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व्यापार गोष्ठी: धनी लोग दें ईंधन की अधिक कीमत

Last Updated- December 07, 2022 | 7:01 AM IST

फिर हालात हो जाएंगे जस के तस


धनाढय लोगों से ही अधिकाधिक कीमत वसूली भी जा सकती है। कारें, बाइक और गैस का 80 प्रतिशत उपभोक्ता धनाढय वर्ग ही है और यही वर्ग सब्सिडी का पूरा मजा ले रहा है।

देश में 80 फीसदी वर्ग गरीब और मध्यम दर्जे का है, जिसके नसीब में साइकिल, पगचालन, लकड़ी-उपले का चूल्हा व किरोसिन का स्टोव है। पेट्रोल-डीजल व गैस के बारे में तो वह जानता भी नही है। मगर इसका एक बहुत बड़ा और खराब प्रभाव भी है। कीमतें बढ़ाने से धनाढय वर्ग इसका तोड़ ढूंढ लेगा और फिर स्थिति जस की तस बनी रहेगी। धनाढय वर्ग ईंधन के रुप में गैस, पेट्रोल व डीजल के बजाय और ज्यादा चुराकर बिजली का इस्तेमाल करने लगेगा, जिससे भी अंतत: सरकार का घाटा होना है।

इससे बिजली चोरी बढ़ जाएगी। सरकार को पेट्रो चलित घरेलू वाहनों पर 20 से 25 फीसदी का सब्सिडी टैक्स या एक निश्चित राशि, चौपहिया पर 1000 रुपये प्रतिमाह, बाइक पर 500 रुपये प्रतिमाह वसूलनी चाहिए। पेट्रो पदार्थों का वर्गीकरण करके राशनिंग सिस्टम लागू करना धनी वर्ग औैर गरीब वर्ग के लिए अलग-अलग कर पाना हिन्दुस्तान जैसे देश में नामुमकिन है। – कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उप-संपादक, दैनिक जागरण, 191-5 थापर नगर, मेरठ

बोझ अमीरों पर देना गलत

तेल की बढ़ी कीमतों का बोझ अमीरों पर डाल देना सरासर गलत है। भारत जैसे देश में ऐसी दोहरी व्यवस्था को लागू कर पाना ही असंभव होगा। फिर मेहनत और दिमाग के दम पर अगर किसी ने रुपया कमाया है तो उसे इस बात का दंड क्यों दिया जाए। हैरत की बात है कि सरकार अपनी तरफ से शुल्क में कटौती और ज्यादा करने की बजाय ऐसी बेसिर पैर की बातें कर रही है। 

अमीर यहां पहले से ही बहुत तरह के करों की मार सहते आ रहे हैं। ऐसी परंपरा डालना गलत होगा। हां मंहगी कार खरीदते समय ही सरकार कुछ अधिक कर की मांग निर्माता कंपनियों से कर सकती है। – रजत सिनर्जी, चेयरमैन, सिनर्जी फैब्रिक्राफ्ट, वाराणसी

सरकार सब्सिडी को कम रखे

धनी बनना साधारण बात नही है। कठिन मेहनत, कुशाग्र बुद्धि, मितव्ययी और न जाने कितने ही गुणों के समन्वय से कोई व्यक्ति धनी बनता है। हां एक बात तो है कि अगर कोई व्यक्ति गलत तरीके का इस्तेमाल कर धनी बनता है तो उसे सजा होनी चाहिए।

धनी व्यक्ति टैक्स, व्यापार में घाटा या कई अनेक सामाजिक-आर्थिक परेशानियों से घिरा रहता है। अगर कोई धनी किसी सुविधा को उपभोग करेगा तो उसे टैक्स चुकाना पड़ता है। तेल,डीजल और गैस की कीमत और मात्रा में किसी प्रकार का अंतर नही होना चाहिए। इसके लिए सरकार कम सब्सिडी रखे ताकि प्राइवेट कंपनी का तालमेल बना रहे। ठीक ऐसी ही परिस्थिति बन जाए तो क्या हर्ज है?

