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सेना के पूर्व जवानों से लैस हों केंद्रीय बल

Last Updated- December 06, 2022 | 9:40 PM IST

रक्षा सेवाओं में अफसरों की तादाद 5 फीसदी से भी कम है। इसके बावजूद छठे वेतन आयोग की सिफारिशों पर सेना की चिंता सिर्फ अफसरों पर केंद्रित है, खासकर आईएएस के समकक्ष स्टेटस पाने के मद्देनजर।


लेकिन सबसे अहम मसला 16 लाख सैनिकों, नाविकों और एयरमैन का है, जिन्हें ‘अमानवीय’ पीबीओआर (पर्सन्स बिलो ऑफिसर रैंक) की श्रेणी में रखा जाता है।इस साल के बजट में भारत ने सैन्य बलों के वेतन के लिए (पुरुष व महिला दोनों) 22 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।


वेतन आयोग इस राशि में कितनी और बढ़ोतरी करेगा, इस बारे में अभी कुछ साफ नहीं है। इसके अलावा रक्षा पेंशन पर 15,500 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि खर्च होगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल सैन्य बलों की तादाद को लेकर है। क्या भारत इतने कम लोगों के जरिये खुद की रक्षा कर सकता है, यह सवाल अब भी काफी मौजूं है।


अगर हम सैन्यकर्मियों की बात करें, तो 2 मुद्दे प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं- पेंशन बिल में कमी और सैन्य बलों को युवा बनाए रखने की समस्या। इन दोनों चुनौतियों से निपटने के लिए सेना की योजना शॉर्ट सर्विस के तहत ज्यादा से ज्यादा लोगों की बहाली करने की है। सेना की नौकरी खत्म हो जाने के बाद इन जवानों को दूसरे सरकारी बलों में भेज दिया जाएगा और इसके जरिये इन बलों को प्रशिक्षण और अनुशासित मैनपावर का लाभ मिलेगा।


पांचवें और छठे वेतन आयोग में सिफारिश की गई है कि सेना में 7 साल की नौकरी पूरी कर लेने वाले जवानों को केंद्रीय पुलिस बलों (सीपीओ) को ले लेना चाहिए। इन बलों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ), इंडो-तिब्बत बोर्डर पुलिस (आईटीबीपी) और अन्य केंद्रीय बल शामिल हैं।


वित्तीय नजरिये से यह नीति काफी फायदेमंद साबित होगी। सीपीओ और नागरिक रक्षा संगठनों में तकरीबन 7 लाख 50 जवानों (महिला और पुरुष दोनों) पर सालाना 100 करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। सेना से रिटायर होने वाले हर साल 50 हजार प्रशिक्षित जवानों की इन संगठनों में भर्ती से इस खर्च को बचाया जा सकेगा।


साथ ही 37 साल से ही पेंशन पाने के बदले ये जवान (अक्सर 17 साल के बाद सेना के जवान रिटायरमेंट लेते हैं) सीपीओ में कम से कम 13 साल तक अपनी सेवाएं देंगे, जिससे हर साल सरकारी खजाने से 700 करोड़ रुपये की बचत हो सकेगी। कुल मिलाकर पेंशन खर्च में से सालाना 9,100 करोड़ रुपये बचाए जा सकेंगे। इसके अलावा सेना की रिसेट्लमेंट स्कीमों और अन्य खर्चों को कम किया जा सकेगा।


दूसरी तरफ, प्रशिक्षित और युध्द कला में माहिर जवान सीपीओ की क्षमता में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी करेंगे। इसके जरिये जम्मू-कश्मीर में चरमपंथियों, नक्सलपंथियों और उत्तरपूर्व में विद्रोही गतिविधियों से लड़ने में काफी मदद मिलेगी। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने अपने सैन्य पुलिस बलों में पूर्व सैनिकों की भर्ती कर रखी है, जो हमारे अर्ध्दसैनिक बलों के जवानों से ज्यादा प्रभावकारी हैं।


