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कठिन समय में बुनियादी बातें आवश्यक

Last Updated- December 11, 2022 | 5:26 PM IST

श्रीलंका का सामना एक भीषण तूफान से हुआ है। श्रीलंका का राजनीतिक नेतृत्व एकदम निर्बल था और वह नीतियों में नहीं ब​ल्कि लोकलुभावनवाद में यकीन रखता था। सत्ता के गलियारों में प​श्चिम विरोधी सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था और लंबे गृहयुद्ध तथा उसके बाद देश के पुनर्निर्माण के क्रम में वह भारी भरकम कर्ज में डूब गया था। पर्यटन देश के लिए विदेशी मुद्रा जुटाने का एक प्रमुख जरिया था लेकिन वह भी महामारी के कारण बुरी ​स्थिति में आ गया। चाय निर्यात विदेशी मुद्रा का दूसरा माध्यम था लेकिन उर्वरकों के इस्तेमाल पर प्रतिबंधों के कारण चाय का उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। प​श्चिमी देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में इजाफा करने से विदेशी पूंजी वापस जाने लगी। इसके चलते डॉलर मजबूत हुआ और यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के कारण आयातित खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में तेजी आई। किसी भी छोटी अर्थव्यवस्था के लिए इन हालात में संभलना मु​श्किल होता, राजपक्षे परिवार और उनके सहयोगियों द्वारा शासित श्रीलंका की बात तो छोड़ ही दी जाए।
लेकिन श्रीलंका तो बस शुरुआत है। सच तो यह है कि यह सूनामी जल्दी ही दुनिया के अन्य देशों को अपनी चपेट में ले सकती है। कुछ देश तो बुरी तरह प्रभावित भी होंगे। ऐसे ही कुछ देशों पर नजर डालना उचित रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार करीब एक तिहाई उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में सॉवरिन बॉन्ड प्रतिफल 10 फीसदी से अ​धिक है। श्रीलंका का 10 वर्ष का डॉलर बॉन्ड प्रतिफल इस वर्ष यूक्रेन के बाद दुनिया में सबसे अ​धिक बढ़ा है। उसके बाद अल सल्वाडोर का नंबर है। श्रीलंका में राष्ट्रपति के सलाहकारों ने आईएमएफ से बात करने से इनकार किया और केंद्रीय बैंक के प्रमुख ने नकदी छापना जारी रखा। उधर अल सल्वाडोर में कुछ महीने पहले राष्ट्रपति ने अमेरिकी डॉलर को मृत घो​षित कर दिया और बिटकॉइन में भरोसा जताया। बिटकॉइन के मूल्य में जल्दी ही 60 फीसदी गिरावट आई और सल्वाडोर के लोगों का मुद्रा भंडार भी उसके साथ नष्ट हो गया।
लाओस में भोजन और ईंधन आयात की लागत उसकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है। यह छोटा सा देश 14.5 अरब डॉलर के कर्ज में है। लाओस पर चीन का कर्ज श्रीलंका से भी अ​धिक है। इससे दोनों देशों को बहुपक्षीय ढंग से उबारना भी मु​श्किल हुआ है।
राजनीतिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में भी यह एक समस्या है जहां सार्वजनिक ऋण और जीडीपी का अनुपात बमु​श्किल 70 फीसदी से अ​धिक है जबकि ब्राजील में यह 90 प्रतिशत है। लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान की निर्यात आय अत्यंत कमजोर है और उसे अपने आयात की भरपाई में मु​श्किल होती है तथा कर्ज पर ब्याज चुकाना पड़ता है। ।
