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राजनीति, अर्थशास्त्र की भूमिकाओं में बदलाव

Last Updated- December 11, 2022 | 6:07 PM IST

यह बात स्पष्ट नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ लेकिन अर्थव्यवस्था और राजनीति ने अपनी भूमिकाएं आपस में बदल ली हैं और यह इस तरह हुआ है कि इस पर ध्यान अवश्य जाता है। सन 1945 के बाद एक समय ऐसा भी आया था जब अर्थशास्त्र ने स्वयं को आर्थिक वृद्धि से और राजनीति को उस वृद्धि के फलों या परिणामों से जोड़ा।
परंतु अब यह तस्वीर उलट चुकी है। अर्थशास्त्री वितरण के बारे में ज्यादा से ज्यादा बातचीत कर रहे हैं और राजनेता वृद्धि की बातें करते हैं। इसके परिणाम भी उतने ही अनुत्पादक और भ्रामक हैं जैसे गेंदबाज बल्लेबाजी करने लगे और बल्लेबाज गेंदबाजी। या फिर जैसा कि एली हेकशर और बर्टिल ओहलिन ने पूछा होता- तुलनात्मक लाभ कहां है?
जब मैंने इस बात का उल्लेख अपने मित्र बृजेश्वर सिंह से किया जो आईएएस की सेवा में अपना लंबा समय देने के बावजूद अर्थव्यवस्था के बारे में इक्का-दुक्का बातें ही जानते हैं। उन्होंने कहा ‘इसे भूमिकाओं की अदला-बदली मत कहिए बल्कि इसे ‘बदलाव’ कहिए।’ बहरहाल हम इसे चाहे जो भी कहें यह बदलाव निश्चित रूप से गंभीर बौद्धिक परीक्षण की मांग करता है।
उदाहरण के लिए एक बड़ी समस्या है जानना या निर्णय करना कि कितना पीछे लौटना है। या फिर जैसा कि पीटर सेलर्स के गीत की एक पंक्ति कहती है कि समस्या की शुरुआत कब हुई? क्या इसका आरंभ सन 1990 में  ‘इतिहास के अंत’ से हुआ या 2009 में जब अनिर्वाचित केंद्रीय बैंकों ने राजनीतिक कदम उठाने प्रारंभ कर ​दिए या फिर हमें सन 1950 के दौर में वापस जाना चाहिए जब प​श्चिमी  देशों की अर्थव्यवस्थाओं ने एक बड़ी और ऐसी पहेली को हल करने का प्रयास आरंभ किया : कुछ देशों में उत्पादन बढ़ता क्यों जाता है जबकि अन्य स्थानों पर ऐसा नहीं होता है?
इस मसले पर कभी​ किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सका। मुझे लगता है कि जलते हुए डेक पर खड़ा रहने वाला अंतिम बच्चा डैरन एसमोगलू था। उसने कहा था कि यह संस्थान हैं। उससे पहले के अन्य लोगों ने कहा था कि यह पूंजी का जमा होना, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समेकित ज्ञान और सबसे बढ़कर किफायती बाजार हैं।
 
