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नए पेंशन फंड मैनेजरों के आने से होगा बदलाव

Last Updated- December 07, 2022 | 8:05 PM IST

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के  एकाधिकार को सरकार खत्म करना चाहती है। इसके विभिन्न कारणों में से एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि लाखों सामान्य भारतीय ऐसा चाहते हैं।


ईपीएफओ में सिर्फ 1-1.2 करोड़ सदस्य हैं जबकि देश में कुल 45 करोड़ कामगार हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि इसका संचालन सही ढंग से नहीं होता। एक बार अगर बाजार को खोल दिया जाता है और नए निजी और सार्वजनिक पेंशन फंड प्रबंधक आ जाते हैं तो वे जबरदस्त ढंग से अपने उत्पाद बेचने लगेंगे और लोगों को उनसे समझौता करने के लिए प्रेरित करेंगे।

हाल ही में इनवेस्ट इंडिया इकनॉमिक फाउंडेशन आईआईएमएस डेटावर्क ने देश भर में सर्वेक्षण किया, जिसके आंकड़ों के मुताबिक देश भर में 8 करोड़ लोगों ने व्यक्तिगत रूप से सेवानिवृत्ति के बाद के लिए बचत की इच्छा जाहिर की।

इनवेस्ट इंडिया के मुताबिक लोगों की आमदनी और उनके निवेश की इच्छा के आधार पर इस क्षेत्र में केवल 3 साल में 190,000 करोड़ रुपये और 2019-20 तक 1,203,538 करोड़ रुपये की पूंजी जमा होने का अनुमान है।

इस मामले में थोड़ा संदेह है कि इनवेस्ट इंडिया के दिए गए आंकड़े सही हैं। कुल मिलाकर अगर आपसे कोई पूछता है कि क्या आप सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन यापन के लिए निवेश करना चाहते हैं और अगर कोई आपसे यह सवाल बहुत ज्यादा समझाने बुझाने के बाद करता है तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि आप हां ही कहेंगे।

लेकिन यह दूसरी बात हो जाती है कि आप इस मद में कितना निवेश करते हैं या कर पाते हैं। एक बात यह भी नजर आती है कि सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) खाते में पैसा जमा करने की प्रणाली कैसी है। हममें से ज्यादातर लोग जानते हैं कि पीपीएफ खाता खोलना कितना आसान है। इसमें केवल न्यूनतम 100 रुपये सालाना जमा करने की जरूरत होती है और इसे आप किसी भी डाकघर या देश के बड़े बैंक में खोल सकते हैं।

इसके साथ ही आप एक बड़ा नेटवर्क पाते हैं, जिसकी प्रसार सीमा देश भर में है। इसकी प्रतिभूति सरकार देती है और जमाकर्ता को कहीं से कोई खतरा नहीं होता। वहीं पीपीएफ का अपना कोई निवेश नहीं होता और ब्याज दरें, जो इसमें तय होती हैं कमोबेश वही होती हैं जो ईपीएफओ प्रति वर्ष ऑफर करता है।

निवेश के लिहाज से देखें तो ईपीएफओ का निवेश सरकारी बॉन्डों और अन्य ब्ल्यू चिप डेट पेपर में होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पीपीएफ में जोखिम बहुत कम है, अगर पेंशन फंड नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) अन्य लोगों को भी इस कारोबार में कदम रखने की अनुमति देने के लिए योजना बनाता है। पीएफआरडीए, सब्सक्राइबर को अपनी निवेश योजना चुनने के लिए अधिकृत करेगा।

इस तरह से आप अपनी बचत का निवेश इक्विटी में कुछ साल के लिए कर सकते हैं, उसके बाद डेट में.. फिर और कहीं। लेकिन अगर ज्यादातर लोग निवेश के लिए किसी अन्य विकल्प का चयन नहीं करते तो उनका जोखिम न होने का विकल्प हमेशा बना रहेगा।

यह हकीकत है कि देश में केवल 35 लाख लोगों के पास पीपीएफ खाता है (इसमें से 20 लाख लोग 18-59 साल की आयुवर्ग के हैं।  इसमें से 48 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों के हैं। यह संख्या कम होने के पीछे ज्यादातर लोगों का यह तर्क है कि इस योजना का संचालन सरकार करती है और इसकी मार्केटिंग सही ढंग से नहीं की गई है।