पेट्रोल, डीजल और गैस सस्ता हो जाएगा। यही होड़ ऊर्जा के अन्य स्रोत जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा में भी लगे, तो इसके लिए विदेशों पर निर्भरता भी कम होगी। जिसे जो ऊर्जा का प्रकार आसानी और सस्ती दर पर उपलब्ध होगा ,वह उसका ही इस्तेमाल करेगा। अपना साधन मजबूत होगा। अगर ऐसा हुआ तो लोग अपने धन को छुपाने के लिए भी तरह-तरह के नुस्खे निकालेंगे। इससे टैक्स चोरी को भी बढावा मिलेगा, भ्रष्टाचार बढ़ जाएगा और देश की प्रगति बाधित हो जाएगी। – राजेन्द्र प्रसाद मधुबनी, व्याख्याता (मनोविज्ञान), स्वतंत्र लेखक और पत्रकार, मधुबनी, बिहार- 847211

पता नहीं, किसने दे डाली ऐसी सलाह

पेट्रोल,डीजल और गैस की कीमत में वृद्धि से घबराकर पता नहीं किसने यह सलाह दे दी कि धनी लोगों से इसकी अधिक कीमत ली जाए? कम कीमत पर वस्तु प्राप्त करने के लिए धनी लोग भी निर्धन हो जाते हैं और फिर इनसे कैसे अधिक कीमत वसूलोगे? सबसे बड़ी समस्या है कि इनमें भेद कैसे किया जाए? इससे बेहतर है कि उन वस्तुओं की कीमत बढा दी जाए, जो पेट्रोल, डीजल और गैस से चलते हैं।

जैसे कीमती कारों, मोटरसाइकिलों आदि पर कर की सीमा बढ़ा दी जाए। इससे उनकी बिक्री कम होगी और ईंधन की खपत कम होगी। इससे कर भी अधिक प्राप्त होगा और ईंधन का भी इस्तेमाल सोच-समझ कर किया जाएगा। धनी लोगों से इसकी अधिक कीमत लेना सामाजिक अर्थव्यवस्था के साथ भेदभाव और खिलवाड़ होगा। यही नहीं, प्रीमियम पेट्रोल और डीजल के नाम पर मिलावटी और घटियापन को बढावा मिलेगा। – सुभाष कुमार श्रीवास, (आयकर, निवेश और बीमा सलाहकार), कैंट पंप हाउस के पास, बबीना कैण्ट

सरकारी वाहनों से हो ज्यादा वसूली

मूल्य विभेदीकरण एकाधिकारिक उत्पाद मूल्य निर्धारण रणनीति का आजमाया हुआ अस्त्र है। सैद्धांतिक तौर पर पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि की मार को कम करने के लिए यह उपाय उचित प्रतीत होता है। वैसे भी पेट्रोलियम मंत्रालय का बी.के. चतुर्वेदी पैनल पेट्रोलियम कंपनियों के एक प्रस्ताव पर विचार कर रहा है कि शहरी इलाकों में (विशेषकर महानगरों में) इन्हें अपने ब्रांडेड उत्पाद बेचने की इजाजत दी जाए।

संभवत: यह खुशफहमी है कि महानगर में कोई गरीब नहीं रहता है। वहां सभी साधन संपन्न हैं। व्यवहारिक तौर पर यह निर्धारण करना मुश्किल है कि कौन उपभोक्ता अमीर है और कौन गरीब है। एक ओर भारतीय ऑयल वितरण व विपणन कंपनियां सब्सिडी की मार से गरीब होने का रोना रोती है और दूसरी ओर कर्मचारी और अधिकारी अपने वेतन को चार गुना बढ़ाने की मांग करते हैं।

सबसे ज्यादा फिजूलखर्ची शासकीय वाहनों में होती है। अत: शासकीय वाहनों (जिसमें उनके द्वारा किराये पर लिए गए वाहन भी शामिल हैं) से ऊंची कीमतें वसूल की जा सकती है। एक स्रोत के अनुसार कुल पेट्रोलियम उपभोग का 80 प्रतिशत इन सरकारी विभागों के वाहनों द्वारा खर्च किए जाते हैं। – सतीश कुमार शुक्ल, आइईएस सलाहकार, मुंबई

