शायद ही किसी को याद हो कि आईटीसी के शुध्द मुनाफे में पिछली बार किसी भी तिमाही के दौरान गिरावट दर्ज की गई थी। पिछले कुछ अरसे में तो ऐसा नहीं हुआ।
जून 2008 की तिमाही से पहले सिगरेट बनाने वाली इस भारी भरकम कंपनी के मुनाफे में जरा सा फर्क दिखा था, जब इसका शुध्द मुनाफा 4 प्रतिशत कम हुआ था। हालांकि यह आंकड़ा केवल 120 करोड़ रुपये था और इतनी बड़ी कंपनी एक तिमाही के दौरान केवल 120 करोड़ रुपये गंवाने पर शायद ही फिक्रमंद हो।
इस तरह के घाटे की तो उन्हें चिंता ही नहीं है क्योंकि कोई भी नया कारोबार चाहे वह खाद्य पदार्थों से जुड़ा हो या सौंदर्य प्रसाधनों से, अपनी बुनियाद जमाने में कुछ वक्त तो लेता ही है। कंपनी को असल चिंता तो इस बात की है कि उसका कारोबार उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ रहा है जिस रफ्तार की उम्मीद वह लगाए बैठी थी।
निश्चित रूप से आईटीसी का बाजार शेयर कम हुआ है और कंपनी अपने पैसे को अन्य प्रतिस्पर्धाओं- आटा, स्नैकफूड या बिस्कुट में लगाकर अपने प्रतिद्वंद्वियों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रही है। लेकिन ब्रांडेड पैकेज्ड फूड के व्यवसाय में बिक्री 23 प्रतिशत बढ़ी है और यह बाजार को देखते हुए निराशाजनक है।
यह साफतौर पर कहा जा सकता है कि इस समय उपभोक्ता को माल बेचने का आसान वक्त नहीं है। जून 2008 के तिमाही नतीजों पर एक नजर डालने पर पता चलता है कि ज्यादातर कंपनियों के मुनाफे में कुछ न कुछ हलचल जरूर रही है और कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि मांग में कोई खास गिरावट नहीं आई है।
लेकिन नजदीक से गौर करने पर पता चलता है कि उपभोक्ताओं को देखते हुए व्यवसाय का प्रसार कुछ दूसरा ही मंजर पेश करता है। उदाहरण के लिए बजाज ऑटो का राजस्व एक अंक में बढ़ा है जो बहुत कम है। इसके अलावा रिटेल का कारोबार करने वाली टे्रंट की ग्रोथ में दो अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बिक्री में केवल 7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
कुछ मामलों में तो ऐसा लगता है कि महंगाई के असर के चलते उच्च स्तर पर बढ़ोतरी नजर आती है- टाइटन की बिक्री पर सोने के दाम बढ़ने का प्रभाव पड़ा है, लेकिन मात्रा की दृष्टि से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। सन टीवी का सब्सक्रिप्सन निराशाजनक रहा है और ऐसा ही हाल जी एंटरटेनमेंट का भी है। लोगों की सोच में भी परिवर्तन आया है और वे अब टेलीविजन या मकान खरीदने के लिए बैंकों में कतार नहीं लगा रहे हैं।
आईटीसी कुछ समय के लिए तो घाटे को सहने में सक्षम है। लेकिन डाबर के कारोबार में 40 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है- यह उसके अनुमानित लाभ के 10 गुने से भी ज्यादा है- ऐसे में रिटेल नेटवर्क विकसित होना तो अलग मसला है। वहीं पर डिश टीवी के कारोबार में घाटा बढ़कर 400 करोड़ रुपये हो गया है लेकिन इसके बावजूद वह अपने सेट टॉप बाक्स में सब्सिडी जारी रखे हुए है, यह सोचने को मजबूर करता है।
