इसीलिए कृषि से कतराने लगे हैं लोग
श्याम प्रकाश शर्मा
एडवोकेट, शर्मा कॉलोनी, गांधी नगर, जनपद-बस्ती, उत्तर प्रदेश
मानसून पर किसान की निर्भरता ही वह खास कारण है, जिससे लोग कृषि कार्य करने से कतराने लगे हैं। यह घाटे का काम माना जाता है। लागत का खर्च भी निकल पाना दूर की कौड़ी हो चुका है। प्राकृतिक आपदाएं देश के अन्नदाता किसानों को ही दाने-दाने का मोहताज बना देती हैं। आज भी राष्ट्र के समक्ष जो खाद्यान्न का संकट है, उसका मुख्य कारण किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाव की समझ और जानकारी न होना और सरकार की ओर से इस दिशा में सार्थक पहल का न किया जाना है।
बदलते समय की मांग है
उपमा बाजपेयी, गृहणी, लखनऊ
आज कृषि क्षेत्र भी तकनीकी प्रभाव से अछूता नहीं बचा है। नई तकनीक और उन्नत किस्म की बीजों का खेती में बोलबाला है। यानी खेती पूरी तकनीक और यंत्रों पर निर्भर हो गई है, जो बदलते समय की मांग है। ऐसे में पारंपरिक तरीकों का उपयोग लगभग खत्म हो गया है। जो ठीक भी है। क्योंकि बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए हमें अधिक अन्न उत्पादन करना होगा, जो फसलों को समय पर खाद-पानी देकर ही किया जा सकता है।
आजादी के बाद से ही हुई उपेक्षा
कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उप संपादक, 1915 थापर नगर, मेरठ
वास्तव में भारतीय किसान की यही परंपरागत प्रवृत्ति कृषि के लिए घातक सिध्द हो रही है। सरकार ने आजादी के बाद से आज तक कोई कृषि नीति बनाई ही नहीं है बल्कि हकीकत में कृषि को हतोत्साहित ही किया है। बड़े पैसे वाले किसान तो टयूबवेल, टै्रक्टर आदि के सहारे दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं लेकिन 80 फीसदी से ज्यादा लघु किसान पूर्णतया मानसून पर निर्भर हैं। इसी वजह से इस कृषि प्रधान देश का रुतबा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर घटता जा रहा है और हम निर्यातक से आयातक बनते जा रहे हैं। किसानों में आज भी जागरूकता, नई तकनीकों, संसाधनों आदि का भारी अभाव है।
25 साल पहले तो नहीं था यह मौसम
राजेश कुमार गुप्ता, संयुक्त सचिव, रोटरी क्लब, पूर्वी वाराणसी, उत्तर प्रदेश
बचपन में मेरी दादी महीनों के नाम हिन्दी में बताती थीं कि सावन चल रहा है और भादो आने वाला है। आज से तकरीबन 25 साल पहले मौसम की ऐसी बेरुखी नहीं थी। जब उस समय का मौसम विभाग इस 21वीं सदी के जैसा अपडेट नहीं था। फिर भी आज का मौसम विभाग सही सूचना देने में नाकाम साबित हो रहा है। आज हम देखें तो महसूस करेंगे कि पहले डगर-डगर पर पेड़-पौधे और हरियाली दिखती थी लेकिन वर्तमान दौर में शहर में अगर दोपहर में किसी काम से निकल जाएं तो न ही छांव नसीब होती है और न ही शुध्द हवा। इसका मूल कारण है तेजी से बढ़ता प्रदूषण। प्रदूषण का सीधा असर मौसम पर पड़ रहा है।
निर्भरता देश के विकास के लिए घातक
अर्पित सूरी, उत्तर प्रदेश