इससे बेहतर कदम नहीं

अमीरों से तेल का ज्यादा दाम लेकर गरीबों को राहत देने में कुछ भी गलत नही है।  जो अमीर लाखों की मंहगी कारों से चलता है, उसे अगर तेल के दाम थोड़े ज्यादा देने पड़ जाएं तो इसमें क्या हर्ज है। हमारे देश एक बार ऐसी व्यवस्था लागू हो जाए तो यह औरों के लिए नजीर बनेगी। लेकिन ऐसे फैसले लेने के लिए कड़ी इच्छा शक्ति होनी चाहिए जो इस सरकार में नजर नहीं आती है। गरीबों को राहत देने के लिए इससे बेहतर कदम और क्या हो सकता है। साथ ही तेल की बचत को भी प्रोत्साहन की जरुरत है। – आकाश कुमार, छात्र, गुरुकुल ऐकेडमी, लखनऊ

आखिर धनी ही क्यों बलि का बकरा

धनी लोगों से ही क्यों ली जाए अधिक पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें? यूं तो आज हर इंसान इन तीन चीजों का आदी हो चुका है। आज भोजन की जरूरत के लिए रसोई गैस लेना जरुरी है। नए-नए वाहन आज बाजार में रोज आ रहे हैं। लोग पुराने वाहनों को छोड़ नए वाहनों को खरीदने की होड में शामिल हो गए हैं। हर इंसान इस होड़ में लगा हुआ है कि उसके पास एकदम नए मॉडल की गाड़ियां हों। आज डीजल से चलने वाली गाड़ियों की भी कमी नहीं है।

भारत में आजकल लोग किरोसिन मिलाकर वाहन चलाने से भी परहेज नही करते हैं। उन लोगों पर किसी तरह की कार्रवाई नही होती है। वैसे भी बिना पेट्रोल के गाड़ी चलाना काफी मुश्किल है। हमें जरूरत है कि ऐसे वाहन की व्यवस्था की जाए जो कि सस्ता हो और आसानी से मिल सके। इन तीनों चीजों का इस्तेमाल हम सभी कर रहे हैं। तो धनी लोगों से इसकी ज्यादा कीमतें क्यों ली जाए? यह सरासर अन्याय है।

हम बचत के लिए पहल कर सकते हैं। और ईंधन की बचत के लिए हम छोटे-छोटे वाहनों को छोड़कर बड़े वाहनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। हमें जरूरत है कि भारत में ही वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था की जाए ताकि अरब देशों पर इसके लिए निर्भरता कम हो सके। – ओ.पी. मालवीय, भोपाल

मर्सिडीज से घूमो तो भुगतो

विश्व बाजार में तेजी से बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के कारण पेट्रोलियम पदार्थों की धनी लोगों से इसकी ज्यादा कीमत वसूल करनी चाहिए। जो व्यक्ति मर्सिडीज जैसी महंगी गाड़ियों में घूम रहे हैं और जो सामान्य आदमी साधारण मोटर साइकिल चला रहा है और बिडंबना यह है कि दोनों व्यक्ति पेट्रोलियम पदार्थों की एक ही कीमत चुका रहा है। जो व्यक्ति सक्षम है उन्हें पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सिडी क्यों दी जा रही है।

सरकार को चाहिए कि वे कारों की सूची बनाकर ज्यादा तेल खपत करने वाले वाहनों पर ज्यादा टैक्स लगाये। ज्यादा आय वाले व्यक्तियों को पेट्रो कार्ड जारी कर बिना सब्सिडी के तेल की आपूर्ति की जानी चाहिए। – सुरेन्द्र सिंह कच्छ, स्वतंत्र पत्रकार

संभव हो तो जरूर वसूलें अधिक

धनी लोगों से पेट्रोल, डीजल और गैस की अधिक कीमत लेने से समस्या के कारण का निवारण नहीं होगा। मूल समस्या है तेल के आयात बिल का निरंतर बढ़ना अथवा पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर होने वाले व्ययों को कम करना। भारत अपनी आवश्यकता (78 प्रतिशत) की पूर्ति हेतु मुख्यत: आयात पर निर्भर है।