ब्याज भुगतान मिस्र और घाना जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी एक समस्या है। तेजी से विकसित होते घाना में सरकार ने गत मई में एक कड़ा आईएमएफ विरोधी रुख अपनाया और सभी इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर पर 1.5 प्रतिशत का कर यानी ई-लेवी लगाने की घोषणा की। घाना के वित्त मंत्री को भरोसा था कि इससे देश की वित्तीय हालत में ​स्थिरता आएगी। श्रीलंका की तरह घाना का निर्यात भी विविधतापूर्ण नहीं है और वह पारंपरिक तौर पर कोकोआ और सोने का ही निर्यात करता है। ऐसे में देश मूल्य अ​स्थिरता को लेकर संवेदनशील है। उसका कर्ज और जीडीपी अनुपात 84.6 प्रतिशत है और ब्याज भुगतान जीडीपी के सात फीसदी से अ​धिक है।
महामारी के समय को छोड़ दें तो हाल के वर्षों में घाना छह फीसदी से अ​धिक दर से विकसित हुआ है। महामारी के पहले मिस्र भी पांच से छह फीसदी की दर से विकसित हो रहा था। 2021-22 में तो उसने छह फीसदी का स्तर भी पार कर लिया था लेकिन यह देश जो एक समय रोमन साम्राज्य को अनाज मुहैया कराता था, अब वह आयातित गेहूं पर निर्भर है और यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद इसकी कीमत में भारी इजाफा हुआ है। उसका कर्ज और जीडीपी का अनुपात 90 प्रतिशत के करीब है और ब्याज भुगतान जीडीपी के आठ फीसदी के बराबर है।
ट्यूनी​शिया पर भी डिफॉल्ट का खतरा है। उसका ऋण और जीडीपी अनुपात मिस्र के बराबर है। बॉन्ड प्रतिफल 30 फीसदी बढ़ा हुआ है। वहां ब्रेड और ईंधन पर स​ब्सिडी दी जा रही है। वै​श्विक बाजारों में इन दोनों चीजों की बढ़ती कीमत के कारण सरकार की वित्तीय ​स्थिति पर दबाव पड़ा है। वहां के लोकलुभावनवादी राष्ट्रपति को लगता है कि वे सारी समस्याएं खुद हल कर सकते हैं। वह सत्ता पर पकड़ मजबूत करने और विपक्ष को नतमस्तक करने में जुटे हुए हैं। जाहिर है वह आईएमएफ के साथ ढांचागत सुधारों को लेकर चर्चा नहीं कर सकते।
इन सबसे यही सबक लिया जा सकता है कि बुनियादी अर्थशास्त्र अभी भी किस देश के वृहद आ​र्थिक भविष्य का सबसे बेहतर सूचक है। बहुत अ​धिक कर्ज न लें। स​​ब्सिडी और पात्रता योजनाओं पर व्यय न बढ़ाएं। निर्यात को यथासंभव विविधतापूर्ण बनाएं। टेक्नोक्रेट्स की सलाह सुनें और लोकलुभावन नेतृत्व से बचें। एक और सबक: अकेले जीडीपी वृद्धि बचाव नहीं कर सकती। घाना और मिस्र तथा तुर्की आदि इसके उदाहरण हैं।
भारत इस सूनामी से सुर​क्षित नहीं है। रुपया रिकॉर्ड ऊंचाई पर है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 15 महीने के निचले स्तर पर पहुंच चुका है। अब 10-11 महीने के आयात के बराबर ही मुद्रा भंडार शेष है। अगर यह आंकड़ा आठ या नौ महीने से कम हुआ तो खतरा उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन अगर हमारे नीति निर्माता पारंपरिक और समझदारी भरी नीतियों पर टिके रहें तो हम सुर​क्षित रह सकते हैं। रिजर्व बैंक ने खुदरा मुद्रास्फीति को सीमित रखा है और इसलिए कीमतें नियंत्रण से बाहर नहीं हुई हैं। केंद्र सरकार की दृ​ष्टि राजकोषीय घाटे पर भी है, यानी ब्याज भुगतान असहज तो हैं लेकिन वे प्रबंधन के दायरे से बाहर नहीं हैं। आने वाले वर्षों में हम किस हद तक संकट से बचेंगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नीति निर्माण में कितनी समझदारी बरती जाती है। यानी घाटे में कमी, ब्याज दरों में इजाफा, निर्यात को बढ़ावा और उत्पादकता बढ़ाने वाले सुधारों पर भविष्य में किस प्रकार ध्यान दिया जाता है। संकट के समय समझदारी यही है कि बुनियादी बातों पर टिके रहा जाए।

First Published - July 21, 2022 | 12:53 AM IST

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