हमारे देश में आज भी कृषि मानसून पर ही निर्भर है। कृषि को आगे बढ़ाने के लिए आज भी आधुनिक व तकनीकी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। लिहाजा मानसून पर निर्भरता लाजमी है। लेकिन हमें उस निर्भरता को छोड़ना ही होगा क्योंकि यह हमारे देश के विकास में बाधा है। कृषि के विकास के लिए हमें नई विकास परियोजनाओं को मूर्त रूप देना चाहिए और अपने किसान भाइयों को समझाना चाहिए कि वह नई तकनीक को जल्द से जल्द अपनाए और देश के विकास में अपनी हिस्सेदारी प्रदान करे।
तकनीक न मिलने से हैं आत्महत्याएं
अमित कुमार उपाध्याय, एडवोकेट, 8262-बेरिहवां, गांधी नगर, जनपद-बस्ती, उप्र
देश में किसानों को वैज्ञानिक तकनीक का लाभ न मिलने से एक ओर जहां किसान बदहाली के जीते हुए आत्महत्या तक करने को विवश हो रहे हैं, वहीं देश के समक्ष खाद्यान्न का संकट भी पैदा हो गया है। समय की जरूरत है कि मानसून पर किसानों की निर्भरता समाप्त करने और भाग्य के भरोसे कहीं जाने वाली खेती को सुरक्षित व लाभकारी बनाने की हर संभव कोशिश की जाए।
बुआई के लिए योजना बनाना जरूरी
संतोष कुमार मंडराई हरदा वाले, जिला-हरदा, मध्य प्रदेश
यह सही है कि अब किसानों को मानसून पर निर्भरता कृषि के लिए घातक है क्योंकि हम देख रहे हैं कि आजकल कुछ वर्षों से मानसून चकमा दे आगे निकल जाता है और हम अपना नुकसान कर बैठते हैं। इसलिए हमें चौकन्ना रहना चाहिए। अपने खेतों की बुआई के लिए पहले से योजना बनाकर नियमानुसार कार्य करते रहना है। आजकल सभी देशों में नई-नई तकनीकी, नये कृषि यंत्र देश और विदेशों से भारत के हर राज्यों में आ गए हैं। सरकार भी मदद के लिए आगे आ रही है।
वैज्ञानिक सहयोग मिलना जरूरी
राजेंद्र प्रसाद मधुबनी, व्याख्यता मनोविज्ञान, फ्रेण्ड्स कॉलोनी, मधुबनी, बिहार
बढ़ती जनसंख्या और घटते खेत-खलिहान को देखकर मानसून पर किसान की निर्भरता कृषि के लिए घातक है। सदियों पूर्व ऋषि-मुनियों ने देश के प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय मानसून के हिसाब से जैविक खाद-बीज का उपयोग कर किसानों को फसल के लिए तैयार किया था। आज हालत यह है कि किसान पानी लगनेवाले क्षेत्र में गेहूं और सूखी ऊंची जमीन पर धान की फसल के लिए सरकारी मदद से प्रयासरत हैं फिर भी पूर्ण तकनीकी का अभाव है। असंतुलित मानसून की स्थिति में किसानों को वैज्ञानिक सहयोग से फसल के अनुसार मानसून और मानसून के हिसाब से फसल लगाने की क्षमता होनी चाहिए। इसके लिए ऐसा बीज हो, जो मानसून के हिसाब से फसल का रूप ढंग और गुण बदल सके और साथ ही प्रशिक्षण और संसाधन भी होने चाहिए।
महाशक्ति भारत में बेबस है किसान
मुनीश्वर, बेगुसराय, बिहार
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, नवीनतम अर्थव्यवस्था, परमाणु सम्पन्न राष्ट्र, सूचना-प्रौद्योगिकी तथा अन्य क्षेत्रों मे शानदार उपलब्धियों वाला देश ‘भारत’, जिसकी अर्थव्यवस्था अधिसंख्यक आबादी अभी कृषि पर निर्भर है और कृषि जो है कि मानसून पर निर्भर है। लाखों किसान मई-जून आते ही खरीफ फसल की रोपनी के लिए आसमान की ओर निहारते रहते हैं।