दूसरी तरफ बढ़ती पेट्रोलियम पदार्थों  की लागत मूल्य से कम दाम पर बेचने का दबाव है। परिणामत: देश में बढ़ती पेट्रोलियम पदार्थों की मांग का प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर परिलक्षित हो रहा है। मुद्रास्फीति दहाई अंकों को छू चुकी है। इस स्थिति में आयात बिल के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए मूल्य वृद्धि के स्थान पर उपभोग में कमी के उपाय पर विचार किया जाना चाहिए।

क्योंकि मूल्यों में वृद्धि अंतत: महंगाई को बढाएगी जिसका प्रतिकूल प्रभाव आम जनता पर पड़ेगा। धनी लोगों से निस्संदेह अधिक मूल्य लिया जाना चाहिए। यदि वास्तव में ऐसा संभव हो तो। क्योंकि भारत में धनी लोगों द्वारा गरीबों के लिए आरक्षित सुविधाओं का उपभोग करने के उदाहरण सर्वत्र विद्यमान है। इस स्थिति में भ्रष्टाचार के नए स्रोत के जन्म की संभावना अधिक बनती है। उन्हें प्रेरित करना चाहिए था कि पेट्रोलियम पदार्थों की बचत कंजूसी नही बल्कि आत्मसम्मान का विषय है।  – डॉ. डी.के. नेमा, सागर (म.प्र.)

धनी लोगों से वसूली बिल्कुल सही

कच्चे तेल के बिना देश का व्यापारिक, आर्थिक और सामाजिक विकास नहीं हो सकता । कच्चे तेल की कीमतों में इतनी वृध्दि हो चुकी है कि अब इसके सिवा कोई उपाय भी नजर नहीं आता । अगर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें सभी लोगों के लिए बढ़ाई जाती है तो देश में महंगाई इतनी अधिक बढ़ जायेगी कि आम आदमी का जीना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन अगर धनी लोगों को पेट्रोल,डीजल और गैस अधिक कीमत पर दिया जाता है तो उन पर इसका कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा।

विकास की रफ्तार को बनाए रखना है तो यह जरूरी  है कि कच्चे तेल की कीमतों का असर आम आदमी पर ना आये और सरकार कच्चे तेल का घाटा दूसरे विकल्पों से पूरा कर व भविष्य के लिए कड़ा कानून बनाकर तेल की खपत को कम करे ताकि विदेशी मुद्रा बचाकर रुपये की गिरावट को रोका जा सके। – केशरी सुराना, सरिया सेल्स, लुधियाना

पुरस्कृत पत्र

कारपूल कल्चर को मिले बढ़ावा

धनी लोगों से ली जाए पेट्रोल, डीजल और गैस की अधिक कीमत। यह सुझाव गले के नीचे नहीं उतरता है। अगर सरकार को इस समस्या से निपटना है, तो हर दिन दफ्तर आने-जाने वाली गाड़ियों को नंबर के आधार पर सप्ताह में सिर्फ तीन दिन चलने की इजाजत दी जाए। कार नंबर के आखिरी नंबर को आधार मानकर 0 से 4 तक के नंबर वाली गाड़ियों को सोमवार,मंगलवार और बुधवार चलने दिया जाए जबकि 5 से 9 तक की गाड़ियां गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को चलाई जाएं।

रविवार को फ्री डे रखा जा सकता है। अगर यह नियम लागू किया जाता है तो लोगो के बीच कार-पूल कल्चर बढ़ेगा और समय की कमी के कारण लोगों के बीच बढ़ती सामाजिक दूरी भाईचारे में बदल जाएगी। कार-पूल कल्चर अमेरिका जैसे साधन संपन्न देशों में सफलतापूर्वक चल रहा है। – निमेश शाह, कंपनी सेक्रेटरी एंड कॉम्प्लायंस ऑफिसर, एस.कुमार नेशनवाइड लि., मुंबई

