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जरा संभलकर रखें मुद्रा वायदा कारोबार में कदम

Last Updated- December 07, 2022 | 5:03 AM IST

हाल ही में मुद्रा वायदा के बारे में सेबी-आरबीआई ने संयुक्त रिपोर्ट जारी की। इसमें सबसे बेहतर यही है कि दोनों ने साथ मिलकर रिपोर्ट दी है।


अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है कि दोनों के बीच रिश्ते कुछ तनावपूर्ण थे और दोनों हेजिंगव्यापार के मानकों पर नियंत्रण के लिए एक दूसरे की बात काट रहे थे। लेकिन अब ऐसा हो गया है कि मुद्रा वायदा की शुरुआत रिजर्व बैंक के आशीर्वाद से और सेबी की देखरेख में होगी।

अनेक तरह से विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह बेहतरीन प्रारूप है और उम्मीद की जा सकती है कि इससे रिजर्व बैंक का बाजार पर नियंत्रण कम होगा। इससे रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति बनाते समय हर पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।

इसकी सफलता से लिए जरूरी है कि इन विशिष्ट और कठिन दिशानिर्देशों के लिए बेहतरीन समन्वय बने। वायदा अनुबंधों की सफलता या विफलता का निर्धारण करने में तरलता (लिक्विडिटी) महत्त्वपूर्ण है। ज्यादातर सौदों में एक ही सफलता मिलती है। इस तरह से यह बहुत कठिन है कि जब वायदा अनुबंधों या नियामक क्षेत्र के  अनुबंधों का निर्धारण किया जाए तो तरलता उत्पन्न करते समय एकल-क्षेत्र में ध्यान केंद्रित हो।

इन सबका महत्त्व मुद्रा बाजार में बहुत ज्यादा है, जो सामान्यत: तरल होता है, खासकर जब जिंस या ब्याज दरों के वायदा से इसकी तुलना करते हैं। वैश्विक रूप से देखें तो मुद्रा वायदा (और आप्शंस) कारोबार केवल करीब 90-100 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन है। वहीं ब्याज दरों का वायदा कारोबार 6-7 ट्रिलियन प्रति दिन आता है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि बैंक, ब्याज दर वायदा कारोबार बहुत सक्रियता से करते हैं। साथ ही वे संरचनात्मक उत्पादों के एक्सपोजर और बैलेंस शीट की हेजिंग भी करते हैं। बहरहाल बैंक मुद्रा वायदा में बहुत सक्रिय नहीं हैं, जबसे ओटीसी फॉरेक्स मार्केट के कारोबार ने तेजी पकड़ी है। इस समय इसका कारोबार 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन है, जो दुनिया का सबसे बड़ा लिक्विड मार्केट है।

उदाहरण के लिए हेजर्स अंतर्निहित जोखिम के लिए जाने जाते हैं। वे वायदा बाजार में तरलता भी ला सकते हैं। जिंस बाजारों में भी ये महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी होते हैं। बहरहाल ओटीसी फॉरेक्स मार्केट की गहराई और तरलता ही है, जिसके चलते कुछ कार्पोरेट्स, फॉरेस्क रिस्क के साथ हेजिंग के लिए इसके वायदा बाजार पर निर्भर होते हैं।

इस तरह से वैश्विक मुद्रा वायदा बाजारों में सट्टेबाजों और अंतरपणन करने वालों के चलते ही भारी मात्रा में तरलता नजर आती है। घरेलू मुद्रा वायदा कारोबार शुरू करने के लिए हमें इस बात की जरूरत है कि इस तरह की हकीकतों से वाकिफ हों। इसके साथ ही इनके प्रभावों से निपटने के लिए नियमावली तैयार करें।

भारतीय बाजारों में सट्टेबाजी के लिए ठोस प्रवृत्ति होने के बाद भी हम इससे वाकिफ हैं कि इक्विटी और कमोडिटी डेरिवेटिव्स कारोबार ने जोर पकड़ा। इसकी भी उम्मीद की जा रही है कि भारत में मुद्रा वायदा कारोबार भी जोर पकड़ेगा। ओटीसी के कुल कारोबार में वैश्विक रूप से मुद्रा वायदा का हिस्सा 3 प्रतिशत है और घरेलू ओटीसी का कारोबार 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रति दिन के करीब आता है।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि रुपये का वायदा कारोबार सफल होगा और इसका कारोबार करीब 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन के करीब होगा, जो ओटीसी के करीब 5 प्रतिशत होगा। यह प्रतिदिन के इक्विटी वॉल्यूम के करीब 40-50 प्रतिशत होगा, इस तरह से इसमें कारोबार की बेहतर संभावनाएं नजर आती हैं।

आइये हम पूरे मामले को आईएनआर फ्यूचर कांट्रैक्ट्स के कारोबारी के रूप में देखते हैं। पहली बात यह है कि कार्पोरेट सेक्टर से हम महत्वपूर्ण हेजिंग वॉल्यूम की उम्मीद नहीं कर सकते। बड़ी कंपनियां जिनके पास मजबूत कोष है, वे ओटीसी मार्केट से बैंकों की तरह ही प्रभावी तरीके से निकासी में सक्षम हैं। इसलिए उन्हें वायदा बाजार से हेजिंग करने की कोई जरूरत नहीं है।

छोटे और मध्यम आकार की कंपनियां जिनके लिए ओटीसी मार्केट तक पहुंच सीमित या खर्चीली है, वे इस तरफ आकर्षित हो सकती हैं। बैंक, जैसा कि मैने पहले भी कहा कि इस कारोबार में ज्यादा रुचि ले सकते हैं। इसके अलावा इसमें कारोबारियों और अंतरपणन करने वालों की रुचि हो सकती है। छोटी बड़ी तमाम कंपनियां हैं, जो अमेरिकी डालर  और भारतीय रुपये में कारोबार करती हैं और ये- खासकर छोटी कंपनियों के लिए वायदा बाजार लाभदायक हो सकता है।

इक्विटी मार्केट के कारोबारी निस्संदेह इसकी ओर आकर्षित होंगे। और सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि जिंस बाजार के कारोबारी, जो घरेलू और वैश्विक बाजार के कारोबार में सेतु का काम करते हैं, वे बड़ी संख्या में सामने आएंगे। बहरहाल एक बार फिर मेरा मानना है कि 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अनुमति वाला वर्तमान क्लाइंट पोजिशन लिमिट बहुत कम है।

मैं इस बात को मानता हूं कि इस मामले में नियामक, फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहता है। हकीकत यह है कि सटोरियों के बाजार में लिक्विडिटी बहुत ही जटिल होती है क्योंकि इसमें कारोबारी बहुत कम समय के लिए आते हैं और तमाम रास्तों से वे बाहर भी निकल जाते हैं।

यह जरूरी होगा कि एक्चेंज और ब्रोकर्स इसकी संरचना बहुत सावधानी से तैयार करें और लाभांशों, ब्रोकरेज और शुल्क के मामले में स्पष्ट नीति निर्धारित करें क्योंकि इस समय अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये का कारोबार मात्र 0.4 प्रतिशत है, जबकि यूरो (0.7 प्रतिशत), पाउंड (0.7 प्रतिशत), और जापानी येन (1.0 प्रतिशत) का कारोबार ज्यादा है, जहां सक्रिय और सफलतापूर्वक वायदा कारोबार होता है।

First Published - June 12, 2008 | 10:29 PM IST

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