सदियों पुरानी लीक पर चल रहे हम
डॉ. सतीश कुमार शुक्ल, पूर्व आईईएस अधिकारी एवं सलाहकार, कॉटन एक्सचेंज बिल्डिंग, मुंबई
कृषि की मानसून पर निर्भरता सदियों पुरानी है। हरित क्रांति के सुधारों के बावजूद वही स्थिति बनी हुई है। सिंचाई सुविधाओं के अभाव तथा जल संचयन के नवीन तरीकों का प्रचलन नहीं होने के कारण यथास्थिति बनी हुई है। नदियों की आपस में जोड़ने की परियोजना भी अधूरी है। इससे मानसून के समय व्यर्थ जल का उपयोग हो सकता है। कृषि की मानसून पर निर्भरता निस्संदेह घातक है।
जलसंचय की व्यवस्था की जाए
अजय, मालवानी – मुंबई
भारत कृषि प्रधान देश तो है, लेकिन कृषक प्रधान देश नहीं बन पाया। आज भी देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है क्योंकि उनके पास कोई और चारा भी नहीं है। अगर सरकार पानी के संचय की व्यवस्था करती तो किसानों की मानसून पर निर्भरता भी कम होगी और दिन प्रति दिन कम होते जलस्तर को भी गिरने से रोका जा सकता है।
विशेष निगरानी समिति बनाए सरकार
शरद मारू, अध्यक्ष – ग्रोमा, मुंबई
भारतीय कृषि क्षेत्र के नजरिये से देखा जाय तो किसानों की कृषि के लिए मानसून पर निर्भरता बेहद जरूरी है। खासकर गैर सिंचाई क्षेत्रों में तो मानसून और भी जरूरी है। यदि वर्षा की निर्भरता से छुटकारा पाना है तो झीलों, बांध और नहरों का प्रबंधन सही तरीके से करना होगा। जिसके लिए सरकार को चाहिए कि एक विशेष निगरानी समिति बनाकर इनके विकास और रख-रखाव का काम कराये। ऐसी समितियां रूस, चीन और यूरोप के कई देशों में सफल रही हैं।
आधुनिक हों सिंचाई के साधन
अर्चना शैलेंद्र पांडे, मीरा रोड, ठाणे, महाराष्ट्र
ग्रामीण क्षेत्रों में झील, तालाब और नहरें देखने को तो मिलती हैं, पर उनमें साल के ज्यादातर महीनों में पानी नहीं रहता है। यह हमारी अव्यवस्था को दर्शाता है। अगर भारत के पुराने परंपरगत सिंचाई के साधनों को आधुनिकता का जामा पहनाया दिया जाय तो मानसून पर निर्भरता कम हो सकती है।
कृषि पर निर्भरता हो सकती है वरदान
मोहन लाल डागा, कोलकाता
आज जरूरत इस बात की है कि गांवों में सिंचाई, बिजली, सड़क आदि की सही व्यवस्था कराई जाए ताकि मानसून का साथ न मिलने पर भी कुछ-न-कुछ उत्पादन संभव हो सके और किसानों की दयनीय स्थिति में सुधार हो पाए। किसानों को अगर उत्पादन के साथ उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाए, तो उनकी स्थिति में सुधार आ सकता है।
आधुनिक तरीके अपनाने ही होंगे
मनीष मोहन सिंह, बिजनेस डेवलपमेंट मैनेजर,बिरला सनलाइफ, लखनऊ
जिसे खेती करनी है उसे आधुनिक तरीके अपनाने होंगे। सिंचाई के नए साधन मौजूद हैं और मानसून पर निर्भरता खत्म सी हो गई है। मानसून खेती को करने का अकेला साधन नहीं बचा है। नलकूप, नहर, कुआं, पंपसेट जैसे कई अन्य साधन हैं। रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी नया तरीका है।
नए साधनों का इस्तेमाल सीखना होगा
