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खूबसूरत आंकड़े और खौफनाक सच

Last Updated- December 07, 2022 | 4:00 AM IST

क्या विकास की दौड़ में कहीं पीछे छूट चुकी खेती फिर से फर्राटा लगाने को तैयार है?


आंकड़ों की मानें तो लगता ऐसा ही है। बीते वित्त वर्ष में कृषि की विकास दर ने 4.5 की रफ्तार से कुलांचे भरी, जबकि इसके लिए पहले केवल 2.6 फीसदी की धीमी रफ्तार की उम्मीद की जा रही थी।

इसका मतलब यह है कि पिछले तीन सालों में खेती ने 4.73 फीसदी की जबरदस्त औसत रफ्तार से तरक्की की है। हालांकि, इस बारे में कहा जा सकता है कि यह इमारत बेहद खोखली जमीन पर खड़ी की गई है। इसके लिए काफी पुख्ता कारण भी दिए जा सकते हैं। फिर भी इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पिछले चार सालों में कृषि क्षेत्र ने 3.55 फीसदी की जबरदस्त रफ्तार के साथ तरक्की की है।

इन चार सालों में 2004-05 का वह मनहूस साल भी शामिल है, जब कृषि क्षेत्र ने शून्य विकास किया था। न केवल यह आंकड़ा पिछले दशक की कृषि विकास दर से काफी ज्यादा है, बल्कि आज की तारीख में देश की जनसंख्या वृध्दि दर का भी दोगुना है। याद रहे कि 1992-2002 के दौरान कृषि क्षेत्र में केवल 2.5 फीसदी की रफ्तार से विकास हुआ था।

अहम बात यह भी है कि पिछले तीन सालों में से कोई भी वर्ष कृषि के लिहाज से मुल्क के लिए बुरा नहीं रहा। वहीं उससे पहले के आठ सालों में से पांच खेती के लिए काफी बुरे साबित हुए थे। इस वजह से मन में यह सवाल उठना तो लाजिमी ही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से खेती की दुख भरी दास्तां का सारा रुख ही बदल गया?

जिस खेती की वजह से हजारों किसानों को आत्महत्या करनी पड़ गई और 71.6 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी की घोषणा करनी पड़ी, वह कामयाबी की गाथा में कैसे तब्दील हो गई?  दुख की बात यह है कि ये आंकड़े पूरी कहानी नहीं बयां करते। वैसे, ‘खेती और उससे जुड़े कारोबारों’ के बारे में ब्योरा आना अभी बाकी है, लेकिन पूरी उम्मीद यही है कि खेती में यह तेजी संबंधित कारोबारों में हुए तेज विकास की वजह से आई है।

जरूरी अनाजों के मामले में देखें तो खेती का प्रदर्शन घटिया ही बना हुआ है। अब भी गेहूं, चावल, दाल और तिलहनों के उत्पादन ने केवल उसी स्तर को पाया है, जिस स्तर पर वे कुछ साल पहले हुआ करते थे। मिसाल के तौर पर गेहूं को ले लीजिए, जिसके 7.68 करोड़ टन के उत्पादन को लेकर कृषि मंत्रालय आज कल खुशी के मारे कूद रहा है। लेकिन 1999-2000 के 7.64 करोड़ टन के गेहूं उत्पादन को देखें तो यह आंकड़ा बस थोड़ा सा ही ज्यादा है।

चावल और दालों के मामले में भी कहानी कुछ ज्यादा जुदा नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह संबंधित कारोबारों में हुए जबरदस्त विकास की वजह से आई है।  इसे देखते हुए लग रहा है कि कृषि संकट अपनी अहमियत खोता जा रहा है। हालांकि, जब तब किसानों के आत्महत्या की खबरें आती रहती है, लेकिन मौत को गले लगाने वाले किसानों की तादाद काफी कम हो चुकी है। खाद्यान्न की कीमतों में हुए इजाफे की वजह से भी किसानों की हालत काफी सुधरी है।

First Published - June 5, 2008 | 11:22 PM IST

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