इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
ईंधन कीमतों पर बढ़ते दबाव तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को लग रहे झटकों के बीच प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों मितव्ययिता का जो आह्वान किया था उसको गलत ठहराना मुश्किल है। अन्य चीजों के अलावा उन्होंने नागरिकों से कहा था कि वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें और पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल कम करें।
उन्होंने किसानों से उर्वरक का उपयोग कम करने को कहा और कंपनियों से आग्रह किया कि वे कर्मचारियों को घर से काम करने की इजाजत दें। उन्होंने आम लोगों से भी आग्रह किया कि वे सोना खरीदना तथा विदेश यात्राओं पर जाना कम करें। जब अर्थव्यवस्था मुश्किल में हो तो स्वेच्छा से ऐसे कदम उठाना पहला उपाय है। इन उपायों के पीछे इरादा नेक है लेकिन दिक्कत यह है कि इनसे खपत के रुझान में अहम बदलाव नहीं लाया जा सकता है क्योंकि इस मांग के पीछे के कारण तो बने ही रह जाते हैं।
कृषि क्षेत्र में सुधार आवश्यक है जो बिजली, डीजल, पानी और उर्वरक के क्षेत्र में लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी का इस्तेमाल करता है। इसमें सुधार से सही मायनों में वे लाभ होंगे जो किसानों द्वारा अपनाई जाने वाली किसी भी व्यय कटौती से बेहतर होंगे। राजनीतिक कारणों से इस बात की संभावना कम ही है कि वे व्यय कटौती करेंगे। इस प्रक्रिया की शुरुआत का एक सहज तरीका होगा उर्वरक कीमतों को बाजार मूल्य तक ले जाना और सब्सिडी को प्रति एकड़ खेत के आधार पर नकद तय कर देना।
ऐसे में किसान इस पर पुनर्विचार करने पर विवश होंगे कि कितना उर्वरक प्रयोग करें। लोगों में निजी वाहनों का अधिक उपयोग करने की प्रवृत्ति है। इसका कारण सार्वजनिक परिवहन की खराब गुणवत्ता है। वर्ष 2025-26 में भारतीयों ने 2.6 करोड़ से अधिक निजी वाहन (चार पहिया और दोपहिया) खरीदे। सितंबर 2025 में माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में कटौती ने इसे और बढ़ावा दिया। इसे पिछले वर्ष के अंत तक सड़कों पर पहले से मौजूद 31 करोड़ वाहनों (दो और चार पहिया) में जोड़ दिया जाए तो गणना सरल है।
अब लगभग हर चार में से एक भारतीय की पहुंच निजी वाहनों तक है। हालांकि यह एक सरलीकरण है क्योंकि कई परिवारों के पास एक से अधिक वाहन हो सकते हैं और कुछ के पास साइकल तक नहीं है। लेकिन यह निजी परिवहन पर जोर को रेखांकित करता है। इसकी वजह है देश में सार्वजनिक परिवहन की विफलता। इसकी वजह से बीते कुछ दशकों में भारतीयों ने अधिक वाहन खरीदे हैं। मेट्रो और उपनगरीय रेलवे की वृद्धि और उपयोगकर्ताओं की मांग में तालमेल नहीं रहा है। इतना ही नहीं जब सार्वजनिक परिवहन में भारी भीड़ रहती है तब महिला कर्मी खासतौर पर भीड़ की धक्कामुक्की से बचना चाहेंगी।
पेट्रोल-डीजल के इस्तेमाल में कमी की मांग तभी कुछ असर दिखाएगी जब सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बेहतर हो। शहरों में पानी और बिजली की भी समस्या है। बेंगलूरु की अधिकांश गेटेड कॉलोनियों, मुंबई की ऊंची इमारतों आदि में पानी की मांग अक्सर टैंकर से ही पूरी होती है। बिजली के कभी गुल हो जाने के कारण अधिकांश इमारतों में डीजल जेनरेटर हैं ताकि बिजली जाने पर कम से कम लिफ्ट चल सकें। ऐसे में भला डीजल की मांग कैसे कम होगी।