सुधीर कुमार, पत्रकार, लखनऊ
किसानों को सिंचाई के अन्य साधनों पर निर्भर होक र खेती करना सीखना चाहिए है। जो खेती के लिए लाभदायक है। नये जमाने में आधुनिक तकनीक के सहारे ही उत्तम खेती संभव है।
बीते जमाने की बात हो गई निर्भरता
शशि पांडे, एडवोकेट, लखनऊ
मानसून पर निर्भरता बीती बात हो गई है। हमें नए जमाने के मुताबिक चलना होगा। आज मौसम विभाग बदल चुका है। वहां अनुमान सही लगाया जाता है। इसलिए मानसून पर निर्भरता समीचीन नही है।
कृत्रिम साधनों पर देना होगा ध्यान
सौरभ आनंद, उद्यमी, लखनऊ
अब बारिश के बजाय पंप सेट और सिंचाई के कृत्रिम साधनों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। जमाना आधुनिक हो चुका है। जब भी खेती की बात आएगी, तो हमें यह देखना होगा कि अनुमान क्या कह रहा है।
पुरस्कृत पत्र
किसानों को सक्षम बनाना होगा
मुकेश कुमार मिश्रा
समाजसेवी, मिश्रा ब्रदर्स, गांधी नगर, जनपद-बस्ती, उत्तर प्रदेश
हम उन्नतशील वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। प्राकृतिक प्रकोप से होने वाले जन-धन की हानि को निरंतर कम किया जा रहा है फिर कोई कारण नहीं कि मानसून पर से किसानों की निर्भरता समाप्त की जाए। उन्हें पर्याप्त जानकारी व साधन उपलब्ध कराए जाएं, जिससे कि वे भाग्य के भरोसे रहकर नहीं बल्कि पूरे आत्मविश्वास व उत्साह से कृषि कार्यों में सक्रिय भागीदारी करके स्वयं समृध्दशाली होने के साथ ही साथ भारत देश को भी खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना सकें। इसके लिए सरकार को गंभीरता से कोशिश करनी होगी न कि सिर्प कागजी नीतियों को बनाकर इतिश्री करने से बात बनेगी। वैज्ञानित तौर-तरीकों को अपनाने के लिए देश के किसानों को भी जागरूक करना होगा। खाद्यान्न पर निर्भरता से ही हमारा देश सही मायनों में महाशक्ति बन सकेगा।
अन्य सर्वश्रेष्ठ पत्र
खुद अपनी मदद करनी होगी
ओ. पी. मालवीय
भोपाल
समझदार किसान को चाहिए कि सिर्फ मानसून के भरोसे न बैठे रहें। किसानों को अपने विवेक-बुध्दि से सिंचाई के लिए पहले से ही पानी की व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए। हमें नहरों से भी पानी मिलता है लेकिन जहां नहर नहीं है वहां किसानों को चाहिए कि खेतों के आसपास छोटे-छोटे तालाब बनाए। किसानों को खुद से ही टयूबवेल भी लगवाना चाहिए। बैंक घर बैठे लोन देने को तैयार है। देश की हालत में सुधार लाने के लिए इंसान को खुद से पहल करनी होगी। मैं किसान नहीं हूं लेकिन किसान का दर्द समझता हूं।
गरीबी है निर्भरता की अहम वजह
राजेश कपूर
भारतीय स्टेट बैंक, एल. एच. ओ., लखनऊ
मानसून में होने वाला कोई भी परिवर्तन कृषि उपज को अत्याधिक प्रभावित कर देता था, जिससे हमें खाद्यान्न विदेशों से आयात करना पड़ता था, जहां खेती वर्षा पर निर्भर नहीं है। तब मानसून के विकल्प पर ध्यान दिया गया और सिंचाई के अन्य श्रोतों की उपलब्धता के विकास पर सरकार ने प्रयास किया। ये प्रयास काफी सफल भी रहा। परंतु अधिकतर भारतीय किसान काफी गरीब हैं और इन वैकल्पिक सिंचाई के साधनों पर होने वाले व्ययभार को वहन न कर पाने की वजह से आज भी मानसून पर ही निर्भर हैं।