हालांकि जैसा कि हर अच्छे आइडिया के साथ होता है, एक सरकारी एजेंसी इस आइडिया का भी विरोध कर रही है। रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति की 29वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय पांचवें वेतन आयोग की इस सलाह का विरोध कर रहा है।


सलाह में सीपीओ और सेना को संयुक्त रूप से वैसे जवानों की भर्ती करने की बात कही गई है, जो 7 साल से ज्यादा से सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इस प्रस्ताव के खिलाफ सेना की दलील में ज्यादा दम नहीं है और साथ ही इस बात को भी बल मिलता है कि सीपीओ जवानों की भर्ती से जुड़े हुए नेटवर्क का संरक्षण और गैरजरूरी वित्तीय खर्चों के लिए ढाल का काम रहे हैं।


स्थायी समिति ने गृह मंत्रालय की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया है। नॉर्थ ब्लॉक की पहली आपत्ति यह है कि सेना में 7 साल तक काम कर चुके जवानों को केंद्रीय पुलिस संगठनों में शामिल करने से इनमें ‘बूढ़े लोगों की भरमार हो जाएगी। हालांकि स्थायी समिति इसे अलग नजरिए से देखती है।


समिति के मुताबिक, भर्ती होने वाले जवान की औसत उम्र 19 साल होती है और 7 साल बाद उसकी उम्र 26 साल होगी। चूंकि अभी सीपीओ में जवानों की भर्ती के लिए अधिकतम आयु सीमा 26 साल है, इसलिए सेना के जवान न सिर्फ इसी आयु वर्ग में आएंगे, बल्कि पूरी तरह प्रशिक्षित होंगे। 


गृह मंत्रालय की यह भी दलील थी कि सेना के ‘प्रशिक्षित किलर’ होते हैं और लोगों के साथ बहुत सख्ती से पेश आते हैं, जबकि केंद्रीय अर्ध्दसैनिक बलों के जवानों को इतनी सख्ती नहीं बरतनी चाहिए। स्थायी समिति ने इस दलील को भी ठुकरा दिया। समिति का कहना है कि सेना को उग्रवाद के खिलाफ अभियानों में लगाया गया है और ऐसी परिस्थिति में जवानों ने (सेना के) काफी नियंत्रित तरीके से काम किया है।


स्थायी समिति की रिपोर्ट में नक्सलपंथियों और आतंकवादियों से लड़ने में केंद्रीय बलों के ‘नियंत्रणवादी’ रवैये पर भी कटाक्ष किया गया है। गृह मंत्रालय की अगली आपत्ति सेना के जवानों की वरिष्ठता को लेकर है। मंत्रालय के मुताबिक, केंद्रीय बलों में पूर्व सैनिकों की भर्ती से नए जवानों की वरिष्ठता पर असर पड़ेगा।


समिति ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा है कि वेतन और प्रमोशन दोनों में नए जवानों के हितों को सुरक्षित रखा जाएगा। बहरहाल यह इंतजाम अस्थायी होगा और आखिकार केंद्रीय बलों में सिर्फ रक्षा बलों के जवानों की ही भर्ती की जाएगी। गृह मंत्रालय की आपत्तियां केंद्रीय बलों की कार्यक्षमता बढ़ाने और साख को बेहतर करने की प्रक्रिया में अड़ंगा पहुंचाने का काम कर रही हैं।


जम्मू-कश्मीर की आंतरिक सुरक्षा में लगे सेना के जवानों को वहां से हटाने और नक्सलवाद से लड़ने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति में बढ़ोतरी के बाद आंतरिक सुरक्षा से लड़ने का पूरा दारोमदार केंद्रीय बलों पर होगा। इसके मद्देनजर इन बलों में सेना के पूर्व जवानों को शामिल करने से इनकी क्वॉलिटी में इजाफा होगा और साथ ही जनता का पैसा भी बचेगा। यह एक ऐसा विकल्प है जिसे खारिज करने के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती।

First Published - May 5, 2008 | 10:19 PM IST

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