मल्टीप्लेक्स का संचालन करने वाली कंपनी पीवीआर ऐसे समय में हो सकता है कि कुछ स्क्रीन बंद करने को सोच रही हो, जब मुनाफा गिर रहा है। कंपनियों के बीच ग्राहकों की संख्या बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा है और उनकी प्रसार योजनाओं के चलते उन्हें मुनाफा कम करना पड़ रहा है। यह आंशिक सच्चाई है, क्योंकि कीमतें बढ़ रही हैं और महंगे दाम पर उत्पाद या सेवाएं लेने वालों की संख्या कम ही है।
और अगर कंपनियों को अपने लागत मूल्य पर बढ़ते खर्च की भरपाई करनी है तो कीमतें तो बढ़ानी ही होंगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे नए उपक्रम स्थापित करना चाहती हैं, लेकिन शायद ऐसा संभव नहीं होने वाला है क्योंकि इसके लिए संभावनाएं नजर नहीं आतीं। निश्चित रूप से कंपनियों को अपने क्रियाकलापों में संबंधित क्षेत्रों में प्रसार करने की जरूरत है, लेकिन अभी कुछ समय के लिए वे इसे रोके रखेंगी।
जून 2008 की तिमाही में स्पष्ट होता है कि कंपनियों की बिक्री बढ़ रही है लेकिन वे अपने लाभ को नहीं बढा पा रही हैं। ऐसे में सिटी ग्रुप का एक अध्ययन महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालता है। सिटी ग्रुप के अध्ययन के मुताबिक बड़ी कंपनियां बेहतर समय के इंतजार में अभी अपनी गतिविधियों को रोके हुए हैं और उसी क्षेत्र में काम करने वाली छोटी कंपनियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
बीएसई 500 की कंपनियों को नमूने के तौर पर लें तो जून की तिमाही में उनका शुध्द मुनाफा केवल 6 प्रतिशत बढ़ा है। यह मार्च की तिमाही के 12 प्रतिशत के मुकाबले आधा है। यह छोटी गिरावट नहीं है। वहीं बड़ी कंपनियों के लेखा जोखा पर गौर करें तो उनका मुनाफा मार्च की तिमाही की तुलना में जून की तिमाही में तेजी से बढ़ा है।
ऐसे समय में यह स्थिति है जब आवश्यक वस्तुओं के दामों में बढ़ोतरी हुई है और लोग लग्जरी की चीजों पर पैसा खर्च करने पर चार बार सोचते हैं। इस तरह से देखें तो टाइटन की घड़ियों और पीवीआर थियेटरों के मुनाफे में और गिरावट आ सकती है, जबकि उनकी हालत पहले से ही खराब है। मारुति सुजूकी ने पिछले साल जुलाई में जितनी कारें बेची थीं उसकी तुलना में इस साल उनकी बिक्री में कमी आई है।
यह सब कुछ देखते हुए समय की मांग है कि कम ही पैसा खर्च किया जाए और इसे बचाना ही ज्यादा लाभदायक होगा। दुर्भाग्य से भारत अब हाई कॉस्ट इकनॉमी की ओर बढ़ रहा है, जहां चीजें महंगी हो रही हैं। रियल एस्टेट के क्षेत्र में कीमतें आसमान छू रही हैं और चीजें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं। व्यापार के प्रसार में खासी समस्या आ सकती है और इसे सहारा दिए जाने की जरूरत है।
ऐसी स्थिति में बेहतर यही होगा कि दुकानदार अपने प्रसार कार्यों को रोके रखें, रिटेलरों ने इस साल विस्तार की जो योजना बनाई थी, उसे ठंडे बस्ते में डाल दें। अरविंद मिल्स की तरह से अन्य भी अपनी योजनाओं को टाल दें जैसा कि कंपनी ने जिंस उत्पादों और वैल्यू एडेड सेगमेंट की अपनी योजना के साथ किया। समय के इस मोड़ पर योजनाओं को ठंडे बस्ते में डालने में ही भलाई है।
जी़ जैसे प्रसारणकताओं को भी अपनी योजना पर फिर से विचार करना होगा क्योंकि उसका चैनल जी नेक्स्ट 40 करोड़ रुपये के घाटे में जा चुका है। यह ऐसा समय नहीं है कि मूल्यवान संसाधनों को यूं ही गंवा दिया जाए।