भूमिकाओं में बदलाव
यही वह समय था जब राजनीति का ध्रुवीकरण हो गयाथा और वह रूढि़वादी और वाम-उदार खेमों में बंट गई थी। यहां वाम से तात्पर्य उन लोगों से है जिनके लिए केवल गरीब मायने रखते थे, अमीर बिल्कुल नहीं। वहीं उदार से तात्पर्य यह था कि आपको उन नियमों का पालन करना चाहिए जो कुलीन बनाते हैं।
भूमिकाओं में बदलाव को एक और ढंग से देखा जा सकता है। राजनीति ने यह मान लिया कि वृद्धि एक स्वतंत्र चर है जो अपने दम पर काम करता है लेकिन वितरण के काम में राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक होता है। दिशा दिखाने वाला बौद्धिक राजनी​तिक ढांचा यही था कि ‘तुम बनाओ मैं लूं।’
इसके बाद कुछ हुआ। हालांकि यह ‘कुछ’ पहले भी हो सकता था, लेकिन मैं 2008 में दुनिया भर में आए वित्तीय संकट को प्रस्थान बिंदु की तरह इस्तेमाल करते हुए बात करूंगा क्योंकि यह अ​धिक समीचीन है। राजनीति की प्रतिक्रिया कींसवादी किस्म की थी। राजनेताओं ने यह निर्णय लिया था कि वितरण स्वायत्त था लेकिन वृद्धि अथवा इसके पतन के लिए राज्य के भारी हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।
इस बीच मार्क्सवाद का नये सिरे से उभार देखने को मिला, भले ही उसका अनुपयोगी उत्पाद यानी वामपंथ अब मृतप्राय है।अर्थशास्त्रि​यों ने अचानक अपना ध्यान वितरण की ओर केंद्रित कर दिया है और ऐसा असमानता के जरिये किया जा रहा है।
फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी जो आय और संप​त्ति की असमानता पर काम करते हैं उन्होंने भी वितरण की बात कही। उसके बाद से ही वितरण पर केंद्रित आ​र्थिक बातों की बाढ़ सी आ गई। इसी का चरम संस्करण अमीरों को ही समाप्त करने की बात कहता है।
 
हम कहां जा रहे हैं?
तो फिलहाल हमारी ​स्थिति कुछ ऐसी है कि बल्लेबाज गेंदबाजी कर रहे हैं और गेंदबाज बल्लेबाजी कर रहे हैं। सबकुछ उलटपुलट है। हर बार जब एक व्य​क्ति कुछ कहता है तो दूसरा पक्ष कुछ और कह देता है। अब मुझसे ​अ​धिक समझदार लोगों को इस सवाल का जवाब देना होगा कि इससे किस प्रकार का राजनीतिक या आ​र्थिक सिद्धांत उभरेगा। मैंने इससे पहले एक आलेख में यह सवाल किया था कि अगर वितरण अर्थशास्त्र की केंद्रीय ​चिंता बन जाए तो कैसे अर्थशास्त्र उच्च बजट घाटे तथा संरक्षणवाद का समायोजन अपने ढांचे में करेगा। आ​खिरकार तो ये दोनों ही वितरण पर नये सिरे से ध्यान केंद्रित करने का स्वत: सामने आया परिणाम ही होंगे जबकि वृद्धि का संबंध किफायत से है और वितरण इसे बहुत कम प्राथमिकता देता है।
इसी प्रकार अगर राजनीतिक सिद्धांत को संप्रभुता से जुड़ी उसकी पारंपरिक चिंता से दूर ले जाया जाए तथा आ​र्थिक वृद्धि को इसके विश्लेषणात्मक ढांचे में शामिल कर लिया जाए तो इसका प्रदर्शन कैसा रहेगा?
क्या उसके पास इसके लिए आवश्यक उपाय हैं? शायद इसे शुरुआत अपने आपको और अ​धिक संकीर्ण ढंग से परिभा​​षित करते हुए करनी चाहिए। बजाय कि वह होने के जिसे ऑक्सफर्ड हैंडबुक ऑफ पॉलिटिकल थ्योरी ‘गैर अनुशासित क्षेत्र’ बताता है।
नि​श्चित रूप से यह दलील दी जा सकती है कि अकादमिक अनुशासन को ऐसी बातों के बारे में चिंतित होने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं है। लेकिन जब बाकी की सभी चीजें इतनी तेजी से बदल रही हों तो ऐसा करना दरअसल अपने काम से बचना होगा।
इसलिए प्रयास करें क्योंकि अगर आप प्रयास नहीं करेंगे तो अपनी ही प्रतिष्ठा गंवाएंगे।

First Published - June 21, 2022 | 12:37 AM IST

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