूरी अवधि में उद्योग जगत की आमदनी में बढ़ोतरी (रीयल टर्म्स में) दर्ज की गई थी। दरअसल, ऊंची महंगाई दर उस वक्त हासिल होने वाले प्रॉफिट पर भारी पड़ रही थी। कारोबारी भाषा में कहें तो निवेशकों को हासिल होने वाले खराब रिटर्न की वजह पीई रेश्यो पर दबाव का कायम होना था।


किसी कंपनी के एक शेयर के लिए निवेशक द्वारा दी जाने वाली कीमत और कंपनी को प्रति शेयर होने वाले मुनाफे के अनुपात को पीई रेश्यो यानी प्राइस टु अर्निंग रेश्यो कहा जाता है। पीई रेश्यो के ज्यादा होने का मतलब यह होता है कि निवेशक द्वारा हासिल किए जाने वाले प्रति यूनिट मुनाफे के बदले उसे ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। मिसाल के तौर पर, एसऐंडपी 500 का पीई रेश्यो 70 के दशक के शुरू में 16 था, जो इस दशक के अंत में 7 के आसपास आ गया।


इक्विटी के लिए सकारात्मक वास्तविक रिटर्न दे पाना नामुमकिन होता है, जब पीई रेश्यो के मोर्चे पर इस तरह का दबाव हो। महंगाई की दर और पीई रेश्यो में नकारात्मक रिश्ता होता है। यानी यदि महंगाई की दर कम होगी, तो पीई रेश्यो ज्यादा होगा और महंगाई की दर के ज्यादा होने की स्थिति में पीई रेश्यो के कम होने के आसार रहते हैं। आखिर पीई रेश्यो पर इस तरह का दबाव क्यों आता है और यह ढांचागत क्यों है?


इसकी एक साफ वजह यह है कि ऊंची महंगाई दर की वजह से ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती है, क्योंकि देशों के केंद्रीय बैंकों पर यह दबाव होता है कि वे बढ़ती महंगाई दर पर नकेल कसने के लिए कड़ी मौद्रिक नीति लागू करें। बढ़ती ब्याज दरों से पूंजी जुटाने की लागत बढ़ जाती है और ऐसे में कंपनियों को अपने पीई रेश्यो को एडजस्ट करना पड़ता है ताकि बाजार में उपलब्ध निवेश के दूसरे विकल्पों के मुकाबले इक्विटी में निवेश को बेहतर साबित किया जा सके।


अब पीई रेश्यो पर दबाव की दूसरी वजह की बात करते हैं। ऊंची महंगाई दर की स्थिति में आर्थिक अस्थिरता की वजह से भी पीई रेश्यो पर दबाव बढ़ता है। जब आर्थिक विकास अनिश्चितता की स्थिति से गुजरता है तो ऐसे में महंगाई दर में भी उतार-चढ़ाव जारी रहता है और कंपनियों के मुनाफे में भी उठापटक दर्ज की जाती है।


यदि ऐसे वक्त में मांग में कमी कर महंगाई दर पर काबू पाने की कोशिश की जाती है तो ऐसे में अर्थव्यवस्था के मंदी की गिरफ्त में आने का खतरा रहता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ऊंची महंगाई दर वित्तीय परिसंपत्तियों के लिए अच्छा साबित नहीं होती और इससे पीई रेश्यो पर दबाव बढ़ता है।


अब हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या हम सही में बढ़ती महंगाई दर के माहौल की ओर बढ़ रहे हैं? एक बड़ा तबका यह सोचता है कि कमोडिटी मार्केट की मौजूदा तेजी के पीछे सटोरियों का हाथ है। पर जानकारों के एक बड़े तबके की राय इससे इतर है। इस तबके का कहना है कि हाल के दिनों में कोबाल्ट, टंगस्टन, मैगनीज और दूसरी कई कमोडिटीज के वास्तविक मूल्यों में काफी इजाफा दर्ज किया गया है।


यदि कमोडिटी की कीमतों में सटोरिया उछाल है तो कॉपर और ऐल्युमिनियम जैसी ज्यादा ट्रेडिंग की जाने वाली धातुओं के मुकाबले अपेक्षाकृत कम ट्रेडिंग की जाने वाली धातुओं के वास्तविक मूल्य में इजाफा क्यों दर्ज किया जा रहा है? इन तमाम सवालों का जवाब यही है कि कमोडिटी की मांग में काफी तेजी से इजाफा दर्ज किया जा रहा है और इसकी सप्लाई उस हिसाब से नहीं की जा रही है। यह हालत कमोबेश सभी कमोडिटी की है।


इस तरह, कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से महंगाई की दर के चढ़ते पारे के कारण उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के सामने बड़ा संकट पैदा हो गया है। बढ़ी हुई कीमतों को झेल पाना ऐसी देशों की जनता के लिए काफी मुश्किल है।


हालांकि मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले दिनों में कमोडिटी (खासतौर पर तेल) की कीमतों में थोड़ी गिरावट जरूर दर्ज की जाएगी, पर इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि ज्यादातर बेसिक इनपुट की कीमतें ऊंची रहेंगी और अब इसी तरह का दौर चलेगा। वैसे देश जो तेल और दूसरी कई कमोडिटी का आयात करते हैं और जहां खपत काफी तेजी से बढ़ रही है, उनकी हालत और खराब होगी।


भारत के साथ तो एक अलग समस्या भी है। तेल और खाद जैसी कमोडिटी की बढ़ती कीमतों का बोझ यहां सरकार के वित्तीय खजाने पर पड़ता है, क्योंकि यहां इन पर जबर्दस्त सब्सिडी दी जाती है। पहले से ही बड़े राजकोषीय घाटे का शिकार बन चुके भारत के लिए अब और ज्यादा सब्सिडी दे पाना संभव जान नहीं पड़ता। लिहाजा बढ़ती महंगाई दर चिंता का विषय है, जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

First Published - May 13, 2008 | 10:37 PM IST

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