देश के कुल दूध उत्पादन का आधे से भी ज्यादा हिस्सा भैंसों से आता है। इसी वजह से तो गायों के मुकाबले इनकी काफी कम तादाद होने बावजूद भी उन्हें मुल्क के तेजी से बढ़ रहे डेयरी जगत की जान माना जाता है।
लेकिन रिसर्च के नजरिये से देखें तो उन्हें अछूत ही समझ गया है। एक तरफ जहां, गाय, सूअर और मुर्गियों को आर्थिक रूप से अहम मानते हुए उनके जीन तक की छोटी से छोटी जानकारी मौजूद हैं, वहीं भैंसों के बारे में ऐसी जानकारियों का भारी अभाव है। इसलिए इस अनूठे जानवर की उत्पादकता बढ़ाने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है, जो दूध और मांस मुहैया कराने के साथ-साथ हमारे खेतों को भी जोतता है।
भैंस की इसी अहमियत की वजह से ही तो कुछ दिनों पहले भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) ने इस मवेशी की जीन संरचना का पता लगाने के लिए एक प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। इस प्रोजेक्ट के जरिये भैंसों के जरिये मिलने वाले दूध और मांस के उत्पादन में इजाफा करने में काफी मदद मिलेगी। साथ ही, इससे उनकी प्रजनन क्षमता, ताकत और रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा करने में भी बहुत मदद मिलने की उम्मीद की जा रही है।
दरअसल, इसके जरिये वैज्ञानिकों को भैंस की जीन के एक-एक हिस्से को जानने-समझने में मदद मिलेगी। इस वजह से वैज्ञानिकों को मौका मिलेगा कि वह किसी खास जीन में फेर बदल करके खास तरह की भैंसें तैयार करने में मदद मिलेगी, जिनमें खास खूबियां होंगी। यह अपने-आप में एक बड़ी खोज होगी क्योंकि इससे भैंसों की उत्पादकता में इजाफा करने में काफी मदद मिलेगी। आईसीएआर के उप महानिदेशक डॉ. के. एम. बुजरबरुहा के मुताबिक इसकी वजह से मुल्क को कम मवेशियों से दूध और मांस का ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने में मदद मिलेगी।
इस अत्याधुनिक शोध कार्य के भैंसों के जीनों के गूढ रहस्यों को समझने में काफी मदद मिलेगी। यह शोध कार्य का जिम्मा संभाला है करनाल के नैशनल ब्यूरो ऑफ एनीमल जेनिटिक्स रिसोर्सेज (एनबीएजीआर) और हिसार के सेंट्रल इंस्टीटयूट फॉर रिसर्च ऑन बफैलोज ने। आईसीएआर के सहायक महानिदेशक टी.जे. रसूल का कहना है कि इसके अलावा चार दूसरे कोर लैब्स को भी जेनिटिक्स से जुड़े इस तरह के अत्याधुनिक काम को करने के लिए अपग्रेड किया गया है। रसूल साहब खुद इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। इस शोध कार्य के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में 7.55 करोड़ रुपये की रकम आवंटित की गई है।
भारत सरकार का बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग भी भैंसों के जीनों पर अध्ययन करने के लिए एक प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाला है। अब आप ये सोच रहे होंगे कि भैंसे पर हमें इतनी रिसर्च करने की क्या जरूरत है? आखिर जानवरों पर होने वाली ज्यादातर रिसर्च कई मुल्क साथ मिलकर करते हैं। इसमें वे सभी अपने वैज्ञानिकों और पैसे को मिलकर शोध कार्य करते हैं। दरअसल, इस बात की कई वजहें है कि हमें यह शोध कार्य खुद अपने बूते पर करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि दुनिया में और कहीं भैंसें ग्रामीण इलाकों पर इतनी अहमियत नहीं रखतीं, जितने हमारे मुल्क में रखती हैं।
असल में वे भैंसे हमारे भैंसों से काफी हद तक अलग होती हैं। वहां उनका इस्तेमाल ज्यादातर मांस और खेत जोतने में होता है क्योंकि वे काफी कम दूध देती हैं। दूसरी तरफ, हमारे मुल्क की भैंसें दूध भी अच्छी-खासी मात्रा में देती हैं। साथ ही, वे मांस और खेत जोत के मामले में भी दूसरे मुल्कों की भैंसों से किसी हालत में कमतर नहीं हैं। दुनिया के कुछ सबसे अच्छी प्रजाति की भैंसें भारत (और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों) में पाई जाती हैं।
भैंसों को पालने के मामले में हम सबसे आगे हैं। साथ ही, दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप और दक्षिण अमेरिकी मुल्कों तक को हम भैंसों के शुक्राणु मुहैया करा रहे हैं, ताकि उन देशों में भी इनका इस्तेमाल इस मवेशी की जीन को बेहतर बनाने के लिए किया जा सके। लेकिन हमारे खुद के मुल्क में इस जानवरों की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रोजेक्ट्स की तादाद न के बराबर ही है। दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए गायों की तरह भैंसों के वास्ते भी क्रास-ब्रीडिंग का रास्ता मौजूद नहीं है क्योंकि हमारे मुल्क से अच्छी भैंस कहीं और नहीं मिलतीं। चुनकर कर भैंसों का प्रजनन करने के तरीके के भी अपनी बड़ी खामियां हैं।
सबसे बड़ी खामी तो यही है कि इसमें काफी वक्त लगता है। बड़ी बात यह भी है कि उस भैंसे में अपने माता या पिता के गुण आए हैं या नहीं, इसका पता उनके पता तभी लग सकता है जब भैंस बड़े हो जाएं। इसलिए बॉयोटेक्नोलॉजी के जरिये भैंसे की उत्पादकता को बढ़ाने को ही सबसे अच्छा रास्ता माना जा रहा है। इसमें किसी खास जीन की पहचान कर उसमें बदलाव कर उत्पादकता को बढ़ाया जाता है। इससे समय भी बचता है और उत्पादकता में भी काफी इजाफा होता है। रसूल का कहना है कि, ‘अगले 10 सालों में हम भैंसों से मिलने वाले दूध की मात्रा में जबरदस्त इजाफा कर लेंगे।’
वैसे, भैंस को आर्थिक रूप से अच्छा इसलिए माना जाता है क्योंकि वह ज्यादा दूध भी देती है और उस दूध की क्वालिटी भी काफी अच्छी होती है। वह ज्यादा सफेद होता है, जबकि गाय के दूध में हल्का पीलापन होता है। साथ ही, इसमें वसा की मात्रा ज्यादा और पानी काफी कम होता है। इस वजह से दूध से बनने वाले उत्पादों के लिए इसकी खासी मांग है।
ऊपर से, इसमें गाय के दूध के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन भी होता है, जबकि कैलस्ट्रोल की मात्रा काफी कम होता है। साथ ही, भैंस के मांस को वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित माना जाता है। सूअर के मांस के मुकाबले में इसमें काफी कम वसा होता है। साथ ही, इसके बारे में कोई धार्मिक बंधन भी नहीं हैं।