सर्वश्रेष्ठ पत्र

कदम सही पर नियंत्रण जरूरी

धनी लोगों से ली जाए पेट्रोल, डीजल और गैस की अधिक कीमत का सुझाव बहुत अच्छा है। पेट्रोल-डीजल की अधिक कीमत या बिना सब्सिडी के धनी व्यक्ति आसानी से इसका प्रयोग कर लेंगे, जिससे सरकार पर भी कम बोझ पड़ेगा और उस  सब्सिडी का लाभ कम आय वर्ग वाले लोगों को मिलेगा। लेकिन डीजल का प्रयोग अधिकांश वाणिज्यिक गाड़ियों द्वारा किया जाता है और यदि उनको अधिक कीमत पर डीजल मिलेगा तो उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर धनी व गरीब दोनों पर पड़ेगा और सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी। – एकता कौर, अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लूकर गंज उ.प्र.

समझदारी भरा कदम होगा

जब देश को अपनी जरूरत का सत्तर प्रतिशत पेट्रोलियम आयात करना पड़ता हो, तब सब्सिडी राज लंबे समय तक बनाए रखना असंभव है। उस पर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम के आसमान छूते दाम से केंद्र सरकार पर आर्थिक बोझ निरंतर बढ़ता जा रहा है। डीजल, पेट्रोल, केरोसिन और गैस बेचने वाली सार्वजनिक कं पनियां लहुलुहान हैं। बिडंबना है कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नही है, जो सब कुछ मिनटों में नियंत्रित कर दे। ऐसे में सब्सिडी के घेरे से संपन्न वर्ग को बाहर रखना एक समझदारी भरा कदम होगा। – हर्षवर्द्धन कुमार, सृष्टि रूपा भवन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना-800003, बिहार

समाज में बढ़ेगी इससे असमानता

पेट्रोलियम पदार्थो का बोझ किसी वर्ग विशेष पर डालना समाज में एक और असमानता को बढ़ावा देने वाला कदम साबित होगा। जिन लोगों को लगता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों का भार अब उनकी जेब सहन नहीं कर सकती है, उन्हें चाहिये कि वे सार्वजनिक वाहनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें। इससे खर्र्च भी कम आएगा और प्रदूषण भी कम होगा। अब वक्त आ गया है कि सिर्फ सरकार को कोसने के अलावा हमें भी अपनी कुछ सामाजिक जिम्मेदारियों का वहन करना चाहिये। – सुधांशु शेखर झा, वरिष्ठ पत्रकार, मुंबई


टैक्स की दर और ज्यादा हो

बढ़ती महंगाई से आम आदमी को दो जून की रोटी जुटा पाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में रही सही कसर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ी कीमतों ने पूरी कर दी है। एक से ज्यादा गाड़ियों का उपयोग करने वाले लोगों से इसका अतिरिक्त टैक्स वसूला जाना चाहिये और यह चार्ज आरटीओ ऑफिस में ही गाड़ियों की संख्या के आधार पर लेना चाहिये। इसके अलावा कार या दूसरी गाड़ी बनाने वाली कंपनियों केऊपर भी टैक्स बढ़ाने के साथ ही साथ सरकार को चाहिए कि बैंकों को निर्देश दे की कार ऋण की दर और बढ़ा दे। – सुरेश राठौर, बिजनेस मैन, मुंबई

बकौल विश्लेषक

अमीरों के फायदे के लिए ही सरकार देती है सब्सिडी
अबनी रॉय
राज्यसभा सांसद , रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी

अमीरों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार सब्सिडी की व्यवस्था करती है। आप किसी भी पेट्रोल पंप पर चले जाएं, आपको वास्तविक तस्वीर नजर आ जाएगी। एक आम आदमी भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि इन पेट्र्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा अमीर लोग करते हैं। अमीरों को सब्सिडी देकर सरकार किस कल्याण की बात कर रही है। लिहाजा सब्सिडी का भी उद्देश्य जरूरतमंद नागरिकों को लाभ पहुंचाना होना चाहिए।