यह हो सकता है कि सही हो, लेकिन हम म्युचुअल फंडों की ओर ध्यान क्यों नहीं देते जो निजी संस्थाओं या सरकार के मालिकाना वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा संचालित होते हैं। यहां पर पीपीएफ खातों की तुलना में संख्या अधिक है, लेकिन यह बहुत ज्यादा नहीं है।

इसके पहले कि हम निजी संस्थाओं द्वारा संचालित म्युचुअल फंडों की तुलना करें कि वे आखिर सफल क्यों नहीं हुए जितनी उम्मीद थी, तो इस तरफ भी गौर करना होगा कि पीपीएफ और म्युचुअल फंड के निवेशकों में क्या समानताएं हैं। इसमें स्वाभाविक रूप से असमानता है। पीपीएफ में निवेश करने वाले लोगों की आमदनी सालाना 1,00,000 से कम है उनकी संख्या केवल 8 प्रतिशत है, जो पीपीएफ खाते में निवेश करते हैं।

आईआईईएफ और आईआईएमएस डेटावर्क के हाल के सर्वे के मुताबिक जीवन बीमा के क्षेत्र में निवेश करने वाले लोगों में उनकी संख्या ज्यादा है, जो पीपीएफ में निवेश करते हैं। पीपीएफ में निवेश करने वाले आधे से अधिक लोगों ने जीवन बीमा के क्षेत्र में भी निवेश किया है।

यह संख्या म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले लोगों में बहुत ज्यादा है और यह 90 प्रतिशत के करीब है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जीवन बीमा पॉलिसी धारकों की संख्या 10.5 करोड़ से ज्यादा है। आखिर में जीवन बीमा कराने वाले लोगों की संख्या इतनी ज्यादा क्यों है? ज्यादातर इलाकों में एलआईसी की शाखाओं का नेटवर्क है, लेकिन क्या इनकी संख्या डाकघरों से ज्यादा हो सकती हैं? 

इस बात की भी संभावना बहुत ज्यादा है कि जीवन बीमा के वितरकों को बहुत ज्यादा फायदा दिया जाता है, जिसकी वजह से इसका प्रसार हुआ हो। यह पहले साल के प्रीमियम के 8 से लेकर 30 प्रतिशत तक होता है (बाद में इसमें जमा होने वाले पैसे में से भी कुछ हिस्सा मिलता है), वहीं म्युचुअल फंड के मामले में यह 2.25 प्रतिशत होता है और पीपीएफ के मामले में इसके आधे के करीब होता है। इसलिए अगर कोई बैंक या वित्तीय संस्थान अपने उत्पाद बेचती है, जो बीमा उत्पाद बिकने की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

इन सब तथ्यों को देखते हुए यह जरूरी है कि जब गैर सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना को अंतिम रूप दिया जाए तो पीएफआरडीए के प्रमुख धीरेंद्र स्वरूप को कमीशन और उनके लिए प्रभावी कदमों पर भी ध्यान में रखना चाहिए, जिससे योजना की सफलता को सुनिश्चित किया जा सके। समस्या यह है कि पेंशन फंड के मामले में इसके सब्सक्राइबर यथासंभव कम कमीशन दिए जाने की कोशिश करते हैं।

किसी भी मामले में यूटीआई, एलआईसी और एसबीआई अगर पीएफआरडीए द्वारा स्वीकृत कमीशन की दरों को 0.03-0.05 प्रतिशत अंकों तक सीमित रखती हैं तो लक्ष्यों को हासिल करने में बहुत कठिनाई आएगी। अगर कमीशन दिए जाने का स्तर इतना नीचे रहेगा, तो नए पेंशन फंड प्रबंधकों को अपनी योजनाओं की मार्केटिंग केलिए खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। इस तरह से स्वरूप को इस समस्या का समाधान ढूंढना पड़ेगा, जिससे नई पेंशन योजना को संचालन में लाने में सहूलियत बरकरार रह सके।

First Published - September 7, 2008 | 10:53 PM IST

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