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जिहाद पर रणनीति में बदलाव जरूरी

Last Updated- December 07, 2022 | 1:43 PM IST

बेंगलुरु और अहमदाबाद में हुए विस्फोटों के बाद देश भर में गुस्सा चरम पर है। इसके पहले काबुल स्थित भारतीय दूतावास और जयपुर में विस्फोट हुए।


अगर शुरुआत में पाकिस्तान, कश्मीर घाटी में आतंकवाद को समर्थन कर रहा था तो अब वह देश वर्षो बाद अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ा चुका है। अब जिहादी तत्व देश भर में फैल चुके हैं। लेकिन इस मसले पर गुस्से से सोचे जाने ( निर्दोष मुसलमानों पर गुस्सा दिखाने) की बजाय शांत दिमाग से सोचे जाने की जरूरत है।

इस बात की पूरी संभावना है कि अब घरेलू जिहादी नेटवर्क, गतिविधियों को संचालित कर रहा है। पाकिस्तान से हाल में आने वाले एजेंटों को यहां के लोगों का सक्रिय या मौन समर्थन मिल रहा है। यह नेटवर्क मुसलमानों के खिलाफ होने वाले अत्याचार का बदला लेने का दिखावा कर रहा है और भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों को निशाना बना रहा है, साथ-साथ हमले करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन भी कर रहा है। 

कम क्षमता वाले बमों का प्रयोग क्यों किया गया, यह अभी भी स्पष्ट किया जाना है, लेकिन देश को एक और चेतावनी जरूर मिली है। इस तरह के आतंकी खतरों से निपटने के लिए कुछ स्तर पर जरूर काम किया जाना चाहिए। पहला, अपराधियों को पकड़कर उन्हें जल्द से जल्द कानून के मुताबिक दंड दिया जाना चाहिए। दूसरा, गुप्तचर सेवाओं में सुधार किया जाना चाहिए जिससे जिहादी नेटवर्क को भेदा जा सके  और इस तरह के हमलों को रोकने के लिए समय रहते चेतावनी दी जा सके।

काबुल और अहमदाबाद के मामलों में अग्रिम चेतावनी भी मिली थी, लेकिन सूचना विशेष की गुणवत्ता के बारे में जानकारी नहीं होती। अब भी इस मामले में पुख्ता व्यवस्था नहीं है जैसी प्रणाली इजरायलियों ने खोजी है। आतंकवादियों के छोटे-छोटे समूहों द्वारा भीड़ भाड़ वाले इलाकों और सार्वजनिक स्थानों पर धमाके करना आसान लक्ष्य है। इसे देखते हुए घटना को रोकने के लिए पुख्ता कदम उठाया जाना जरूरी है। पहली बात यह है कि आतंकवादी हमलों के मूल जगह की पहचान की जाए, जो पाकिस्तान में है। पाकिस्तान छिछले दर्जे की लड़ाई जारी रखे हुए है।

एक बार फिर इजरायल की बात आती है, जिसने ऐसी समस्या से निपटने के लिए प्रभावी तरीके खोजे हैं और वह जिहादी नेटवर्क में नए लोगों के शामिल होने की संभावना पर सख्त रवैया अपनाता है। पाकिस्तान के साथ आपसी कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव के माध्यम से निपटने की जरूरत है, लेकिन इसका प्रभाव मामूली ही होगा। दूसरे, इस बात की भी जरूरत है कि मुस्लिम समुदाय के नेताओं से कहा जाए कि वे आगे आएं। दारूल उलूम देवबंद ने कुछ महीने पहले एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था, जब उसने कहा कि निर्दोष लोगों पर किए जाने वाले हमले इस्लाम विरोधी हैं।

यह सूचना हर घर में पहुंचाई जानी चाहिए और मुस्लिम समुदाय में प्रभाव रखने वाले अन्य लोगों द्वारा भी यह दोहराया जाना चाहिए। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिहादी नेटवर्क, मुस्लिम समुदाय से नई भर्तियां न कर सके। ऐसी स्थितियां उत्पन्न की जाएं कि स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) जैसे संगठनों के लिए काम करना असंभव हो। इसके साथ साथ मुस्लिम समुदाय की शिकायतें दूर करने और उनका विश्वास जीतने की भी जरूरत है।

First Published - July 27, 2008 | 11:34 PM IST

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