सरकार को इस बात का इल्म भी है। इसलिए उसे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि इस बात का निर्धारण संभव हो, जिसके तहत सब्सिडी का लाभ सिर्फ गरीबों और जरूरतमंदों को मिले। वैसे यह काम थोड़ा मुश्किल जरूर है। इस बाबत सरकार को एक सूची तैयार करनी चाहिए, जिस प्रकार राशन कार्ड या किसान क्रेडिट कार्ड देते समय किया जाता है। इसी तर्ज पर एक पेट्रोलियम कार्ड होना चाहिए, जिसमें उपभोक्ता के पूरे ब्यौरे सहित उसकी आमदनी के आंकड़ों का उल्लेख होना चाहिए।

उसके बाद पेट्रोल पंप वाले को यह अधिकार देना चाहिए कि वे पहले इस कार्ड की जांच करे और तब निर्देशानुसार उनसे पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत वसूल की जाए। वैसे इस प्रक्रिया में अव्यवस्था की भी गुंजाइश हो सकती है। इसलिए इसके लिए एक निगरानी विभाग का भी गठन होना चाहिए, जो पेट्रोल पंप पर गश्त लगाकर इस बात का जायजा ले कि धांधली न हो।
बातचीत: कुमार नरोत्तम

प्रायोगिक नहीं, तय करना मुश्किल होगा इसका तरीका
डॉ. अमित मित्रा
महासचिव, फिक्की

जिन पदार्थों की आपूर्ति के नियंत्रण का कोई ठोस तरीका नहीं हो, उसके लिए मूल्य निर्धारण का अलग मानदंड स्थापित करना प्रायोगिक नहीं है। अगर इस तरह की पहल कर भी दी जाए तो इससे कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा। इस स्थिति में यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि मात्राओं का वितरण इन आय श्रेणी में कैसे किया जाए?

अगर इन कमोडिटी का मूल्य अलग-अलग होगा तो क्रॉस सेलिंग की स्थिति भी बन जाएगी और जिस उद्देश्य के साथ अलग मूल्य निर्धारण को लागू किए जाने की बात होगी, उसे हासिल नहीं किया जा सकता है। अगर तेल और इसके उत्पाद की बात करें, तो जब तक इसकी आपूर्ति को नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक मूल्य की अलग प्रणाली को लाना उचित नहीं है। इस तरह का कोई नियंत्रण एक भयावह स्थिति पैदा कर सकता है।

फिर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति हो जाएगी और सबके लिए एक ही मूल्य प्रणाली को अपनाने की मजबूरी होगी। सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि समाज के  कमजोर तबके को ईंधन कूपन मिले। वैसे यह भी समस्या का पूरा निदान नहीं है और इससे भी कालाबाजारी को बढ़ावा मिलेगा।

अलग कमोडिटी के लिए अलग कीमत मांग और आपूर्ति को  प्रभावित करती है। कीमत ज्यादा होगी तो खपत कम होगी और लोग स्वत: इसके विकल्प तलाशने शुरु कर देंगे। भारत में वैसे भी तेल जरूरतों का 70 प्रतिशत आयात किया जाता है। हमें खपत नियंत्रित करनी चाहिए न कि अलग मूल्य प्रणाली को अपनाना।
बातचीत: नरोत्तम

…और यह है अगला मुद्दा

सप्ताह के ज्वलंत विषय, जो कारोबारी और कारोबार पर गहरा असर डालते हैं। ऐसे ही विषयों पर हर सोमवार को हम प्रकाशित करते हैं व्यापार गोष्ठी नाम का विशेष पृष्ठ। इसमें आपके विचारों को आपके चित्र के साथ प्रकाशित किया जाता है। साथ ही, होती है दो विशेषज्ञों की राय।

इस बार का विषय है कारोबारियों के लिए कौन बेहतर: यूपीए या एनडीए? अपनी राय और अपना पासपोर्ट साइज चित्र हमें इस पते पर भेजें:बिजनेस स्टैंडर्ड (हिंदी), नेहरू हाउस, 4 बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-110002 या फैक्स नंबर- 011-23720201 या फिर ई-मेल करें
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आशा है, हमारी इस कोशिश को देशभर के हमारे पाठकों का अतुल्य स्नेह मिलेगा।

First Published - June 23, 2008 | 1:28 AM IST

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