प्रदूषण से बिगड़ा मानसून का मन
मनोज कुमार ‘बजेवा’
शोध-अध्येता, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार
हमारे देश में ही नहीं दुनियाभर में पिछले कुछ दशकों में अत्याधिक प्रदूषण के चलते पारिस्थितिकी तंत्र में काफी बदलाव आया है। ऋतुओं का परिवर्तन हो गया है, जिससे बीजों को अंकुरित होने के लिए उचित जलवायु नहीं मिल पाती। मानसून पर किसान की निर्भरता कृषि के लिए अत्याधिक घातक है। मानसून के इंतजार में किसान यदि समय पर अपनी फसल की बुआई नहीं करता है तो उससे जहां एक तरफ देश में खाद्यान्न उत्पादन का ग्राफ तो नीचे गिरता ही है साथ में किसान की आय में भी कमी आती है।
सरकारी उपेक्षा तोड़ रही कमर
उल्का महाजन
वरिष्ठ समाजसेविका, मुंबई
महाराष्ट्र में किसानों को कृषि के लिए मानसून पर निर्भर होना स्वाभाविक है। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में केवल 16 फीसदी जमीन सिंचाई के लिए उपयुक्त है, ऐसे में मानसून एकमात्र किसानों का सहारा है। इसके अलावा वैकल्पिक आधार के लिए सिंचाई के अन्य स्त्रोतों जल संरक्षण एवं वर्षा के पानी का संरक्षण कर कृषि के लिए उपयोग करना चाहिए। साथ ही सरकारी उपेक्षा भी किसानों की कमर तोड़ रही है। वहीं कृषि से हुई पैदावार का भी किसानों को बाजार में उपयुक्त भाव नहीं मिल पाता है।
बकौल विश्लेषक
मानसून पर उंगली न उठाएं फसल चक्र में बदलाव लाएं
देविन्दर शर्मा
कृषि विशेषज्ञ
यह सवाल आज इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि खेती की जो विदेशी पध्दति है, उसका मानसून के साथ ठीक से बन नहीं रहा है। हमलोगों को बताया जाता है कि अगर भारत को मानसून के चक्र से बाहर निकलना है तो खेती की अमेरिकी पध्दति अपनानी होगी। वास्तव में, पश्चिमी पध्दतियां मानसून के प्रति हमारे दिमाग में भ्रम पैदा कर रही हैं कि आज देश में जो कृषि संकट है वह मानसून की वजह से ही है। लेकिन उनकी ये दलीलें पूरी तरह खोखली और बेबुनियादी हैं।
देश में कृषि संकट की बात है तो वह यहां अपनाए जाने वाले सिर्फ फसल चक्र की वजह से है। एक सबसे बड़ी बात कि देश के उन इलाकों में जहां पानी की मात्रा बहुत कम है या फिर जो सूखे से प्रभावित इलाकेहैं, वहां वैसी फसलें यानी हाइब्रिड बीज लगाए जाते हैं, जिसमें पानी की खपत सबसे अधिक होती है। इसके विपरीत उन क्षेत्रों में जहां पानी भरपूर मात्रा उपलब्ध है, वहां उन्नत किस्म के बीज लगाए जाते हैं, जिसमें अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है।