अगर पानी और बिजली की विश्वसनीय उपलब्धता होती तो शायद इसमें कुछ मदद मिलती। हमारी मेट्रो और फ्लाईओवर भी इस प्रकार बने हैं कि तेल खपत अधिक होती है। दूसरे देशों में उन्हें अंडरग्राउंड बनाया जाता है ताकि पहले से मौजूद सड़क बाधित न हो। हमारे यहां इसका उलट है। घर से काम करने के लिए वाई-फाई या उच्च गुणवत्ता वाले मोबाइल इंटरनेट की आवश्यकता है।
कोविड के दौरान जब कर्मचारियों को घर से काम करना पड़ा तो यह उन लोगों के लिए ही उपयोगी था जिनका काम इंटरनेट आधारित था। परंतु दिक्कत यह है कि घर से काम को प्रभावी विकल्प बनाने के लिए उसे अधिकांश लोगों के लिए उपयुक्त बनाना होगा, न कि केवल सॉफ्टवेयर वालों के लिए। इस पर भी विचार कीजिए कि हमारे घरों में वाई-फाई कैसे आता है। यह उन तारों के जरिये आता है जो लैंपपोस्ट, वृक्षों और छतों के जरिये हमारे घर आती हैं।
इनके टूटने पर इंटरनेट बंद हो जाता है। जब तक इन तारों को भूमिगत नहीं किया जाएगा, दिक्कत बनी रहेगी। यह भी याद रखना चाहिए कि घर से काम में घर भी उतना ही जरूरी है जितना वाई-फाई। भारत में घरों की कीमतें ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों की पहुंच से बाहर हैं क्योंकि राजनेता और बिल्डर जमीन की आपूर्ति को धीमा करने के लिए नियामक अड़चनें खड़ी करते हैं ताकि किराया वसूला जा सके।
कोविड के बाद किराए भी आसमान छूने लगे। घरों की ऊंची लागत के पीछे मूल कारण जमीन के उपयोग और उपलब्धता पर भारी प्रतिबंध और नियम हैं। राजनेता (और उनके साथ खड़े अफसरशाह) जमीन की आपूर्ति पर नियंत्रण की अपनी क्षमता का इस्तेमाल करते हैं ताकि नियामक मंजूरी के लिए भारी रिश्वत वसूली जा सके और यही पैसा अक्सर वोट खरीदने और निजी संपत्ति बनाने में इस्तेमाल होता है।
सोचिए, क्यों साधारण समाधान जैसे फ्लोर-स्पेस इंडेक्स (एफएसआई) बढ़ाना जमीन की कीमतें घटा सकता है। चार एफएसआई वाला भवन दो एफएसआई वाले भवन की तुलना में दोगुने अपार्टमेंट बना सकता है। इसका मतलब है कि अगर राजनेता चाहें तो जमीन की लागत में भारी गिरावट आ सकती है। यह मान भी लिया जाए कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में सड़क जाम और बुनियादी ढांचे की सीमाओं के कारण ऊंचा एफएसआई संभव नहीं है तो भी नए उपनगरों में, जहां सड़क ढांचे की कोई सीमा नहीं है वहां घर आज की तुलना में कहीं सस्ते हो सकते हैं। लेकिन स्वार्थ वाले हित ऐसे किसी भी समझदारी भरी नियामक नीति को रोक देते हैं, जो सस्ती जमीन और इस तरह किफायती घरों की उपलब्धता बढ़ा सकती है।
कम सोना खरीदने की बात करें तो समस्या मिश्रित संकेतों की है। जब हमारा अपना केंद्रीय बैंक सोने पर बड़ा दांव लगा रहा है तब परिवारों से कम सोना खरीदने को कैसे कहा जा सकता है? जब शुल्क अपने आप घरेलू बाजार में सोने की कीमतें बढ़ा देते हैं तब सोना खरीदने वालों को कैसे यह मानने से रोक सकते हैं कि वह कभी अपनी कीमत नहीं खो सकता?
वर्ष2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने घरेलू कीमतें घटाने के लिए सोने के आयात शुल्क कम किए थे। अब मितव्ययिता की अपील करते हुए वह उल्टा कर रही है जिससे सोना निवेश के रूप में और भी आकर्षक दिखने लगा है। हमारी समस्या मितव्ययिता नहीं है क्योंकि भारतीय हमेशा खर्च करने के बजाय बचत करने की प्रवृत्ति रखते आए हैं।
लेकिन इसके लिए केवल लोगों से ईंधन बचाने, घर से काम करने या कम सोना खरीदने की अपील करना पर्याप्त नहीं है। हमें मूल समस्याओं को ठीक करना होगा। यानी सार्वजनिक परिवहन, गुणवत्तापूर्ण बिजली और पानी की आपूर्ति, विवेकसंपन्न शहरी बुनियादी ढांचा और जमीन की कम कीमतें। निश्चित रूप से, कृषि सुधार भी इसमें शामिल हैं।
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)