इंटरनेशनल राईस रिसर्च इंस्टीटयूट्स के अनुसार एक किलो धान (उन्नत बीज) पैदा करने के लिए पांच हजार लीटर पानी का उपयोग किया जाता है। यह रिसर्च अमेरिका को ध्यान में रखते हुए की गई है, जहां पानी की उपलब्धता साल भर बनी रहती है। इसलिए हमलोगों ने अपने देश के हिसाब से विश्लेषण किया है और पाया कि यहां एक किलो धान (उन्नत बीज) की उपज के लिए औसतन तीन हजार लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है। यह आर्थिक नीति निर्माताओं, किसानों और आमजन को समझने की आवश्यकता है।
बातचीत: पवन कुमार सिन्हा
मानसून है जुआ, जिसमें हर बार हारता है किसान ही
सुरिन्दर सूद
कृषि विशेषज्ञ
भारतीय कृषि के लिए मानसून एक जुआ की तरह ही है। हालांकि इस जुआ में हर बार हार किसानों की ही होती है, जोकि अपनी आजीविका के लिए बड़े पैमाने पर कृषि पर आश्रित हैं। यह एक दुखद सच्चाई है कि आजादी से पहले और बाद में सबसे ज्यादा जोर या फिर कह लीजिए कि हो-हल्ला कृषि को लेकर ही हुआ लेकिन इसके बावजूद पूरे देश में 140 मिलियन हेक्टेयर से भी अधिक कृषि योग्य भूमि में से महज 55 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर ही बमुश्किल सरकार की नजरे इनायत हो पाई। जबकि आज भी करीब 85 मिलियन हेक्टर कृषि योग्य भूमि अनिश्चितकालीन वर्षा पर ही निर्भर है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की वजह से साल में केवल चार महीने (जून से सिंतबर) ही बारिश हो पाती है। इन चार महीनों में पूरे साल भर का करीब 80 फीसदी बारिश होती है। वह स्थिति और भी भयावह होगी जब मानसून में ही बारिश की कमी आ जाएगी। उस वक्त बारिश की कमी का फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा तो निस्संदेह किसानों की स्थिति और भी बद से बदतर हो जाएगी। ऐसे में सरकार द्वारा हानि मुआवजा के रूप में फसल बीमा का हथियार भी नाकाम साबित होगा क्योंकि फसल बीमा का स्वाद भी कुछ ही किसानों को मिल पाता है।
इसके अलावा, देश में करीब 16 राज्य ऐसे हैं, जहां सूखे का प्रकोप पड़ता रहता है और वहां मानसून की विफलता हुई है। इसमें कोई शक नहीं कि अगर मानसून भारतीय किसानों को धोखा दे जाता है तो उनकी आत्महत्या की घटनाओं में और भी इजाफा देखने को मिलेगा। लिहाजा जब तक सरकार वर्षा के जल संरक्षण की बेहतरी को सुनिश्चित नहीं करती है और साथ ही कृषि को तकनीकी रूप से मजबूत नहीं बनाती है, तब तक किसानों के भाग्य सुधार की कल्पना कोरी ही रहेगी।
…और यह है अगला मुद्दा
सप्ताह के ज्वलंत विषय, जो कारोबारी और कारोबार पर गहरा असर डालते हैं। ऐसे ही विषयों पर हर सोमवार को हम प्रकाशित करते हैं व्यापार गोष्ठी नाम का विशेष पृष्ठ। इसमें आपके विचारों को आपके चित्र के साथ प्रकाशित किया जाता है। साथ ही, होती है दो विशेषज्ञों की राय।
इस बार का विषय है कड़ी मौद्रिक नीति से छोटे कारोबारी हों जाएंगे हलकान? अपनी राय और अपना पासपोर्ट साइज चित्र हमें इस पते पर भेजें:बिजनेस स्टैंडर्ड (हिंदी), नेहरू हाउस, 4 बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-110002, फैक्स नंबर- 011-23720201 या फिर ई-मेल करें
goshthi@bsmail.in
आशा है, हमारी इस कोशिश को देशभर के हमारे पाठकों का अतुल्य स्नेह मिलेगा।